जय सियाराम! गोस्वामी तुलसीदास जी द्वारा रचित ramcharit manas sundar kand को सनातन धर्म में एक सिद्ध और चमत्कारिक पाठ माना गया है। जब भी जीवन में कोई बड़ी बाधा आए, तो sunderkand का संपूर्ण पाठ सभी संकटों को हर लेता है। बहुत से भक्त अपनी विशेष मनोकामना पूर्ण करने के लिए hanuman chalisa and sunderkand का पाठ एक साथ करते हैं। sunderkand ramayan श्री हनुमान जी की वीरता, बुद्धि और भक्ति का अद्वितीय वर्णन है। इंटरनेट पर भक्त अक्सर hanuman sunder kand या sunder kand hindi अर्थ सहित खोजते हैं, इसलिए हमने यहाँ एक ही पेज पर संपूर्ण ramayan sundar kand को 5-5 दोहों के आसान क्रम में उपलब्ध कराया है। कुछ लोग इसे hanuman sunderkand भी कहते हैं। आजकल कई श्रद्धालु प्रसिद्ध गायकों जैसे sunderkand ashwin pathak जी की मधुर आवाज़ में भी इसे सुनना पसंद करते हैं। आप hanuman chalisa sunderkand का यह पवित्र और सचित्र ramayan sundarkand पाठ नीचे पढ़ सकते हैं:
🌸 भाग 1: मंगलाचरण और दोहा 1 से 5
शान्तं शाश्वतमप्रमेयमनघं निर्वाणशान्तिप्रदं
ब्रह्माशम्भुफणीन्द्रसेव्यमनिशं वेदान्तवेद्यं विभुम् ।
रामाख्यं जगदीश्वरं सुरगुरुं मायामनुष्यं हरिं
वन्देऽहं करुणाकरं रघुवरं भूपालचूडामणिम् ॥ १॥ अर्थ: शान्त, सनातन, निष्पाप, मोक्षरूप परमशान्ति देने वाले, ब्रह्मा, शम्भु और शेषजी से निरंतर सेवित, वेदान्त के द्वारा जानने योग्य, सर्वव्यापक, करुणा की खान, रघुकुल में श्रेष्ठ श्री राम कहलाने वाले जगदीश्वर की मैं वंदना करता हूँ ॥ १॥
ब्रह्माशम्भुफणीन्द्रसेव्यमनिशं वेदान्तवेद्यं विभुम् ।
रामाख्यं जगदीश्वरं सुरगुरुं मायामनुष्यं हरिं
वन्देऽहं करुणाकरं रघुवरं भूपालचूडामणिम् ॥ १॥ अर्थ: शान्त, सनातन, निष्पाप, मोक्षरूप परमशान्ति देने वाले, ब्रह्मा, शम्भु और शेषजी से निरंतर सेवित, वेदान्त के द्वारा जानने योग्य, सर्वव्यापक, करुणा की खान, रघुकुल में श्रेष्ठ श्री राम कहलाने वाले जगदीश्वर की मैं वंदना करता हूँ ॥ १॥
जामवंत के बचन सुहाए। सुनि हनुमंत हृदय अति भाए॥तब लगि मोहि परिखेहु तुम्ह भाई। सहि दुखु कंद मूल फल खाई॥ अर्थ: जाम्बवान् के सुंदर वचन सुनकर हनुमानजी के हृदय को बहुत ही भाए। (वे बोले-) हे भाई! तुम लोग दुःख सहकर, कन्द-मूल-फल खाकर तब तक मेरी राह देखना, जब तक मैं सीताजी को देखकर लौट न आऊँ।
हनूमान तेहि परसा कर पुनि कीन्ह प्रनाम।
राम काजु सबु करिहउँ मोहि कहाँ बिश्राम॥ १ ॥ अर्थ: समुद्र पार करते समय हनुमान्जी ने मैनाक पर्वत को हाथ से छू दिया, फिर प्रणाम करके कहा- भाई! श्री रामचन्द्रजी का सब काम किए बिना मुझे विश्राम कहाँ? ॥ १ ॥
राम काजु सबु करिहउँ मोहि कहाँ बिश्राम॥ १ ॥ अर्थ: समुद्र पार करते समय हनुमान्जी ने मैनाक पर्वत को हाथ से छू दिया, फिर प्रणाम करके कहा- भाई! श्री रामचन्द्रजी का सब काम किए बिना मुझे विश्राम कहाँ? ॥ १ ॥
जात पवनसुत देवन देखा। जानैं कहुँ बल बुद्धि बिसेषा॥सुरसा नाम अहिन्ह कै माता। पठइन्हि आइ कही तेहिं बाता॥ अर्थ: देवताओं ने सुरसा नामक नागमाता को भेजा। उसने आकर हनुमान्जी से कहा- आज देवताओं ने मुझे भोजन दिया है। हनुमान्जी ने कहा- मैं श्री रामजी का कार्य करके लौट आऊँ, तब मैं आकर तुम्हारे मुँह में घुस जाऊँगा।
राम काजु सबु करिहहु तुम्ह बल बुद्धि निधान।
आसिष देई गई सो हरषि चलेउ हनुमान॥ २ ॥ अर्थ: सुरसा ने हनुमान जी की बुद्धि की परीक्षा लेने के बाद कहा- तुम बल और बुद्धि के भण्डार हो, तुम श्रीरामचंद्रजी के सब कार्य सिद्ध करोगे। ऐसा आशीर्वाद देकर वह चली गई ॥ २ ॥
आसिष देई गई सो हरषि चलेउ हनुमान॥ २ ॥ अर्थ: सुरसा ने हनुमान जी की बुद्धि की परीक्षा लेने के बाद कहा- तुम बल और बुद्धि के भण्डार हो, तुम श्रीरामचंद्रजी के सब कार्य सिद्ध करोगे। ऐसा आशीर्वाद देकर वह चली गई ॥ २ ॥
निसिचरि एक सिंधु महुँ रहई। करि माया नभु के खग गहई॥
जीव जंतु जे गगन उड़ाहीं। जल बिलोकि तिन्ह कै परिछाहीं॥
गहइ छाहँ सक सो न उड़ाई। एहि बिधि सदा गगनचर खाई॥
सोइ छल हनूमान कहँ कीन्हा। तासु कपटु कपि तुरतहिं चीन्हा॥
ताहि मारि मारुतसुत बीरा। बारिधि पार गयउ मतिधीरा॥
तहाँ जाइ देखी बन सोभा। गुंजत चंचरीक मधु लोभा॥
नाना तरु फल फूल सुहाए। खग मृग बृंद देखि मन भाए॥
सैल बिसाल देखि एक आगें। ता पर धाइ चढ़ेउ भय त्यागें॥ अर्थ: समुद्र में एक राक्षसी (सिंहिका) रहती थी, जो आकाश में उड़ने वाले पक्षियों की परछाईं जल में देखकर उन्हें पकड़ लेती थी। उसने हनुमान जी के साथ भी वही छल किया, लेकिन हनुमान जी ने उसे तुरंत पहचान लिया। वीर पवनपुत्र ने उसे मारकर समुद्र पार किया। वहां जाकर उन्होंने वन की सुंदर शोभा देखी और निर्भय होकर एक विशाल पर्वत पर चढ़ गए।
जीव जंतु जे गगन उड़ाहीं। जल बिलोकि तिन्ह कै परिछाहीं॥
गहइ छाहँ सक सो न उड़ाई। एहि बिधि सदा गगनचर खाई॥
सोइ छल हनूमान कहँ कीन्हा। तासु कपटु कपि तुरतहिं चीन्हा॥
ताहि मारि मारुतसुत बीरा। बारिधि पार गयउ मतिधीरा॥
तहाँ जाइ देखी बन सोभा। गुंजत चंचरीक मधु लोभा॥
नाना तरु फल फूल सुहाए। खग मृग बृंद देखि मन भाए॥
सैल बिसाल देखि एक आगें। ता पर धाइ चढ़ेउ भय त्यागें॥ अर्थ: समुद्र में एक राक्षसी (सिंहिका) रहती थी, जो आकाश में उड़ने वाले पक्षियों की परछाईं जल में देखकर उन्हें पकड़ लेती थी। उसने हनुमान जी के साथ भी वही छल किया, लेकिन हनुमान जी ने उसे तुरंत पहचान लिया। वीर पवनपुत्र ने उसे मारकर समुद्र पार किया। वहां जाकर उन्होंने वन की सुंदर शोभा देखी और निर्भय होकर एक विशाल पर्वत पर चढ़ गए।
पुर रखवारे देखि बहु कपि मन कीन्ह बिचार।
अति लघु रूप धरौं निसि नगर करौं पइसार॥ ३ ॥ अर्थ: नगर के बहुत से रक्षकों को देखकर हनुमान जी ने मन में विचार किया कि मैं अत्यंत छोटा रूप धारण करूँ और रात के समय नगर में प्रवेश करूँ॥ ३ ॥
अति लघु रूप धरौं निसि नगर करौं पइसार॥ ३ ॥ अर्थ: नगर के बहुत से रक्षकों को देखकर हनुमान जी ने मन में विचार किया कि मैं अत्यंत छोटा रूप धारण करूँ और रात के समय नगर में प्रवेश करूँ॥ ३ ॥
मसक समान रूप कपि धरी। लंकहि चलेउ सुमिरि नरहरी॥
नाम लंकिनी एक निसिचरी। सो कह चलेसि मोहि निंदरी॥
जानेहि नहिं मरमु सठ मोरा। मोर अहार जहाँ लगि चोरा॥
मुठिका एक महा कपि हनी। रुधिर बमत धरनीं ढलमनी॥
पुनि संभारि उठी सो लंका। जोरि पानि कर बिनय ससंका॥
जब रावनहि ब्रह्म बर दीन्हा। चलत बिरंचि कहा मोहि चीन्हा॥
बिकल होसि तैं कपि कें मारे। तब जानेसु निसिचर संघारे॥
तात मोर अति पुन्य बहूता। देखेउँ नयन राम कर दूता॥ अर्थ: हनुमान जी मच्छर के समान छोटा रूप धारण करके भगवान का स्मरण करते हुए लंका चले। लंकिनी नाम की राक्षसी ने उन्हें रोका और कहा—रे मूर्ख! तूने मेरा भेद नहीं जाना, यहाँ जितने भी चोर आते हैं, वे सब मेरा आहार हैं। तब महाकपि ने उसे एक घूंसा मारा जिससे वह खून उगलती हुई धरती पर गिर पड़ी। फिर वह हाथ जोड़कर विनती करने लगी कि ब्रह्मा जी ने मुझसे कहा था कि जब तू किसी वानर के मारने से व्याकुल हो जाए, तब समझ लेना कि राक्षसों का अंत आ गया है।
नाम लंकिनी एक निसिचरी। सो कह चलेसि मोहि निंदरी॥
जानेहि नहिं मरमु सठ मोरा। मोर अहार जहाँ लगि चोरा॥
मुठिका एक महा कपि हनी। रुधिर बमत धरनीं ढलमनी॥
पुनि संभारि उठी सो लंका। जोरि पानि कर बिनय ससंका॥
जब रावनहि ब्रह्म बर दीन्हा। चलत बिरंचि कहा मोहि चीन्हा॥
बिकल होसि तैं कपि कें मारे। तब जानेसु निसिचर संघारे॥
तात मोर अति पुन्य बहूता। देखेउँ नयन राम कर दूता॥ अर्थ: हनुमान जी मच्छर के समान छोटा रूप धारण करके भगवान का स्मरण करते हुए लंका चले। लंकिनी नाम की राक्षसी ने उन्हें रोका और कहा—रे मूर्ख! तूने मेरा भेद नहीं जाना, यहाँ जितने भी चोर आते हैं, वे सब मेरा आहार हैं। तब महाकपि ने उसे एक घूंसा मारा जिससे वह खून उगलती हुई धरती पर गिर पड़ी। फिर वह हाथ जोड़कर विनती करने लगी कि ब्रह्मा जी ने मुझसे कहा था कि जब तू किसी वानर के मारने से व्याकुल हो जाए, तब समझ लेना कि राक्षसों का अंत आ गया है।
तात स्वर्ग अपबर्ग सुख धरिअ तुला एक अंग।
तूल न ताहि सकल मिलि जो सुख लव सतसंग॥ ४ ॥ अर्थ: हे तात! स्वर्ग और मोक्ष के सारे सुखों को तराजू के एक पलड़े पर रखा जाए, तो भी वे सब मिलकर उस सुख के बराबर नहीं हो सकते, जो क्षण भर के सत्संग से मिलता है॥ ४ ॥
तूल न ताहि सकल मिलि जो सुख लव सतसंग॥ ४ ॥ अर्थ: हे तात! स्वर्ग और मोक्ष के सारे सुखों को तराजू के एक पलड़े पर रखा जाए, तो भी वे सब मिलकर उस सुख के बराबर नहीं हो सकते, जो क्षण भर के सत्संग से मिलता है॥ ४ ॥
प्रबिसि नगर कीजे सब काजा। हृदयँ राखि कोसलपुर राजा॥
गरल सुधा रिपु करहिं मिताई। गोपद सिंधु अनल सितलाई॥
गरुड़ सुमेरु रेनु सम ताही। राम कृपा करि चितवा जाही॥
अति लघु रूप धरेउ हनुमाना। पैठा नगर सुमिरि भगवाना॥
मंदिर मंदिर प्रति करि सोधा। देखे जहँ तहँ अगनित जोधा॥
गयउ दसानन मंदिर माहीं। अति बिचित्र कहि जात सो नाहीं॥
सयन किएँ देखा कपि तेही। मंदिर महुँ न दीखि बैदेही॥
भवन एक पुनि दीख सुहावा। हरि मंदिर तहँ भिन्न बनावा॥ अर्थ: (लंकिनी ने कहा-) अयोध्या के राजा श्री राम को हृदय में रखकर नगर में प्रवेश कीजिए। श्री राम की कृपा जिस पर हो जाती है, उसके लिए विष अमृत बन जाता है, शत्रु मित्र बन जाते हैं, और समुद्र गाय के खुर के बराबर हो जाता है। तब हनुमान जी ने भगवान का स्मरण करके नगर में प्रवेश किया। रावण के महल में जाकर उसे सोते हुए देखा, लेकिन वहां माता सीता नहीं दिखीं। फिर उन्हें एक सुंदर भवन दिखा जिसमें भगवान का एक अलग मंदिर बना था।
गरल सुधा रिपु करहिं मिताई। गोपद सिंधु अनल सितलाई॥
गरुड़ सुमेरु रेनु सम ताही। राम कृपा करि चितवा जाही॥
अति लघु रूप धरेउ हनुमाना। पैठा नगर सुमिरि भगवाना॥
मंदिर मंदिर प्रति करि सोधा। देखे जहँ तहँ अगनित जोधा॥
गयउ दसानन मंदिर माहीं। अति बिचित्र कहि जात सो नाहीं॥
सयन किएँ देखा कपि तेही। मंदिर महुँ न दीखि बैदेही॥
भवन एक पुनि दीख सुहावा। हरि मंदिर तहँ भिन्न बनावा॥ अर्थ: (लंकिनी ने कहा-) अयोध्या के राजा श्री राम को हृदय में रखकर नगर में प्रवेश कीजिए। श्री राम की कृपा जिस पर हो जाती है, उसके लिए विष अमृत बन जाता है, शत्रु मित्र बन जाते हैं, और समुद्र गाय के खुर के बराबर हो जाता है। तब हनुमान जी ने भगवान का स्मरण करके नगर में प्रवेश किया। रावण के महल में जाकर उसे सोते हुए देखा, लेकिन वहां माता सीता नहीं दिखीं। फिर उन्हें एक सुंदर भवन दिखा जिसमें भगवान का एक अलग मंदिर बना था।
रामायुध अंकित गृह सोभा बरनि न जाइ।नव तुलसिका बृंद तहँ देखि हरष कपिराइ॥ ५ ॥ अर्थ: वह घर श्री राम जी के धनुष-बाण के चिह्नों से अंकित था, उसकी शोभा का वर्णन नहीं किया जा सकता। वहाँ नवीन तुलसी के पौधों का समूह देखकर हनुमान जी बहुत हर्षित हुए (वह विभीषण का घर था)॥ ५ ॥
🌸 भाग 2: दोहा 6 से 10
लंका निसिचर निकर निवासा। इहाँ कहाँ सज्जन कर बासा॥
मन महुँ तरक करै कपि लागा। तेहीं समय बिभीषनु जागा॥
राम राम तेहिं सुमिरन कीन्हा। हृदयँ हरष कपि सज्जन चीन्हा॥
एहि सन हठि करिहउँ पहिचानी। साधु ते होइ न कारज हानी॥
बिप्र रूप धरि बचन सुनाए। सुनत बिभीषन उठि तहँ आए॥
करि प्रनाम पूँछी कुसलाई। बिप्र कहहु निज कथा बुझाई॥
की तुम्ह हरि दासन्ह महँ कोई। मोरें हृदय प्रीति अति होई॥
की तुम्ह रामु दीन अनुरागी। आयहु मोहि करन बड़भागी॥ अर्थ: हनुमान जी विचार कर रहे थे कि राक्षसों की लंका में सज्जन कहाँ से आ गया? उसी समय विभीषण जाग गए और 'राम-राम' का स्मरण किया। हनुमान जी ने ब्राह्मण का रूप धारण करके उन्हें पुकारा। विभीषण ने प्रणाम कर पूछा कि हे ब्राह्मण! क्या आप हरि के दासों में से कोई हैं या स्वयं दीनों से प्रेम करने वाले श्री राम हैं, जो मुझे बड़भागी बनाने आए हैं?
मन महुँ तरक करै कपि लागा। तेहीं समय बिभीषनु जागा॥
राम राम तेहिं सुमिरन कीन्हा। हृदयँ हरष कपि सज्जन चीन्हा॥
एहि सन हठि करिहउँ पहिचानी। साधु ते होइ न कारज हानी॥
बिप्र रूप धरि बचन सुनाए। सुनत बिभीषन उठि तहँ आए॥
करि प्रनाम पूँछी कुसलाई। बिप्र कहहु निज कथा बुझाई॥
की तुम्ह हरि दासन्ह महँ कोई। मोरें हृदय प्रीति अति होई॥
की तुम्ह रामु दीन अनुरागी। आयहु मोहि करन बड़भागी॥ अर्थ: हनुमान जी विचार कर रहे थे कि राक्षसों की लंका में सज्जन कहाँ से आ गया? उसी समय विभीषण जाग गए और 'राम-राम' का स्मरण किया। हनुमान जी ने ब्राह्मण का रूप धारण करके उन्हें पुकारा। विभीषण ने प्रणाम कर पूछा कि हे ब्राह्मण! क्या आप हरि के दासों में से कोई हैं या स्वयं दीनों से प्रेम करने वाले श्री राम हैं, जो मुझे बड़भागी बनाने आए हैं?
तब हनुमंत कही सब राम कथा निज नाम।
सुनत जुगल तन पुलक मन मगन सुमिरि गुन ग्राम॥ ६ ॥ अर्थ: तब हनुमान जी ने श्री रामचन्द्र जी की सारी कथा और अपना नाम बताया। सुनते ही दोनों के शरीर पुलकित हो गए और राम जी के गुणों का स्मरण करके दोनों आनंद में मगन हो गए॥ ६ ॥
सुनत जुगल तन पुलक मन मगन सुमिरि गुन ग्राम॥ ६ ॥ अर्थ: तब हनुमान जी ने श्री रामचन्द्र जी की सारी कथा और अपना नाम बताया। सुनते ही दोनों के शरीर पुलकित हो गए और राम जी के गुणों का स्मरण करके दोनों आनंद में मगन हो गए॥ ६ ॥
सुनहु पवनसुत रहनि हमारी। जिमि दसनन्हि महुँ जीभ बिचारी॥
तात कबहुँ मोहि जानि अनाथा। करिहहिं कृपा भानुकुल नाथा॥
तामस तनु कछु साधन नाहीं। प्रीति न पद सरोज मन माहीं॥
अब मोहि भा भरोस हनुमंता। बिनु हरिकृपा मिलहिं नहिं संता॥
जौं रघुबीर अनुग्रह कीन्हा। तौ तुम्ह मोहि दरसु हठि दीन्हा॥
सुनहु बिभीषन प्रभु कै रीती। करहिं सदा सेवक पर प्रीती॥
कहहु कवन मैं परम कुलीना। कपि चंचल सबहीं बिधि हीना॥
प्रात लेइ जो नाम हमारा। तेहि दिन ताहि न मिलै अहारा॥ अर्थ: विभीषण ने कहा- हे पवनपुत्र! मेरी यहाँ रहने की स्थिति ऐसी है जैसे दांतों के बीच बेचारी जीभ। क्या श्री राम मुझ अनाथ पर कृपा करेंगे? अब मुझे भरोसा हो गया है क्योंकि बिना हरि कृपा के संतों के दर्शन नहीं होते। हनुमान जी ने कहा- प्रभु की यह रीति है कि वे सेवक पर सदा प्रेम करते हैं। मैं कौन सा कुलीन हूँ? मैं तो एक चंचल वानर हूँ, फिर भी प्रभु ने मुझ पर अपार कृपा की है।
तात कबहुँ मोहि जानि अनाथा। करिहहिं कृपा भानुकुल नाथा॥
तामस तनु कछु साधन नाहीं। प्रीति न पद सरोज मन माहीं॥
अब मोहि भा भरोस हनुमंता। बिनु हरिकृपा मिलहिं नहिं संता॥
जौं रघुबीर अनुग्रह कीन्हा। तौ तुम्ह मोहि दरसु हठि दीन्हा॥
सुनहु बिभीषन प्रभु कै रीती। करहिं सदा सेवक पर प्रीती॥
कहहु कवन मैं परम कुलीना। कपि चंचल सबहीं बिधि हीना॥
प्रात लेइ जो नाम हमारा। तेहि दिन ताहि न मिलै अहारा॥ अर्थ: विभीषण ने कहा- हे पवनपुत्र! मेरी यहाँ रहने की स्थिति ऐसी है जैसे दांतों के बीच बेचारी जीभ। क्या श्री राम मुझ अनाथ पर कृपा करेंगे? अब मुझे भरोसा हो गया है क्योंकि बिना हरि कृपा के संतों के दर्शन नहीं होते। हनुमान जी ने कहा- प्रभु की यह रीति है कि वे सेवक पर सदा प्रेम करते हैं। मैं कौन सा कुलीन हूँ? मैं तो एक चंचल वानर हूँ, फिर भी प्रभु ने मुझ पर अपार कृपा की है।
अस मैं अधम सखा सुनु मोहू पर रघुबीर।
कीन्ही कृपा सुमिरि गुन भरे बिलोचन नीर॥ ७ ॥ अर्थ: हे सखा सुनिए! मैं ऐसा नीच हूँ, फिर भी श्री रघुवीर ने मुझ पर कृपा की है। भगवान के गुणों का स्मरण करके हनुमान जी के नेत्रों में जल भर आया॥ ७ ॥
कीन्ही कृपा सुमिरि गुन भरे बिलोचन नीर॥ ७ ॥ अर्थ: हे सखा सुनिए! मैं ऐसा नीच हूँ, फिर भी श्री रघुवीर ने मुझ पर कृपा की है। भगवान के गुणों का स्मरण करके हनुमान जी के नेत्रों में जल भर आया॥ ७ ॥
जानतहूँ अस स्वामि बिसारी। फिरहिं ते काहे न होहिं दुखारी॥
एहि बिधि कहत राम गुन ग्रामा। पावा अनिर्बाच्य बिश्रामा॥
पुनि सब कथा बिभीषन कही। जेहि बिधि जनकसुता तहँ रही॥
तब हनुमंत कहा सुनु भ्राता। देखी चहउँ जानकी माता॥
जुगुति बिभीषन सकल सुनाई। चलेउ पवनसुत बिदा कराई॥
करि सोइ रूप गयउ पुनि तहवाँ। बन असोक सीता रह जहवाँ॥
देखि मनहि महुँ कीन्ह प्रनामा। बैठेहिं बीति जात निसि जामा॥
कृस तनु सीस जटा एक बेनी। जपति हृदयँ रघुपति गुन श्रेनी॥ अर्थ: विभीषण ने बताया कि माता सीता अशोक वाटिका में किस प्रकार रह रही हैं। हनुमान जी ने उनसे विदा ली और वही छोटा रूप धारण करके अशोक वाटिका पहुँचे। उन्होंने माता सीता को मन ही मन प्रणाम किया। माता का शरीर दुबला हो गया था और वे हृदय में श्री रघुनाथ जी के गुणों का ही निरंतर स्मरण कर रही थीं।
एहि बिधि कहत राम गुन ग्रामा। पावा अनिर्बाच्य बिश्रामा॥
पुनि सब कथा बिभीषन कही। जेहि बिधि जनकसुता तहँ रही॥
तब हनुमंत कहा सुनु भ्राता। देखी चहउँ जानकी माता॥
जुगुति बिभीषन सकल सुनाई। चलेउ पवनसुत बिदा कराई॥
करि सोइ रूप गयउ पुनि तहवाँ। बन असोक सीता रह जहवाँ॥
देखि मनहि महुँ कीन्ह प्रनामा। बैठेहिं बीति जात निसि जामा॥
कृस तनु सीस जटा एक बेनी। जपति हृदयँ रघुपति गुन श्रेनी॥ अर्थ: विभीषण ने बताया कि माता सीता अशोक वाटिका में किस प्रकार रह रही हैं। हनुमान जी ने उनसे विदा ली और वही छोटा रूप धारण करके अशोक वाटिका पहुँचे। उन्होंने माता सीता को मन ही मन प्रणाम किया। माता का शरीर दुबला हो गया था और वे हृदय में श्री रघुनाथ जी के गुणों का ही निरंतर स्मरण कर रही थीं।
निज पद नयन दिएँ मन राम पद कमल लीन।
परम दुखी भा पवनसुत देखि जानकी दीन॥ ८ ॥ अर्थ: माता सीता अपने नेत्रों को अपने चरणों पर टिकाए हुए थीं और मन श्री राम जी के चरण कमलों में लीन था। जानकी जी को इतना दीन और दुखी देखकर पवनपुत्र हनुमान जी बहुत दुखी हुए॥ ८ ॥
परम दुखी भा पवनसुत देखि जानकी दीन॥ ८ ॥ अर्थ: माता सीता अपने नेत्रों को अपने चरणों पर टिकाए हुए थीं और मन श्री राम जी के चरण कमलों में लीन था। जानकी जी को इतना दीन और दुखी देखकर पवनपुत्र हनुमान जी बहुत दुखी हुए॥ ८ ॥
तर पल्लव महुँ रहा लुकाई। करइ बिचार करौं का भाई॥
तेहि अवसर रावनु तहँ आवा। संग नारि बहु किएँ बनावा॥
बहु बिधि खल सीतहि समुझावा। साम दान भय भेद देखावा॥
कह रावनु सुनु सुमुखि सयानी। मंदोदरी आदि सब रानी॥
तव अनुचरी करउँ पन मोरा। एक बार बिलोकु मम ओरा॥
तृन धरि ओट कहति बैदेही। सुमिरि अवधपति परम सनेही॥
सुनु दसमुख खद्योत प्रकासा। कबहुँ कि नलिनी करइ बिकासा॥
अस मन समुझु कहति जानकी। खल सुधि नहिं रघुबीर बान की॥ अर्थ: हनुमान जी पत्तों में छिप गए। उसी समय रावण वहां आया और माता सीता को डराते हुए बोला कि तुम एक बार मेरी ओर देखो तो मैं मंदोदरी आदि सभी रानियों को तुम्हारी दासी बना दूँगा। वैदेही (सीता जी) ने तिनके की आड़ करके कहा- हे दसमुख! जुगनू के प्रकाश से क्या कभी कमलिनी खिल सकती है? तू भी अपने मन में यही समझ ले। रे दुष्ट! तुझे श्री रघुवीर के बाणों की सुधि (खबर) नहीं है।
तेहि अवसर रावनु तहँ आवा। संग नारि बहु किएँ बनावा॥
बहु बिधि खल सीतहि समुझावा। साम दान भय भेद देखावा॥
कह रावनु सुनु सुमुखि सयानी। मंदोदरी आदि सब रानी॥
तव अनुचरी करउँ पन मोरा। एक बार बिलोकु मम ओरा॥
तृन धरि ओट कहति बैदेही। सुमिरि अवधपति परम सनेही॥
सुनु दसमुख खद्योत प्रकासा। कबहुँ कि नलिनी करइ बिकासा॥
अस मन समुझु कहति जानकी। खल सुधि नहिं रघुबीर बान की॥ अर्थ: हनुमान जी पत्तों में छिप गए। उसी समय रावण वहां आया और माता सीता को डराते हुए बोला कि तुम एक बार मेरी ओर देखो तो मैं मंदोदरी आदि सभी रानियों को तुम्हारी दासी बना दूँगा। वैदेही (सीता जी) ने तिनके की आड़ करके कहा- हे दसमुख! जुगनू के प्रकाश से क्या कभी कमलिनी खिल सकती है? तू भी अपने मन में यही समझ ले। रे दुष्ट! तुझे श्री रघुवीर के बाणों की सुधि (खबर) नहीं है।
आपुहि सुनि खद्योत सम रामहि भानु समान।
परुष बचन सुनि काढ़ि असि बोला अति रिसान॥ ९ ॥ अर्थ: अपने आपको जुगनू के समान और श्री राम जी को सूर्य के समान सुनकर, रावण अत्यंत क्रोधित होकर तलवार निकालकर बोला- ॥ ९ ॥
परुष बचन सुनि काढ़ि असि बोला अति रिसान॥ ९ ॥ अर्थ: अपने आपको जुगनू के समान और श्री राम जी को सूर्य के समान सुनकर, रावण अत्यंत क्रोधित होकर तलवार निकालकर बोला- ॥ ९ ॥
सीता तैं मम कृत अपमाना। कटिहउँ तव सिर कठिन कृपाना॥
नाहिं त सपदि मानु मम बानी। सुमुखि होति न त जीवन हानी॥
स्याम सरोज दाम सम सुंदर। प्रभु भुज करि कर सम दसकंधर॥
सो भुज कंठ कि तव असि घोरा। सुनु सठ अस प्रवान पन मोरा॥
चंद्रहास हरु मम परितापं। रघुपति बिरह अनल संजातं॥
सीतल निसित बहसि बर धारा। कह सीता हरु मम दुख भारा॥
सुनत बचन पुनि मारन धावा। मयतनयाँ कहि नीति बुझावा॥
कहेसि सकल निसिचरिन्ह बोलाई। सीतहि बहु बिधि त्रासहु जाई॥ अर्थ: रावण ने कहा- सीता! तूने मेरा अपमान किया है, मैं इस तलवार से तेरा सिर काट दूँगा। नहीं तो मेरी बात मान ले, वरना जीवन से हाथ धोना पड़ेगा। माता सीता ने कहा- हे दुष्ट सुन, मेरा यही प्रण है कि मेरे गले में या तो प्रभु की सुंदर भुजा होगी या फिर तेरी यह भयानक तलवार। हे चंद्रहास (तलवार)! तू ही श्री राम के विरह से उत्पन्न मेरी इस जलन को हर ले। यह सुनकर रावण मारने दौड़ा, तब मंदोदरी ने उसे नीति समझाकर रोका। फिर रावण ने राक्षसियों से कहा कि सीता को बहुत डराओ।
नाहिं त सपदि मानु मम बानी। सुमुखि होति न त जीवन हानी॥
स्याम सरोज दाम सम सुंदर। प्रभु भुज करि कर सम दसकंधर॥
सो भुज कंठ कि तव असि घोरा। सुनु सठ अस प्रवान पन मोरा॥
चंद्रहास हरु मम परितापं। रघुपति बिरह अनल संजातं॥
सीतल निसित बहसि बर धारा। कह सीता हरु मम दुख भारा॥
सुनत बचन पुनि मारन धावा। मयतनयाँ कहि नीति बुझावा॥
कहेसि सकल निसिचरिन्ह बोलाई। सीतहि बहु बिधि त्रासहु जाई॥ अर्थ: रावण ने कहा- सीता! तूने मेरा अपमान किया है, मैं इस तलवार से तेरा सिर काट दूँगा। नहीं तो मेरी बात मान ले, वरना जीवन से हाथ धोना पड़ेगा। माता सीता ने कहा- हे दुष्ट सुन, मेरा यही प्रण है कि मेरे गले में या तो प्रभु की सुंदर भुजा होगी या फिर तेरी यह भयानक तलवार। हे चंद्रहास (तलवार)! तू ही श्री राम के विरह से उत्पन्न मेरी इस जलन को हर ले। यह सुनकर रावण मारने दौड़ा, तब मंदोदरी ने उसे नीति समझाकर रोका। फिर रावण ने राक्षसियों से कहा कि सीता को बहुत डराओ।
मास दिवस महुँ कहा न माना। तौ मैं मारबि काढ़ि कृपाना॥
भवन गयउ दसकंधर इहाँ पिसाचिनि बृंद।
सीतहि त्रास देखावहिं धरहिं रूप बहु मंद॥ १० ॥ अर्थ: रावण ने कहा- यदि एक महीने में यह मेरी बात नहीं मानेगी, तो मैं इसे तलवार से मार दूँगा। ऐसा कहकर रावण लौट गया। यहाँ पिशाचनियों का समूह तरह-तरह के भयंकर रूप धरकर माता सीता को डराने लगा॥ १० ॥
भवन गयउ दसकंधर इहाँ पिसाचिनि बृंद।
सीतहि त्रास देखावहिं धरहिं रूप बहु मंद॥ १० ॥ अर्थ: रावण ने कहा- यदि एक महीने में यह मेरी बात नहीं मानेगी, तो मैं इसे तलवार से मार दूँगा। ऐसा कहकर रावण लौट गया। यहाँ पिशाचनियों का समूह तरह-तरह के भयंकर रूप धरकर माता सीता को डराने लगा॥ १० ॥
🌸 भाग 3: दोहा 11 से 15
त्रिजटा नाम राच्छसी एका। राम चरन रति निपुन बिबेका॥
सबन्हौ बोलि सुनाएसि सपना। सीतहि सेइ करहु हित अपना॥
सपनें बानर लंका जारी। जातुधान सेना सब मारी॥
खर आरूढ़ नगन दससीसा। मुंडित सिर खंडित भुज बीसा॥
एहि बिधि सो दच्छिन दिसि जाई। लंका मनहुँ बिभीषन पाई॥
नगर फिरी रघुबीर दोहाई। तब प्रभु सीता बोलि पठाई॥
यह सपना मैं कहउँ पुकारी। होइहि सत्य गएँ दिन चारी॥
तासु बचन सुनि ते सब डरीं। जनकसुता के चरनन्हि परीं॥ अर्थ: त्रिजटा नाम की एक राक्षसी थी, जिसकी श्री राम के चरणों में प्रीति थी और वह विवेक में निपुण थी। उसने सब राक्षसियों को बुलाकर अपना स्वप्न सुनाया और कहा- सीता जी की सेवा करके अपना कल्याण कर लो। स्वप्न में मैंने देखा कि एक वानर ने लंका जला दी है और राक्षसों की सारी सेना मारी गई है। रावण नंगा है और गधे पर सवार है, उसके सिर मुंडे हुए हैं और बीसों भुजाएं कटी हुई हैं। इस प्रकार वह दक्षिण दिशा की ओर जा रहा है। मानो विभीषण ने लंका का राज पा लिया है और नगर में श्री राम जी की दुहाई फिर गई है, तब प्रभु ने सीता जी को बुलवा लिया है। यह स्वप्न मैं पुकार कर कह रही हूँ, यह चार दिनों के बाद सत्य होगा। उसके वचन सुनकर वे सब राक्षसियाँ डर गईं और जानकी जी के चरणों में गिर पड़ीं।
सबन्हौ बोलि सुनाएसि सपना। सीतहि सेइ करहु हित अपना॥
सपनें बानर लंका जारी। जातुधान सेना सब मारी॥
खर आरूढ़ नगन दससीसा। मुंडित सिर खंडित भुज बीसा॥
एहि बिधि सो दच्छिन दिसि जाई। लंका मनहुँ बिभीषन पाई॥
नगर फिरी रघुबीर दोहाई। तब प्रभु सीता बोलि पठाई॥
यह सपना मैं कहउँ पुकारी। होइहि सत्य गएँ दिन चारी॥
तासु बचन सुनि ते सब डरीं। जनकसुता के चरनन्हि परीं॥ अर्थ: त्रिजटा नाम की एक राक्षसी थी, जिसकी श्री राम के चरणों में प्रीति थी और वह विवेक में निपुण थी। उसने सब राक्षसियों को बुलाकर अपना स्वप्न सुनाया और कहा- सीता जी की सेवा करके अपना कल्याण कर लो। स्वप्न में मैंने देखा कि एक वानर ने लंका जला दी है और राक्षसों की सारी सेना मारी गई है। रावण नंगा है और गधे पर सवार है, उसके सिर मुंडे हुए हैं और बीसों भुजाएं कटी हुई हैं। इस प्रकार वह दक्षिण दिशा की ओर जा रहा है। मानो विभीषण ने लंका का राज पा लिया है और नगर में श्री राम जी की दुहाई फिर गई है, तब प्रभु ने सीता जी को बुलवा लिया है। यह स्वप्न मैं पुकार कर कह रही हूँ, यह चार दिनों के बाद सत्य होगा। उसके वचन सुनकर वे सब राक्षसियाँ डर गईं और जानकी जी के चरणों में गिर पड़ीं।
जहँ तहँ गईं सकल तब सीता कर मन सोच।
मास दिवस बीतें मोहि मारिहि निसिचर पोच॥ ११ ॥ अर्थ: फिर वे सब राक्षसियाँ जहाँ-तहाँ (इधर-उधर) चली गईं। तब सीता जी मन में सोच करने लगीं कि एक महीना बीत जाने पर यह नीच राक्षस मुझे मार डालेगा॥ ११ ॥
मास दिवस बीतें मोहि मारिहि निसिचर पोच॥ ११ ॥ अर्थ: फिर वे सब राक्षसियाँ जहाँ-तहाँ (इधर-उधर) चली गईं। तब सीता जी मन में सोच करने लगीं कि एक महीना बीत जाने पर यह नीच राक्षस मुझे मार डालेगा॥ ११ ॥
त्रिजटा सन बोलीं कर जोरी। मातु बिपति संगिनि तैं मोरी॥
तजौं देह करु बेगि उपाई। दुसह बिरहु अब नहिं सहि जाई॥
आनि काठ रचु चिता बनाई। मातु अनल पुनि देहि लगाई॥
सत्य करहि भानुजा भासा। सुनत परम पद प्रीति बिसासा॥
सुनि तेहि बचन चरन गहि समझाएसि। प्रभु प्रताप बल सुजसु सुनाएसि॥
निसि न अनल मिल सुनु सुकुमारी। अस कहि सो निज भवन सिधारी॥
कह सीता बिधि भा प्रतिकूला। मिलिहि न पावक मिटिहि न सूला॥
देखिअत प्रगट गगन अंगारा। अवनि न आवत एकउ तारा॥
पावकमय ससि स्रवत न आगी। मानहुँ मोहि जानि हतभागी॥
सुनहि बिनय मम बिटप असोका। सत्य नाम करु हरु मम सोका॥
नूतन किसलय अनल समाना। देहि अगिनि जनि करहि निदाना॥
देखि परम बिरहाकुल सीता। सो छन कपिहि कलप सम बीता॥ अर्थ: सीता जी ने हाथ जोड़कर त्रिजटा से कहा- हे माता! तू मेरी विपत्ति की संगिनी है। जल्दी कोई ऐसा उपाय कर जिससे मैं यह शरीर छोड़ दूँ, क्योंकि अब यह असह्य विरह सहा नहीं जाता। लकड़ी लाकर चिता बना दे और हे माता! उसमें आग लगा दे। त्रिजटा ने उनके वचन सुनकर चरण पकड़कर उन्हें समझाया और प्रभु का प्रताप, बल और सुयश सुनाया। उसने कहा- हे सुकुमारी सुनो! रात में आग नहीं मिलेगी, ऐसा कहकर वह अपने घर चली गई। सीता जी कहने लगीं कि विधाता मेरे विपरीत हो गया है, न आग मिलेगी और न मेरी पीड़ा मिटेगी। आकाश में अंगारे दिखाई दे रहे हैं, पर एक भी तारा धरती पर नहीं आता। चंद्रमा अग्निमय है, पर वह भी मुझे अभागिनी जानकर आग नहीं बरसाता। हे अशोक वृक्ष! मेरी विनती सुन, अपने नाम को सत्य कर और मेरे शोक को हर ले। तेरे नए पत्ते अग्नि के समान हैं, मुझे आग दे और मेरे दुख का अंत कर। सीता जी को विरह से परम व्याकुल देखकर हनुमान जी को वह एक क्षण भी कल्प के समान बीता।
तजौं देह करु बेगि उपाई। दुसह बिरहु अब नहिं सहि जाई॥
आनि काठ रचु चिता बनाई। मातु अनल पुनि देहि लगाई॥
सत्य करहि भानुजा भासा। सुनत परम पद प्रीति बिसासा॥
सुनि तेहि बचन चरन गहि समझाएसि। प्रभु प्रताप बल सुजसु सुनाएसि॥
निसि न अनल मिल सुनु सुकुमारी। अस कहि सो निज भवन सिधारी॥
कह सीता बिधि भा प्रतिकूला। मिलिहि न पावक मिटिहि न सूला॥
देखिअत प्रगट गगन अंगारा। अवनि न आवत एकउ तारा॥
पावकमय ससि स्रवत न आगी। मानहुँ मोहि जानि हतभागी॥
सुनहि बिनय मम बिटप असोका। सत्य नाम करु हरु मम सोका॥
नूतन किसलय अनल समाना। देहि अगिनि जनि करहि निदाना॥
देखि परम बिरहाकुल सीता। सो छन कपिहि कलप सम बीता॥ अर्थ: सीता जी ने हाथ जोड़कर त्रिजटा से कहा- हे माता! तू मेरी विपत्ति की संगिनी है। जल्दी कोई ऐसा उपाय कर जिससे मैं यह शरीर छोड़ दूँ, क्योंकि अब यह असह्य विरह सहा नहीं जाता। लकड़ी लाकर चिता बना दे और हे माता! उसमें आग लगा दे। त्रिजटा ने उनके वचन सुनकर चरण पकड़कर उन्हें समझाया और प्रभु का प्रताप, बल और सुयश सुनाया। उसने कहा- हे सुकुमारी सुनो! रात में आग नहीं मिलेगी, ऐसा कहकर वह अपने घर चली गई। सीता जी कहने लगीं कि विधाता मेरे विपरीत हो गया है, न आग मिलेगी और न मेरी पीड़ा मिटेगी। आकाश में अंगारे दिखाई दे रहे हैं, पर एक भी तारा धरती पर नहीं आता। चंद्रमा अग्निमय है, पर वह भी मुझे अभागिनी जानकर आग नहीं बरसाता। हे अशोक वृक्ष! मेरी विनती सुन, अपने नाम को सत्य कर और मेरे शोक को हर ले। तेरे नए पत्ते अग्नि के समान हैं, मुझे आग दे और मेरे दुख का अंत कर। सीता जी को विरह से परम व्याकुल देखकर हनुमान जी को वह एक क्षण भी कल्प के समान बीता।
कपि करि हृदयँ बिचार दीन्हि मुद्रिका डारि तब।जनु असोक अंगार दीन्ह हरषि उठि कर गहेउ॥ १२ ॥ अर्थ: तब हनुमान जी ने हृदय में विचार करके श्री राम की मुद्रिका (अँगूठी) नीचे डाल दी। मानो अशोक वृक्ष ने अंगार दे दिया हो, यह समझकर सीता जी ने हर्षित होकर उठकर उसे हाथ में ले लिया॥ १२ ॥
तब देखी मुद्रिका मनोहर। राम नाम अंकित अति सुंदर॥
चकित चितव मुदरी पहिचानी। हरष बिषाद हृदयँ अकुलानी॥
जीति को सकइ अजय रघुराई। माया तें असि रचि नहिं जाई॥
सीता मन बिचार कर नाना। मधुर बचन बोलेउ हनुमाना॥
रामचंद्र गुन बरनैं लागा। सुनतहिं सीता कर दुख भागा॥
लागीं सुनैं श्रवन मन लाई। आदिहु तें सब कथा सुनाई॥
श्रवनामृत जेहिं कथा सुहाई। कही सो प्रगट होति किन भाई॥
तब हनुमंत निकट चलि गयऊ। फिरि बैठीं मन बिसमय भयऊ॥
राम दूत मैं मातु जानकी। सत्य सपथ करुनानिधान की॥
यह मुद्रिका मातु मैं आनी। दीन्हि राम तुम्ह कहँ सहिदानी॥
नर बानरहि संग कहु कैसें। कही कथा भइ संगति जैसें॥ अर्थ: तब उन्होंने उस मनोहर मुद्रिका को देखा, जिस पर श्री राम का नाम अत्यंत सुंदर अंकित था। मुद्रिका को पहचानकर वे चकित होकर देखने लगीं और हृदय में हर्ष और विषाद से अकुला उठीं। उन्होंने सोचा कि श्री रघुनाथ जी तो अजेय हैं, उन्हें कौन जीत सकता है? और माया से ऐसी अंगूठी बनाई नहीं जा सकती। सीता जी मन में अनेक विचार कर रही थीं, तभी हनुमान जी वृक्ष पर से मधुर वचन बोले। वे श्री रामचन्द्र जी के गुणों का वर्णन करने लगे, जिसे सुनते ही सीता जी का दुख भाग गया। वे कान और मन लगाकर सुनने लगीं। हनुमान जी ने शुरू से सारी कथा सुना दी। सीता जी ने कहा- जिसने कानों के लिए अमृत रूपी यह सुंदर कथा कही है, वह भाई प्रकट क्यों नहीं होता? तब हनुमान जी पास चले गए। उन्हें देखकर सीता जी फिरकर बैठ गईं, उनके मन में आश्चर्य हुआ। हनुमान जी ने कहा- हे माता जानकी! मैं श्री राम का दूत हूँ, मुझे करुणानिधान श्री राम की सच्ची शपथ है। हे माता! यह मुद्रिका मैं ही लाया हूँ, श्री राम जी ने मुझे यह निशानी (पहचान) के लिए दी है। सीता जी ने पूछा- नर और वानर का संग कैसे हुआ? तब हनुमान जी ने जैसे संगति हुई थी, वह सारी कथा कह सुनाई।
चकित चितव मुदरी पहिचानी। हरष बिषाद हृदयँ अकुलानी॥
जीति को सकइ अजय रघुराई। माया तें असि रचि नहिं जाई॥
सीता मन बिचार कर नाना। मधुर बचन बोलेउ हनुमाना॥
रामचंद्र गुन बरनैं लागा। सुनतहिं सीता कर दुख भागा॥
लागीं सुनैं श्रवन मन लाई। आदिहु तें सब कथा सुनाई॥
श्रवनामृत जेहिं कथा सुहाई। कही सो प्रगट होति किन भाई॥
तब हनुमंत निकट चलि गयऊ। फिरि बैठीं मन बिसमय भयऊ॥
राम दूत मैं मातु जानकी। सत्य सपथ करुनानिधान की॥
यह मुद्रिका मातु मैं आनी। दीन्हि राम तुम्ह कहँ सहिदानी॥
नर बानरहि संग कहु कैसें। कही कथा भइ संगति जैसें॥ अर्थ: तब उन्होंने उस मनोहर मुद्रिका को देखा, जिस पर श्री राम का नाम अत्यंत सुंदर अंकित था। मुद्रिका को पहचानकर वे चकित होकर देखने लगीं और हृदय में हर्ष और विषाद से अकुला उठीं। उन्होंने सोचा कि श्री रघुनाथ जी तो अजेय हैं, उन्हें कौन जीत सकता है? और माया से ऐसी अंगूठी बनाई नहीं जा सकती। सीता जी मन में अनेक विचार कर रही थीं, तभी हनुमान जी वृक्ष पर से मधुर वचन बोले। वे श्री रामचन्द्र जी के गुणों का वर्णन करने लगे, जिसे सुनते ही सीता जी का दुख भाग गया। वे कान और मन लगाकर सुनने लगीं। हनुमान जी ने शुरू से सारी कथा सुना दी। सीता जी ने कहा- जिसने कानों के लिए अमृत रूपी यह सुंदर कथा कही है, वह भाई प्रकट क्यों नहीं होता? तब हनुमान जी पास चले गए। उन्हें देखकर सीता जी फिरकर बैठ गईं, उनके मन में आश्चर्य हुआ। हनुमान जी ने कहा- हे माता जानकी! मैं श्री राम का दूत हूँ, मुझे करुणानिधान श्री राम की सच्ची शपथ है। हे माता! यह मुद्रिका मैं ही लाया हूँ, श्री राम जी ने मुझे यह निशानी (पहचान) के लिए दी है। सीता जी ने पूछा- नर और वानर का संग कैसे हुआ? तब हनुमान जी ने जैसे संगति हुई थी, वह सारी कथा कह सुनाई।
कपि के बचन सप्रेम सुनि उपजा मन बिस्वास।
जाना मन क्रम बचन यह कृपासिंधु कर दास॥ १३ ॥ अर्थ: हनुमान जी के प्रेमयुक्त वचन सुनकर सीता जी के मन में विश्वास उत्पन्न हो गया और उन्होंने जान लिया कि यह मन, कर्म और वचन से कृपासिंधु श्री राम जी का ही दास है॥ १३ ॥
जाना मन क्रम बचन यह कृपासिंधु कर दास॥ १३ ॥ अर्थ: हनुमान जी के प्रेमयुक्त वचन सुनकर सीता जी के मन में विश्वास उत्पन्न हो गया और उन्होंने जान लिया कि यह मन, कर्म और वचन से कृपासिंधु श्री राम जी का ही दास है॥ १३ ॥
हरि जन जानि प्रीति अति गाढ़ी। सजल नयन पुलकावलि बाढ़ी॥
बूड़त बिरह जलधि हनुमाना। भयहु तात मो कहुँ जलजाना॥
अब कहु कुसल जाउँ बलिहारी। अनुज सहित सुख भवन खरारी॥
कोमलचित कृपाल रघुराई। कपि केहि हेतु धरी निठुराई॥
सहज बानि सेवक सुख दायक। कबहुँक सुरति करत रघुनायक॥
कबहुँ नयन मम सीतल ताता। होइहहिं निरखि स्याम मृदु गाता॥
बचनु न आव नयन भरे बारी। अहह नाथ हौं निपट बिसारी॥
देखि परम बिरहाकुल सीता। बोला कपि मृदु बचन बिनीता॥
मातु कुसल प्रभु अनुज समेता। तव दुख दुखी सुकृपा निकेता॥
जनि जननी मानहु जियँ ऊना। तुम ते प्रेमु राम कें दूना॥ अर्थ: उन्हें भगवान का सेवक जानकर सीता जी की अत्यंत गाढ़ी प्रीति हो गई। उनके नेत्रों में जल भर आया और शरीर में रोमांच हो गया। उन्होंने कहा- हे तात हनुमान! विरह रूपी समुद्र में डूबती हुई मेरे लिए तुम जहाज (सहारा) हुए। मैं बलिहारी जाती हूँ, अब छोटे भाई लक्ष्मण सहित सुख के भवन और खर के शत्रु श्री राम जी की कुशल कहो। श्री रघुनाथ जी तो कोमल हृदय और कृपालु हैं, फिर हे हनुमान! उन्होंने किस कारण यह निठुरता धारण कर ली है? क्या सेवक को सुख देने वाले श्री रघुनाथ जी कभी मेरी याद भी करते हैं? हे तात! क्या कभी उनके साँवले और कोमल अंगों को देखकर मेरे नेत्र शीतल होंगे? उनके मुँह से वचन नहीं निकल रहे थे और नेत्रों में जल भर आया। उन्होंने कहा- हा नाथ! आपने मुझे बिल्कुल ही भुला दिया। सीता जी को विरह में परम व्याकुल देखकर हनुमान जी कोमल और विनीत वचन बोले- हे माता! छोटे भाई सहित प्रभु कुशल से हैं, परंतु हे सुकृपा के धाम माता! वे आपके दुख से दुखी हैं। हे माता! आप मन में ग्लानि (कमी) न मानें, श्री राम जी का प्रेम आपसे भी दूना है।
बूड़त बिरह जलधि हनुमाना। भयहु तात मो कहुँ जलजाना॥
अब कहु कुसल जाउँ बलिहारी। अनुज सहित सुख भवन खरारी॥
कोमलचित कृपाल रघुराई। कपि केहि हेतु धरी निठुराई॥
सहज बानि सेवक सुख दायक। कबहुँक सुरति करत रघुनायक॥
कबहुँ नयन मम सीतल ताता। होइहहिं निरखि स्याम मृदु गाता॥
बचनु न आव नयन भरे बारी। अहह नाथ हौं निपट बिसारी॥
देखि परम बिरहाकुल सीता। बोला कपि मृदु बचन बिनीता॥
मातु कुसल प्रभु अनुज समेता। तव दुख दुखी सुकृपा निकेता॥
जनि जननी मानहु जियँ ऊना। तुम ते प्रेमु राम कें दूना॥ अर्थ: उन्हें भगवान का सेवक जानकर सीता जी की अत्यंत गाढ़ी प्रीति हो गई। उनके नेत्रों में जल भर आया और शरीर में रोमांच हो गया। उन्होंने कहा- हे तात हनुमान! विरह रूपी समुद्र में डूबती हुई मेरे लिए तुम जहाज (सहारा) हुए। मैं बलिहारी जाती हूँ, अब छोटे भाई लक्ष्मण सहित सुख के भवन और खर के शत्रु श्री राम जी की कुशल कहो। श्री रघुनाथ जी तो कोमल हृदय और कृपालु हैं, फिर हे हनुमान! उन्होंने किस कारण यह निठुरता धारण कर ली है? क्या सेवक को सुख देने वाले श्री रघुनाथ जी कभी मेरी याद भी करते हैं? हे तात! क्या कभी उनके साँवले और कोमल अंगों को देखकर मेरे नेत्र शीतल होंगे? उनके मुँह से वचन नहीं निकल रहे थे और नेत्रों में जल भर आया। उन्होंने कहा- हा नाथ! आपने मुझे बिल्कुल ही भुला दिया। सीता जी को विरह में परम व्याकुल देखकर हनुमान जी कोमल और विनीत वचन बोले- हे माता! छोटे भाई सहित प्रभु कुशल से हैं, परंतु हे सुकृपा के धाम माता! वे आपके दुख से दुखी हैं। हे माता! आप मन में ग्लानि (कमी) न मानें, श्री राम जी का प्रेम आपसे भी दूना है।
रघुपति कर संदेसु अब सुनु जननी धरि धीर।
अस कहि कपि गदगद भयउ भरे बिलोचन नीर॥ १४ ॥ अर्थ: हे माता! अब धीरज धरकर श्री रघुनाथ जी का संदेश सुनिए। ऐसा कहते हुए हनुमान जी प्रेम से गदगद हो गए और उनके नेत्रों में जल भर आया॥ १४ ॥
अस कहि कपि गदगद भयउ भरे बिलोचन नीर॥ १४ ॥ अर्थ: हे माता! अब धीरज धरकर श्री रघुनाथ जी का संदेश सुनिए। ऐसा कहते हुए हनुमान जी प्रेम से गदगद हो गए और उनके नेत्रों में जल भर आया॥ १४ ॥
कहेउ राम बियोग तव सीता। मो कहुँ सकल भए बिपरीता॥
नव तरु किसलय मनहुँ कृसानू। कालनिसा सम निसि ससि भानू॥
कुबलय बिपिन कुंत बन सरिसा। बारिद तपत तेल जनु बरिसा॥
जे हित रहे करत तेइ पीरा। उरग स्वास सम त्रिबिध समीरा॥
कहेहू तें कछु दुख घटि होई। काहि कहौं यह जान न कोई॥
तत्व प्रेम कर मम अरु तोरा। जानत प्रिया एकु मनु मोरा॥
सो मनु सदा रहत तोहि पाहीं। जानु प्रीति रसु एतनेहि माहीं॥
प्रभु संदेसु सुनत बैदेही। मगन प्रेम तन सुधि नहिं तेही॥
कह कपि हृदयँ धीर धरु माता। सुमिरु राम सेवक सुखदाता॥
उर आनहु रघुपति प्रभुताई। सुनि मम बचन तजहु कदराई॥ अर्थ: श्री राम जी ने कहा है- हे सीता! तुम्हारे वियोग में मेरे लिए सब कुछ विपरीत हो गया है। वृक्षों के नए पत्ते मानो अग्नि के समान, रात कालरात्रि के समान, और चंद्रमा सूर्य के समान हो गया है। कमलों का वन भालों (बरछियों) के वन के समान हो गया है। बादल मानो खौलता हुआ तेल बरसा रहे हैं। जो हितकारी थे, वे ही अब पीड़ा दे रहे हैं। त्रिविध (शीतल, मंद, सुगंधित) पवन साँप के श्वास के समान हो गया है। दुख कहने से भी कुछ घट जाता है, पर मैं किससे कहूँ? इसे कोई नहीं जानता। हे प्रिये! मेरे और तुम्हारे प्रेम का तत्व (सार) केवल मेरा मन ही जानता है। और वह मन सदा तुम्हारे पास ही रहता है। बस, इतने में ही मेरे प्रेम का रस (सार) जान लो। प्रभु का संदेश सुनते ही जानकी जी प्रेम में मगन हो गईं और उन्हें अपने शरीर की सुध नहीं रही। हनुमान जी ने कहा- हे माता! हृदय में धैर्य धारण करो और सेवकों को सुख देने वाले श्री राम का स्मरण करो। श्री रघुनाथ जी की प्रभुता को हृदय में लाओ और मेरे वचन सुनकर कायरता (डर) छोड़ दो।
नव तरु किसलय मनहुँ कृसानू। कालनिसा सम निसि ससि भानू॥
कुबलय बिपिन कुंत बन सरिसा। बारिद तपत तेल जनु बरिसा॥
जे हित रहे करत तेइ पीरा। उरग स्वास सम त्रिबिध समीरा॥
कहेहू तें कछु दुख घटि होई। काहि कहौं यह जान न कोई॥
तत्व प्रेम कर मम अरु तोरा। जानत प्रिया एकु मनु मोरा॥
सो मनु सदा रहत तोहि पाहीं। जानु प्रीति रसु एतनेहि माहीं॥
प्रभु संदेसु सुनत बैदेही। मगन प्रेम तन सुधि नहिं तेही॥
कह कपि हृदयँ धीर धरु माता। सुमिरु राम सेवक सुखदाता॥
उर आनहु रघुपति प्रभुताई। सुनि मम बचन तजहु कदराई॥ अर्थ: श्री राम जी ने कहा है- हे सीता! तुम्हारे वियोग में मेरे लिए सब कुछ विपरीत हो गया है। वृक्षों के नए पत्ते मानो अग्नि के समान, रात कालरात्रि के समान, और चंद्रमा सूर्य के समान हो गया है। कमलों का वन भालों (बरछियों) के वन के समान हो गया है। बादल मानो खौलता हुआ तेल बरसा रहे हैं। जो हितकारी थे, वे ही अब पीड़ा दे रहे हैं। त्रिविध (शीतल, मंद, सुगंधित) पवन साँप के श्वास के समान हो गया है। दुख कहने से भी कुछ घट जाता है, पर मैं किससे कहूँ? इसे कोई नहीं जानता। हे प्रिये! मेरे और तुम्हारे प्रेम का तत्व (सार) केवल मेरा मन ही जानता है। और वह मन सदा तुम्हारे पास ही रहता है। बस, इतने में ही मेरे प्रेम का रस (सार) जान लो। प्रभु का संदेश सुनते ही जानकी जी प्रेम में मगन हो गईं और उन्हें अपने शरीर की सुध नहीं रही। हनुमान जी ने कहा- हे माता! हृदय में धैर्य धारण करो और सेवकों को सुख देने वाले श्री राम का स्मरण करो। श्री रघुनाथ जी की प्रभुता को हृदय में लाओ और मेरे वचन सुनकर कायरता (डर) छोड़ दो।
निसिचर निकर पतंग सम रघुपति बान कृसानु।
जननी हृदयँ धीर धरु जरे निसाचर जानु॥ १५ ॥ अर्थ: राक्षसों का समूह पतंगों के समान है और श्री रघुनाथ जी के बाण अग्नि के समान हैं। हे माता! हृदय में धैर्य धारण करो और राक्षसों को जला ही जानो॥ १५ ॥
जननी हृदयँ धीर धरु जरे निसाचर जानु॥ १५ ॥ अर्थ: राक्षसों का समूह पतंगों के समान है और श्री रघुनाथ जी के बाण अग्नि के समान हैं। हे माता! हृदय में धैर्य धारण करो और राक्षसों को जला ही जानो॥ १५ ॥
🌸 भाग 4: दोहा 16 से 20
हैं सुत कपि सब तुम्हहि समाना। जातुधान अति भट बलवाना॥
मोरें हृदय परम संदेहा। सुनि कपि प्रगट कीन्ह निज देहा॥
कनक भूधराकार सरीरा। समर भयंकर अतिबल बीरा॥
सीता मन भरोस तब भयऊ। पुनि लघु रूप पवनसुत लयऊ॥ अर्थ: (सीता जी ने कहा-) हे पुत्र! क्या सब वानर तुम्हारे ही समान (छोटे) हैं? राक्षस तो बड़े भारी बलवान योद्धा हैं। इसलिए मेरे हृदय में बड़ा संदेह है (कि तुम लोग राक्षसों से कैसे जीतोगे?) यह सुनकर हनुमान जी ने अपना असली रूप प्रकट कर दिया। उनका शरीर सोने के पर्वत (सुमेरु) के आकार का, युद्ध में अत्यंत भयंकर और अत्यंत बलवान वीर का था। तब सीता जी के मन में भरोसा हो गया। फिर पवनपुत्र ने अपना वही छोटा रूप धारण कर लिया।
मोरें हृदय परम संदेहा। सुनि कपि प्रगट कीन्ह निज देहा॥
कनक भूधराकार सरीरा। समर भयंकर अतिबल बीरा॥
सीता मन भरोस तब भयऊ। पुनि लघु रूप पवनसुत लयऊ॥ अर्थ: (सीता जी ने कहा-) हे पुत्र! क्या सब वानर तुम्हारे ही समान (छोटे) हैं? राक्षस तो बड़े भारी बलवान योद्धा हैं। इसलिए मेरे हृदय में बड़ा संदेह है (कि तुम लोग राक्षसों से कैसे जीतोगे?) यह सुनकर हनुमान जी ने अपना असली रूप प्रकट कर दिया। उनका शरीर सोने के पर्वत (सुमेरु) के आकार का, युद्ध में अत्यंत भयंकर और अत्यंत बलवान वीर का था। तब सीता जी के मन में भरोसा हो गया। फिर पवनपुत्र ने अपना वही छोटा रूप धारण कर लिया।
सुनु माता साखामृग नहिं बल बुद्धि बिसाल。
प्रभु प्रताप तें गरुड़हि खाइ परम लघु ब्याल॥ १६ ॥ अर्थ: हनुमान जी ने कहा- हे माता! सुनो, वानरों (शाखामृग) में बहुत बल और बुद्धि नहीं होती, परंतु प्रभु के प्रताप से बहुत छोटा सर्प भी गरुड़ को खा सकता है॥ १६ ॥
प्रभु प्रताप तें गरुड़हि खाइ परम लघु ब्याल॥ १६ ॥ अर्थ: हनुमान जी ने कहा- हे माता! सुनो, वानरों (शाखामृग) में बहुत बल और बुद्धि नहीं होती, परंतु प्रभु के प्रताप से बहुत छोटा सर्प भी गरुड़ को खा सकता है॥ १६ ॥
मन संतोष सुनत कपि बानी। भगति प्रताप तेज बल सानी॥
आसिष दीन्हि रामप्रिय जाना। होहु तात बल सील निधाना॥
अजर अमर गुननिधि सुत होहू। करहुँ बहुत रघुनायक छोहू॥
करहुँ कृपा प्रभु अस सुनि काना। निर्भर प्रेम मगन हनुमाना॥
बार बार नाएसि पद सीसा। बोला बचन जोरि कर कीसा॥
अब कृतकृत्य भयउँ मैं माता। आसिष तव अमोघ बिख्याता॥
सुनहु मातु मोहि अतिसय भूखा। लागि देखि सुंदर फल रूखा॥
सुनु सुत करहिं बिपिन रखवारी। परम सुभट रजनीचर भारी॥
तिन्ह कर भय माता मोहि नाहीं। जौं तुम्ह सुख मानहु मन माहीं॥ अर्थ: हनुमान जी की भक्ति, प्रताप, तेज और बल से सनी हुई वाणी सुनकर सीता जी के मन में संतोष हुआ। उन्होंने श्री राम जी का प्रिय जानकर हनुमान जी को आशीर्वाद दिया- हे तात! तुम बल और शील के निधान होओ। हे पुत्र! तुम अजर (बुढ़ापे से रहित), अमर और गुणों के खजाने होओ। श्री रघुनाथ जी तुम पर बहुत कृपा करें। 'प्रभु कृपा करें' यह कानों से सुनते ही हनुमान जी पूर्ण प्रेम में मगन हो गए। उन्होंने बार-बार सीता जी के चरणों में सिर नवाया और हाथ जोड़कर बोले- हे माता! अब मैं कृतार्थ (सफल) हो गया। आपका आशीर्वाद अमोघ है, यह बात विख्यात है। हे माता! सुनिए, इन सुंदर फल वाले वृक्षों को देखकर मुझे बड़ी जोरों की भूख लग आई है। सीता जी ने कहा- हे बेटा सुनो, बड़े भारी योद्धा राक्षस इस वन की रखवाली करते हैं। हनुमान जी ने कहा- हे माता! यदि आप मन में प्रसन्न होकर आज्ञा दें, तो मुझे उनका कोई भय नहीं है।
आसिष दीन्हि रामप्रिय जाना। होहु तात बल सील निधाना॥
अजर अमर गुननिधि सुत होहू। करहुँ बहुत रघुनायक छोहू॥
करहुँ कृपा प्रभु अस सुनि काना। निर्भर प्रेम मगन हनुमाना॥
बार बार नाएसि पद सीसा। बोला बचन जोरि कर कीसा॥
अब कृतकृत्य भयउँ मैं माता। आसिष तव अमोघ बिख्याता॥
सुनहु मातु मोहि अतिसय भूखा। लागि देखि सुंदर फल रूखा॥
सुनु सुत करहिं बिपिन रखवारी। परम सुभट रजनीचर भारी॥
तिन्ह कर भय माता मोहि नाहीं। जौं तुम्ह सुख मानहु मन माहीं॥ अर्थ: हनुमान जी की भक्ति, प्रताप, तेज और बल से सनी हुई वाणी सुनकर सीता जी के मन में संतोष हुआ। उन्होंने श्री राम जी का प्रिय जानकर हनुमान जी को आशीर्वाद दिया- हे तात! तुम बल और शील के निधान होओ। हे पुत्र! तुम अजर (बुढ़ापे से रहित), अमर और गुणों के खजाने होओ। श्री रघुनाथ जी तुम पर बहुत कृपा करें। 'प्रभु कृपा करें' यह कानों से सुनते ही हनुमान जी पूर्ण प्रेम में मगन हो गए। उन्होंने बार-बार सीता जी के चरणों में सिर नवाया और हाथ जोड़कर बोले- हे माता! अब मैं कृतार्थ (सफल) हो गया। आपका आशीर्वाद अमोघ है, यह बात विख्यात है। हे माता! सुनिए, इन सुंदर फल वाले वृक्षों को देखकर मुझे बड़ी जोरों की भूख लग आई है। सीता जी ने कहा- हे बेटा सुनो, बड़े भारी योद्धा राक्षस इस वन की रखवाली करते हैं। हनुमान जी ने कहा- हे माता! यदि आप मन में प्रसन्न होकर आज्ञा दें, तो मुझे उनका कोई भय नहीं है।
देखि बुद्धि बल निपुन कपि कहेउ जानकीं जाहु。
रघुपति चरन हृदयँ धरि तात मधुर फल खाहु॥ १७ ॥ अर्थ: हनुमान जी को बुद्धि और बल में निपुण देखकर जानकी जी ने कहा- जाओ। हे तात! श्री रघुनाथ जी के चरणों को हृदय में धारण करके मीठे फल खाओ॥ १७ ॥
रघुपति चरन हृदयँ धरि तात मधुर फल खाहु॥ १७ ॥ अर्थ: हनुमान जी को बुद्धि और बल में निपुण देखकर जानकी जी ने कहा- जाओ। हे तात! श्री रघुनाथ जी के चरणों को हृदय में धारण करके मीठे फल खाओ॥ १७ ॥
चलेउ नाइ सिरु पैठेउ बागा। फल खाएसि तरु तोरैं लागा॥
रहे तहाँ बहु भट रखवारे। कछु मारेसि कछु जाइ पुकारे॥
नाथ एक आवा कपि भारी। तेहिं असोक बाटिका उजारी॥
खाएसि फल अरु बिटप उपारे। रच्छक मर्दि मर्दि महि डारे॥
सुनि रावन पठए भट नाना। तिन्हहि देखि गर्जेउ हनुमाना॥
सब रजनीचर कपि संघारे। गए पुकारत कछु अधमारे॥
पुनि पठयउ तेहिं अच्छकुमारा। चला संग लै सुभट अपारा॥
आवत देखि बिटप गहि तर्जा। ताहि निपाति महाधुनि गर्जा॥ अर्थ: सीता जी को सिर नवाकर हनुमान जी चले और बाग में घुस गए। उन्होंने फल खाए और पेड़ों को तोड़ने लगे। वहाँ बहुत से योद्धा रखवाले थे, उनमें से कुछ को हनुमान जी ने मार डाला और कुछ ने जाकर रावण से पुकार की कि हे नाथ! एक बहुत बड़ा वानर आया है, उसने अशोक वाटिका उजाड़ दी है। उसने फल खाए, वृक्षों को उखाड़ डाला और रक्षकों को मसल-मसलकर जमीन पर डाल दिया है। यह सुनकर रावण ने बहुत से योद्धा भेजे। उन्हें देखकर हनुमान जी गर्जे और सब राक्षसों को मार डाला। जो कुछ अधमरे बचे थे, वे पुकारते हुए गए। तब रावण ने अपने पुत्र अक्षयकुमार को भेजा। वह अपने साथ अपार श्रेष्ठ योद्धाओं को लेकर चला। उसे आते देखकर हनुमान जी ने एक वृक्ष लेकर उसे ललकारा और उसे मारकर बड़े जोर से गर्जना की।
रहे तहाँ बहु भट रखवारे। कछु मारेसि कछु जाइ पुकारे॥
नाथ एक आवा कपि भारी। तेहिं असोक बाटिका उजारी॥
खाएसि फल अरु बिटप उपारे। रच्छक मर्दि मर्दि महि डारे॥
सुनि रावन पठए भट नाना। तिन्हहि देखि गर्जेउ हनुमाना॥
सब रजनीचर कपि संघारे। गए पुकारत कछु अधमारे॥
पुनि पठयउ तेहिं अच्छकुमारा। चला संग लै सुभट अपारा॥
आवत देखि बिटप गहि तर्जा। ताहि निपाति महाधुनि गर्जा॥ अर्थ: सीता जी को सिर नवाकर हनुमान जी चले और बाग में घुस गए। उन्होंने फल खाए और पेड़ों को तोड़ने लगे। वहाँ बहुत से योद्धा रखवाले थे, उनमें से कुछ को हनुमान जी ने मार डाला और कुछ ने जाकर रावण से पुकार की कि हे नाथ! एक बहुत बड़ा वानर आया है, उसने अशोक वाटिका उजाड़ दी है। उसने फल खाए, वृक्षों को उखाड़ डाला और रक्षकों को मसल-मसलकर जमीन पर डाल दिया है। यह सुनकर रावण ने बहुत से योद्धा भेजे। उन्हें देखकर हनुमान जी गर्जे और सब राक्षसों को मार डाला। जो कुछ अधमरे बचे थे, वे पुकारते हुए गए। तब रावण ने अपने पुत्र अक्षयकुमार को भेजा। वह अपने साथ अपार श्रेष्ठ योद्धाओं को लेकर चला। उसे आते देखकर हनुमान जी ने एक वृक्ष लेकर उसे ललकारा और उसे मारकर बड़े जोर से गर्जना की।
कछु मारेसि कछु मर्देसि कछु मिलाएसि धरि धूरि。
कछु पुनि जाइ पुकारे प्रभु मर्कट बल भूरि॥ १८ ॥ अर्थ: हनुमान जी ने अक्षयकुमार की सेना में से कुछ को मार डाला, कुछ को मसल दिया और कुछ को पकड़कर धूल में मिला दिया। जो कुछ बच गए, उन्होंने जाकर पुकार की कि हे प्रभु! उस वानर में बहुत ही अधिक बल है॥ १८ ॥
कछु पुनि जाइ पुकारे प्रभु मर्कट बल भूरि॥ १८ ॥ अर्थ: हनुमान जी ने अक्षयकुमार की सेना में से कुछ को मार डाला, कुछ को मसल दिया और कुछ को पकड़कर धूल में मिला दिया। जो कुछ बच गए, उन्होंने जाकर पुकार की कि हे प्रभु! उस वानर में बहुत ही अधिक बल है॥ १८ ॥
सुनि सुत बध दसानन रिसाना। पठएसि मेघनाद बलवाना॥
मारसि जनि सुत बाँधेसु ताही। देखिअ कपिहि कहाँ कर आही॥
चला इंद्रजित अतुलित जोधा। बंधु निधन सुनि उपजा क्रोधा॥
कपि देखा दारुन भट आवा। कटकटाइ गर्जा अरु धावा॥
अति बिसाल तरु एक उपारा। बिरथ कीन्ह लंकेस कुमारा॥
रहे महाभट ताके संगा। गहि गहि कपि मर्दइ निज अंगा॥
तिन्हहि निपाति ताहि सन बाजा। भिरे जुगल मानहुँ गजराजा॥
मुठिका मारि चढ़ा तरु जाई। ताहि एक छन मुरुछा आई॥
उठि बहोरि कीन्हिसि बहु माया। जीति न जाइ प्रभंजन जाया॥ अर्थ: पुत्र (अक्षयकुमार) का वध सुनकर रावण क्रोधित हुआ और उसने अपने बलवान पुत्र मेघनाद को भेजा। (उसने कहा-) हे पुत्र! उसे मारना मत, उसे बाँध लाना। उस वानर को देखा जाए कि वह कहाँ का है। अतुलनीय योद्धा इंद्रजित चला, भाई की मृत्यु का समाचार सुनकर उसे बहुत क्रोध आया। हनुमान जी ने देखा कि एक भयंकर योद्धा आ रहा है, तो वे कटकटाकर गर्जे और दौड़े। उन्होंने एक बहुत विशाल पेड़ उखाड़ लिया और लंकापति रावण के पुत्र (मेघनाद) को बेरथ कर दिया। उसके साथ जो बड़े-बड़े योद्धा थे, हनुमान जी ने उन्हें पकड़-पकड़कर अपने शरीर से मसल दिया। उन्हें मारकर हनुमान जी मेघनाद से भिड़ गए। वे दोनों ऐसे लड़ रहे थे मानो दो गजराज (हाथी) भिड़ गए हों। हनुमान जी ने उसे एक घूंसा मारा और वृक्ष पर चढ़ गए। मेघनाद को क्षण भर के लिए मूर्छा आ गई। फिर उठकर उसने बहुत सी माया रची, परंतु पवनपुत्र हनुमान जी उससे जीते नहीं जा सके।
मारसि जनि सुत बाँधेसु ताही। देखिअ कपिहि कहाँ कर आही॥
चला इंद्रजित अतुलित जोधा। बंधु निधन सुनि उपजा क्रोधा॥
कपि देखा दारुन भट आवा। कटकटाइ गर्जा अरु धावा॥
अति बिसाल तरु एक उपारा। बिरथ कीन्ह लंकेस कुमारा॥
रहे महाभट ताके संगा। गहि गहि कपि मर्दइ निज अंगा॥
तिन्हहि निपाति ताहि सन बाजा। भिरे जुगल मानहुँ गजराजा॥
मुठिका मारि चढ़ा तरु जाई। ताहि एक छन मुरुछा आई॥
उठि बहोरि कीन्हिसि बहु माया। जीति न जाइ प्रभंजन जाया॥ अर्थ: पुत्र (अक्षयकुमार) का वध सुनकर रावण क्रोधित हुआ और उसने अपने बलवान पुत्र मेघनाद को भेजा। (उसने कहा-) हे पुत्र! उसे मारना मत, उसे बाँध लाना। उस वानर को देखा जाए कि वह कहाँ का है। अतुलनीय योद्धा इंद्रजित चला, भाई की मृत्यु का समाचार सुनकर उसे बहुत क्रोध आया। हनुमान जी ने देखा कि एक भयंकर योद्धा आ रहा है, तो वे कटकटाकर गर्जे और दौड़े। उन्होंने एक बहुत विशाल पेड़ उखाड़ लिया और लंकापति रावण के पुत्र (मेघनाद) को बेरथ कर दिया। उसके साथ जो बड़े-बड़े योद्धा थे, हनुमान जी ने उन्हें पकड़-पकड़कर अपने शरीर से मसल दिया। उन्हें मारकर हनुमान जी मेघनाद से भिड़ गए। वे दोनों ऐसे लड़ रहे थे मानो दो गजराज (हाथी) भिड़ गए हों। हनुमान जी ने उसे एक घूंसा मारा और वृक्ष पर चढ़ गए। मेघनाद को क्षण भर के लिए मूर्छा आ गई। फिर उठकर उसने बहुत सी माया रची, परंतु पवनपुत्र हनुमान जी उससे जीते नहीं जा सके।
ब्रह्म अस्त्र तेहिं साँधा कपि मन कीन्ह बिचार。
जौं न ब्रह्मसर मानउँ महिमा मिटइ अपार॥ १९ ॥ अर्थ: अंत में उसने (मेघनाद ने) ब्रह्मास्त्र का संधान किया (ब्रह्मास्त्र चलाया)। तब हनुमान जी ने मन में विचार किया कि यदि मैं ब्रह्मास्त्र को नहीं मानता हूँ, तो उसकी अपार महिमा मिट जाएगी॥ १९ ॥
जौं न ब्रह्मसर मानउँ महिमा मिटइ अपार॥ १९ ॥ अर्थ: अंत में उसने (मेघनाद ने) ब्रह्मास्त्र का संधान किया (ब्रह्मास्त्र चलाया)। तब हनुमान जी ने मन में विचार किया कि यदि मैं ब्रह्मास्त्र को नहीं मानता हूँ, तो उसकी अपार महिमा मिट जाएगी॥ १९ ॥
ब्रह्मबान कपि कहुँ तेहि मारा। परतिहुँ बार कटक संघारा॥
तेहि देखा कपि मुरुछित भयऊ। नागपास बाँधेसि लै गयऊ॥
जासु नाम जपि सुनहु भवानी। भव बंधन काटहिं नर ग्यानी॥
तासु दूत कि बंध तरु आवा। प्रभु कारज लगि कपिहिं बँधावा॥
कपि बंधन सुनि निसिचर धाए। कौतुक लागि सभाँ सब आए॥
दसमुख सभा दीखि कपि जाई। कहि न जाइ कछु अति प्रभुताई॥
कर जोरें सुर दिसिप बिनीता। भृकुटि बिलोकत सकल सभीता॥
देखि प्रताप न कपि मन संका। जिमि अहीस लगि लघु अहंका॥ अर्थ: मेघनाद ने हनुमान जी को ब्रह्मास्त्र मारा। हनुमान जी ने पेड़ से गिरते समय भी बहुत सी सेना का संहार कर दिया। मेघनाद ने जब देखा कि हनुमान जी मूर्छित हो गए हैं, तो उसने उन्हें नागपाश में बाँध लिया और ले गया। शिवजी कहते हैं- हे भवानी सुनो! जिनका नाम जपकर ज्ञानी मनुष्य संसार के बंधन काट डालते हैं, क्या उनका दूत कभी बंधन में आ सकता है? प्रभु के कार्य के लिए ही हनुमान जी ने स्वयं को बंधवा लिया। वानर का बंधना सुनकर बहुत से राक्षस दौड़े और तमाशा देखने के लिए सब सभा में आ गए। हनुमान जी ने जाकर रावण की सभा देखी। उसकी अत्यंत प्रभुता (ऐश्वर्य) कुछ कही नहीं जाती। देवता और दिक्पाल हाथ जोड़े विनीत भाव से खड़े थे और सब डरे हुए उसकी भौंहों की ओर देख रहे थे। रावण का इतना प्रताप देखकर भी हनुमान जी के मन में जरा भी शंका (भय) नहीं हुई, ठीक वैसे ही जैसे सर्पों के राजा (शेषनाग) को किसी छोटे से साँप से कोई डर नहीं होता।
तेहि देखा कपि मुरुछित भयऊ। नागपास बाँधेसि लै गयऊ॥
जासु नाम जपि सुनहु भवानी। भव बंधन काटहिं नर ग्यानी॥
तासु दूत कि बंध तरु आवा। प्रभु कारज लगि कपिहिं बँधावा॥
कपि बंधन सुनि निसिचर धाए। कौतुक लागि सभाँ सब आए॥
दसमुख सभा दीखि कपि जाई। कहि न जाइ कछु अति प्रभुताई॥
कर जोरें सुर दिसिप बिनीता। भृकुटि बिलोकत सकल सभीता॥
देखि प्रताप न कपि मन संका। जिमि अहीस लगि लघु अहंका॥ अर्थ: मेघनाद ने हनुमान जी को ब्रह्मास्त्र मारा। हनुमान जी ने पेड़ से गिरते समय भी बहुत सी सेना का संहार कर दिया। मेघनाद ने जब देखा कि हनुमान जी मूर्छित हो गए हैं, तो उसने उन्हें नागपाश में बाँध लिया और ले गया। शिवजी कहते हैं- हे भवानी सुनो! जिनका नाम जपकर ज्ञानी मनुष्य संसार के बंधन काट डालते हैं, क्या उनका दूत कभी बंधन में आ सकता है? प्रभु के कार्य के लिए ही हनुमान जी ने स्वयं को बंधवा लिया। वानर का बंधना सुनकर बहुत से राक्षस दौड़े और तमाशा देखने के लिए सब सभा में आ गए। हनुमान जी ने जाकर रावण की सभा देखी। उसकी अत्यंत प्रभुता (ऐश्वर्य) कुछ कही नहीं जाती। देवता और दिक्पाल हाथ जोड़े विनीत भाव से खड़े थे और सब डरे हुए उसकी भौंहों की ओर देख रहे थे। रावण का इतना प्रताप देखकर भी हनुमान जी के मन में जरा भी शंका (भय) नहीं हुई, ठीक वैसे ही जैसे सर्पों के राजा (शेषनाग) को किसी छोटे से साँप से कोई डर नहीं होता।
कपिहि बिलोकि दसानन बिहँसा कहि दुर्बाद。सुत बध सुरति कीन्हि पुनि उपजा हृदयँ बिषाद॥ २० ॥ अर्थ: हनुमान जी को देखकर रावण दुर्वचन (अपशब्द) कहता हुआ जोर से हँसा। परंतु फिर अपने पुत्र (अक्षयकुमार) के वध का स्मरण करके उसके हृदय में विषाद (दुख) उत्पन्न हो गया॥ २० ॥
🌸 भाग 5: दोहा 21 से 25
कह लंकेस कवन तैं कीसा। केहिं के बल घालेहि बन खीसा॥
की धौं श्रवन सुनेहि नहिं मोही। देखउँ अति असंक सठ तोही॥
मारे निसिचर केहिं अपराधा। कहु सठ तोहि न प्रान कइ बाधा॥
सुन रावन ब्रह्मांड निकाया। पाइ जासु बल बिरचति माया॥
जाकें बल बिरंचि हरि ईसा। पालत सृजत हरत दससीसा॥
जा बल सीस धरत सहसानन। अंडकोस समेत गिरि कानन॥
धरइ जो बिबिध देह सुरत्राता। तुम्ह से सठन्ह सिखावनु दाता॥
हर कोदंड कठिन जेहि भंजा। तेहि समेत नृप दल मद गंजा॥
खर दूषन त्रिसिरा अरु बाली। बधे सकल अतुलित बलसाली॥ अर्थ: रावण ने कहा- हे वानर! तू कौन है? किसके बल पर तूने वन को उजाड़ डाला? क्या तूने कभी मेरे बारे में नहीं सुना? तू मुझे बहुत निडर लग रहा है। तूने किस अपराध से राक्षसों को मारा? हे मूर्ख! बता, क्या तुझे प्राण जाने का डर नहीं है? हनुमान जी ने कहा- हे रावण, सुन! जिनकी शक्ति पाकर माया पूरे ब्रह्मांड की रचना करती है; जिनके बल से ब्रह्मा, विष्णु और महेश सृष्टि का सृजन, पालन और संहार करते हैं; जिनके बल से सहस्र फन वाले शेषनाग पर्वतों और वनों सहित पूरे ब्रह्मांड को अपने सिर पर धारण करते हैं; जो देवताओं की रक्षा के लिए अनेक रूप धारण करते हैं और तुम्हारे जैसे मूर्खों को शिक्षा देने वाले हैं; जिन्होंने शिवजी का कठोर धनुष तोड़ा और राजाओं के अहंकार को नष्ट किया; जिन्होंने खर, दूषण, त्रिशिरा और बालि जैसे अतुलित बलवानों का वध किया।
की धौं श्रवन सुनेहि नहिं मोही। देखउँ अति असंक सठ तोही॥
मारे निसिचर केहिं अपराधा। कहु सठ तोहि न प्रान कइ बाधा॥
सुन रावन ब्रह्मांड निकाया। पाइ जासु बल बिरचति माया॥
जाकें बल बिरंचि हरि ईसा। पालत सृजत हरत दससीसा॥
जा बल सीस धरत सहसानन। अंडकोस समेत गिरि कानन॥
धरइ जो बिबिध देह सुरत्राता। तुम्ह से सठन्ह सिखावनु दाता॥
हर कोदंड कठिन जेहि भंजा। तेहि समेत नृप दल मद गंजा॥
खर दूषन त्रिसिरा अरु बाली। बधे सकल अतुलित बलसाली॥ अर्थ: रावण ने कहा- हे वानर! तू कौन है? किसके बल पर तूने वन को उजाड़ डाला? क्या तूने कभी मेरे बारे में नहीं सुना? तू मुझे बहुत निडर लग रहा है। तूने किस अपराध से राक्षसों को मारा? हे मूर्ख! बता, क्या तुझे प्राण जाने का डर नहीं है? हनुमान जी ने कहा- हे रावण, सुन! जिनकी शक्ति पाकर माया पूरे ब्रह्मांड की रचना करती है; जिनके बल से ब्रह्मा, विष्णु और महेश सृष्टि का सृजन, पालन और संहार करते हैं; जिनके बल से सहस्र फन वाले शेषनाग पर्वतों और वनों सहित पूरे ब्रह्मांड को अपने सिर पर धारण करते हैं; जो देवताओं की रक्षा के लिए अनेक रूप धारण करते हैं और तुम्हारे जैसे मूर्खों को शिक्षा देने वाले हैं; जिन्होंने शिवजी का कठोर धनुष तोड़ा और राजाओं के अहंकार को नष्ट किया; जिन्होंने खर, दूषण, त्रिशिरा और बालि जैसे अतुलित बलवानों का वध किया।
जाके बल लवलेस तें जितेहु चराचर झारि।
तासु दूत मैं जा करि हरि आनेहु प्रिय नारि॥ २१ ॥ अर्थ: जिनके लेशमात्र बल से ही तुमने संपूर्ण चराचर जगत् को जीत लिया है, मैं उन्हीं श्री राम का दूत हूँ, जिनकी प्रिय पत्नी को तुम चुरा लाए हो॥ २१ ॥
तासु दूत मैं जा करि हरि आनेहु प्रिय नारि॥ २१ ॥ अर्थ: जिनके लेशमात्र बल से ही तुमने संपूर्ण चराचर जगत् को जीत लिया है, मैं उन्हीं श्री राम का दूत हूँ, जिनकी प्रिय पत्नी को तुम चुरा लाए हो॥ २१ ॥
जानउँ मैं तुम्हारि प्रभुताई। सहसबाहु सन परी लराई॥
समर बालि सन करि जसु पावा। सुनि कपि बचन बिहसि बिहरावा॥
खायउँ फल प्रभु लागी भूँखा। कपि सुभाव तें तोरेउँ रूखा॥
सब कें देह परम प्रिय स्वामी। मारहिं मोहि कुमारग गामी॥
जिन्ह मोहि मारा ते मैं मारे। तेहि पर बाँधेउँ तनयँ तुम्हारे॥
मोहि न कछु बाँधे कइ लाजा। कीन्ह चहउँ निज प्रभु कर काजा॥
बिनती करउँ जोरि कर रावन। सुनहु मान तजि मोर सिखावन॥
देखहु तुम्ह निज कुलहि बिचारी। भ्रम तजि भजहु भगत भय हारी॥
जाकें डर अति काल डेराई। जो सुर असुर चराचर खाई॥
तासों बयरु कबहुँ नहिं कीजै। मोरे कहें जानकी दीजै॥ अर्थ: मैं तुम्हारी प्रभुता को जानता हूँ! सहस्रबाहु से तुम्हारी लड़ाई हुई थी और बालि से भी युद्ध करके तुमने यश पाया था। (हनुमान जी के ये व्यंग्य वचन सुनकर रावण हँसने लगा)। हनुमान जी ने कहा- हे प्रभु! मुझे भूख लगी थी इसलिए मैंने फल खाए, और वानर स्वभाव के कारण वृक्षों को तोड़ डाला। हे स्वामी! शरीर सबको परम प्रिय होता है, जब कुमार्ग पर चलने वाले राक्षसों ने मुझे मारा, तब मैंने भी उन्हें मारा। उस पर तुम्हारे पुत्र ने मुझे बाँध लिया, पर मुझे बँधने में कोई लाज नहीं है क्योंकि मैं अपने प्रभु का कार्य करना चाहता हूँ। हे रावण! मैं हाथ जोड़कर तुमसे विनती करता हूँ, तुम अभिमान छोड़कर मेरी सीख सुनो। अपने कुल का विचार कर देखो और भ्रम छोड़कर भयनाशक भगवान (श्री राम) का भजन करो। जिसके डर से काल भी डरता है, जो देवता और दानव सहित पूरे चराचर को खा जाता है, उनसे कभी बैर नहीं करना चाहिए। मेरे कहने से जानकी जी को लौटा दो।
समर बालि सन करि जसु पावा। सुनि कपि बचन बिहसि बिहरावा॥
खायउँ फल प्रभु लागी भूँखा। कपि सुभाव तें तोरेउँ रूखा॥
सब कें देह परम प्रिय स्वामी। मारहिं मोहि कुमारग गामी॥
जिन्ह मोहि मारा ते मैं मारे। तेहि पर बाँधेउँ तनयँ तुम्हारे॥
मोहि न कछु बाँधे कइ लाजा। कीन्ह चहउँ निज प्रभु कर काजा॥
बिनती करउँ जोरि कर रावन। सुनहु मान तजि मोर सिखावन॥
देखहु तुम्ह निज कुलहि बिचारी। भ्रम तजि भजहु भगत भय हारी॥
जाकें डर अति काल डेराई। जो सुर असुर चराचर खाई॥
तासों बयरु कबहुँ नहिं कीजै। मोरे कहें जानकी दीजै॥ अर्थ: मैं तुम्हारी प्रभुता को जानता हूँ! सहस्रबाहु से तुम्हारी लड़ाई हुई थी और बालि से भी युद्ध करके तुमने यश पाया था। (हनुमान जी के ये व्यंग्य वचन सुनकर रावण हँसने लगा)। हनुमान जी ने कहा- हे प्रभु! मुझे भूख लगी थी इसलिए मैंने फल खाए, और वानर स्वभाव के कारण वृक्षों को तोड़ डाला। हे स्वामी! शरीर सबको परम प्रिय होता है, जब कुमार्ग पर चलने वाले राक्षसों ने मुझे मारा, तब मैंने भी उन्हें मारा। उस पर तुम्हारे पुत्र ने मुझे बाँध लिया, पर मुझे बँधने में कोई लाज नहीं है क्योंकि मैं अपने प्रभु का कार्य करना चाहता हूँ। हे रावण! मैं हाथ जोड़कर तुमसे विनती करता हूँ, तुम अभिमान छोड़कर मेरी सीख सुनो। अपने कुल का विचार कर देखो और भ्रम छोड़कर भयनाशक भगवान (श्री राम) का भजन करो। जिसके डर से काल भी डरता है, जो देवता और दानव सहित पूरे चराचर को खा जाता है, उनसे कभी बैर नहीं करना चाहिए। मेरे कहने से जानकी जी को लौटा दो।
प्रनतपाल रघुनायक करुना सिंधु खरारि।
गएँ सरन प्रभु राखिहैं तव अपराध बिसारि॥ २२ ॥ अर्थ: श्री रघुनाथ जी शरणागतों के रक्षक, करुणा के सागर और खर राक्षस के शत्रु हैं। उनकी शरण में जाने पर वे तुम्हारे सारे अपराध भुलाकर तुम्हारी रक्षा करेंगे॥ २२ ॥
गएँ सरन प्रभु राखिहैं तव अपराध बिसारि॥ २२ ॥ अर्थ: श्री रघुनाथ जी शरणागतों के रक्षक, करुणा के सागर और खर राक्षस के शत्रु हैं। उनकी शरण में जाने पर वे तुम्हारे सारे अपराध भुलाकर तुम्हारी रक्षा करेंगे॥ २२ ॥
राम चरन पंकज उर धरहू। लंका अचल राज तुम्ह करहू॥
रिषि पुलस्ति जसु बिमल मयंका। तेहि ससि महुँ जनि होहु कलंका॥
राम नाम बिनु गिरा न सोहा। देखु बिचारि त्यागि मद मोहा॥
बसन हीन नहिं सोह सुरारी। सब भूषन भूषित बर नारी॥
राम बिमुख संपति प्रभुताई। जाइ रही पाई बिनु पाई॥
सजल मूल जिन्ह सरितन्ह नाहीं। बरषि गएँ पुनि तबहिं सुखाहीं॥
सुनु दसकंठ कहउँ पन रोपी। बिमुख राम त्राता नहिं कोपी॥
संकर सहस बिष्नु अज तोही। सकहिं न राखि राम कर द्रोही॥ अर्थ: श्री राम जी के चरण कमलों को हृदय में धारण करो और लंका का अचल राज्य करो। महर्षि पुलस्त्य (तुम्हारे दादा) का यश निर्मल चंद्रमा के समान है, तुम उस चंद्रमा में कलंक मत बनो। श्री राम के नाम के बिना वाणी शोभा नहीं देती, मद और मोह को त्याग कर विचार करके देखो। सुंदर स्त्री सब आभूषणों से सजी होने पर भी वस्त्र के बिना शोभा नहीं देती। श्री राम के विमुख रहने पर जो संपत्ति और प्रभुता मिलती है, वह बिना पाए ही नष्ट हो जाती है। जिन नदियों का मूल स्रोत जल (झरने आदि) नहीं होता, वे वर्षा बीत जाने पर तुरंत सूख जाती हैं। हे रावण! मैं प्रतिज्ञा करके कहता हूँ कि राम के विमुख होने पर कोई रक्षक नहीं है। शंकर जी, विष्णु जी और ब्रह्मा जी भी श्री राम के द्रोही की रक्षा नहीं कर सकते।
रिषि पुलस्ति जसु बिमल मयंका। तेहि ससि महुँ जनि होहु कलंका॥
राम नाम बिनु गिरा न सोहा। देखु बिचारि त्यागि मद मोहा॥
बसन हीन नहिं सोह सुरारी। सब भूषन भूषित बर नारी॥
राम बिमुख संपति प्रभुताई। जाइ रही पाई बिनु पाई॥
सजल मूल जिन्ह सरितन्ह नाहीं। बरषि गएँ पुनि तबहिं सुखाहीं॥
सुनु दसकंठ कहउँ पन रोपी। बिमुख राम त्राता नहिं कोपी॥
संकर सहस बिष्नु अज तोही। सकहिं न राखि राम कर द्रोही॥ अर्थ: श्री राम जी के चरण कमलों को हृदय में धारण करो और लंका का अचल राज्य करो। महर्षि पुलस्त्य (तुम्हारे दादा) का यश निर्मल चंद्रमा के समान है, तुम उस चंद्रमा में कलंक मत बनो। श्री राम के नाम के बिना वाणी शोभा नहीं देती, मद और मोह को त्याग कर विचार करके देखो। सुंदर स्त्री सब आभूषणों से सजी होने पर भी वस्त्र के बिना शोभा नहीं देती। श्री राम के विमुख रहने पर जो संपत्ति और प्रभुता मिलती है, वह बिना पाए ही नष्ट हो जाती है। जिन नदियों का मूल स्रोत जल (झरने आदि) नहीं होता, वे वर्षा बीत जाने पर तुरंत सूख जाती हैं। हे रावण! मैं प्रतिज्ञा करके कहता हूँ कि राम के विमुख होने पर कोई रक्षक नहीं है। शंकर जी, विष्णु जी और ब्रह्मा जी भी श्री राम के द्रोही की रक्षा नहीं कर सकते।
मोहमूल बहु सूल प्रद त्यागहु तम अभिमान।
भजहु राम रघुनायक कृपा सिंधु भगवान॥ २३ ॥ अर्थ: मोह ही जिसका मूल है और जो बहुत पीड़ा देने वाला है, उस अज्ञान रूपी अभिमान को त्याग दो और कृपा के सागर भगवान श्री रामचन्द्र जी का भजन करो॥ २३ ॥
भजहु राम रघुनायक कृपा सिंधु भगवान॥ २३ ॥ अर्थ: मोह ही जिसका मूल है और जो बहुत पीड़ा देने वाला है, उस अज्ञान रूपी अभिमान को त्याग दो और कृपा के सागर भगवान श्री रामचन्द्र जी का भजन करो॥ २३ ॥
जदपि कही कपि अति हित बानी। भगति बिबेक बिरति नय सानी॥
बोला बिहसि महा अभिमानी। मिला हमहि कपि गुर बड़ ग्यानी॥
मृत्यु निकट आई खल तोही। लागेसि अधम सिखावन मोही॥
उलटा होइहि कह हनुमाना। मतिभ्रम तोर प्रगट मैं जाना॥
सुनि कपि बचन बहुत खिसियाना। बेगि न हरहु मूढ़ कर प्राना॥
सुनत निसाचर मारन धाए। सचिवन्ह सहित बिभीषनु आए॥
नाइ सीस सबिनय बहु बाता। नीति बिरोध न मारिअ दूता॥
आन दंड कछु करिअ गोसाँई। सबहीं कहा मंत्र भल भाई॥
सुनत बिहसि बोला दसकंधर। अंग भंग करि पठवहु बंदर॥ अर्थ: यद्यपि हनुमान जी ने भक्ति, ज्ञान, वैराग्य और नीति से सनी हुई अत्यंत हितकारी वाणी कही, फिर भी वह महा अभिमानी रावण हँसकर बोला- वाह! हमें यह वानर बड़ा ज्ञानी गुरु मिल गया है। हे दुष्ट! अब तेरी मृत्यु निकट आ गई है, इसलिए तू मुझे नीच उपदेश देने लगा है। हनुमान जी ने कहा- इसका उल्टा ही होगा, यह मैंने प्रत्यक्ष जान लिया है कि तुम्हारी मति (बुद्धि) भ्रष्ट हो गई है। हनुमान जी के वचन सुनकर वह बहुत क्रोधित हुआ और बोला- अरे! इस मूर्ख के प्राण शीघ्र क्यों नहीं हर लेते? सुनते ही राक्षस उन्हें मारने दौड़े। उसी समय मंत्रियों के साथ विभीषण वहाँ आ गए। उन्होंने सिर नवाकर बहुत विनय की और कहा कि दूत को मारना नीति के विरुद्ध है। हे गोसाईं! इसे कोई और दंड दिया जाए। सभी ने कहा- भाई! यह सलाह अच्छी है। यह सुनकर रावण हँसकर बोला- ठीक है, इस वानर का कोई अंग भंग करके (काटकर) भेज दो।
बोला बिहसि महा अभिमानी। मिला हमहि कपि गुर बड़ ग्यानी॥
मृत्यु निकट आई खल तोही। लागेसि अधम सिखावन मोही॥
उलटा होइहि कह हनुमाना। मतिभ्रम तोर प्रगट मैं जाना॥
सुनि कपि बचन बहुत खिसियाना। बेगि न हरहु मूढ़ कर प्राना॥
सुनत निसाचर मारन धाए। सचिवन्ह सहित बिभीषनु आए॥
नाइ सीस सबिनय बहु बाता। नीति बिरोध न मारिअ दूता॥
आन दंड कछु करिअ गोसाँई। सबहीं कहा मंत्र भल भाई॥
सुनत बिहसि बोला दसकंधर। अंग भंग करि पठवहु बंदर॥ अर्थ: यद्यपि हनुमान जी ने भक्ति, ज्ञान, वैराग्य और नीति से सनी हुई अत्यंत हितकारी वाणी कही, फिर भी वह महा अभिमानी रावण हँसकर बोला- वाह! हमें यह वानर बड़ा ज्ञानी गुरु मिल गया है। हे दुष्ट! अब तेरी मृत्यु निकट आ गई है, इसलिए तू मुझे नीच उपदेश देने लगा है। हनुमान जी ने कहा- इसका उल्टा ही होगा, यह मैंने प्रत्यक्ष जान लिया है कि तुम्हारी मति (बुद्धि) भ्रष्ट हो गई है। हनुमान जी के वचन सुनकर वह बहुत क्रोधित हुआ और बोला- अरे! इस मूर्ख के प्राण शीघ्र क्यों नहीं हर लेते? सुनते ही राक्षस उन्हें मारने दौड़े। उसी समय मंत्रियों के साथ विभीषण वहाँ आ गए। उन्होंने सिर नवाकर बहुत विनय की और कहा कि दूत को मारना नीति के विरुद्ध है। हे गोसाईं! इसे कोई और दंड दिया जाए। सभी ने कहा- भाई! यह सलाह अच्छी है। यह सुनकर रावण हँसकर बोला- ठीक है, इस वानर का कोई अंग भंग करके (काटकर) भेज दो।
कपि कें ममता पूँछ पर सबहि कहउँ समुझाइ।
तेल बोरि पट बाँधि पुनि पावक देहु लगाइ॥ २४ ॥ अर्थ: रावण ने कहा- मैं सबको समझाकर कहता हूँ कि वानर की ममता अपनी पूंछ पर होती है। इसलिए तेल में कपड़ा डुबोकर इसकी पूंछ में बाँध दो और फिर उसमें आग लगा दो॥ २४ ॥
तेल बोरि पट बाँधि पुनि पावक देहु लगाइ॥ २४ ॥ अर्थ: रावण ने कहा- मैं सबको समझाकर कहता हूँ कि वानर की ममता अपनी पूंछ पर होती है। इसलिए तेल में कपड़ा डुबोकर इसकी पूंछ में बाँध दो और फिर उसमें आग लगा दो॥ २४ ॥
पूँछहीन बानर तहँ जाइहि। तब निज नाथहि संग लै आइहि॥
जिन्ह कै कीन्हिसि बहुत बड़ाई। देखेउँ मैं तिन्ह कै प्रभुताई॥
बचन सुनत कपि मन मुसुकाना। भइ सहाय सारद मैं जाना॥
जातुधान सुनि रावन बचना। लागे रचैं मूढ़ सोइ रचना॥
रहा न नगर बसन घृत तेला। बाढ़ी पूँछ कीन्ह कपि खेला॥
कौतुक कहँ आए पुरबासी। मारहिं चरन करहिं बहु हाँसी॥
बाजहिं ढोल देहिं सब तारी। नगर फेरि पुनि पूँछ प्रजारी॥
पावक जरत देखि हनुमंता। भयउ परम लघु रूप तुरंता॥
निबुकि चढ़ेउ कपि कनक अटारीं। भईं सभीत निसाचर नारीं॥ अर्थ: जब यह बिना पूंछ का वानर वहां जाएगा, तब यह अपने स्वामी को साथ ले आएगा। जिनकी इसने बहुत बड़ाई की है, मैं उनकी प्रभुता भी देख लूंगा। ये वचन सुनकर हनुमान जी मन ही मन मुस्कुराए और समझ गए कि अब माता सरस्वती सहायक हुई हैं। रावण के वचन सुनकर मूर्ख राक्षस उसी तैयारी में लग गए। लंका नगर में कपड़ा, घी और तेल नहीं बचा। हनुमान जी ने खेल-खेल में अपनी पूंछ इतनी बढ़ा ली। नगरवासी तमाशा देखने आए, वे हनुमान जी को पैर मारते और बहुत हँसी उड़ाते थे। ढोल बज रहे थे और सब तालियाँ पीट रहे थे। पूरे नगर में घुमाकर फिर पूंछ में आग लगा दी गई। आग जलती देखकर हनुमान जी तुरंत ही अत्यंत छोटे रूप में आ गए। और बंधन से निकलकर वे सोने की अटारियों पर जा चढ़े। यह देखकर राक्षसों की स्त्रियाँ भयभीत हो गईं।
जिन्ह कै कीन्हिसि बहुत बड़ाई। देखेउँ मैं तिन्ह कै प्रभुताई॥
बचन सुनत कपि मन मुसुकाना। भइ सहाय सारद मैं जाना॥
जातुधान सुनि रावन बचना। लागे रचैं मूढ़ सोइ रचना॥
रहा न नगर बसन घृत तेला। बाढ़ी पूँछ कीन्ह कपि खेला॥
कौतुक कहँ आए पुरबासी। मारहिं चरन करहिं बहु हाँसी॥
बाजहिं ढोल देहिं सब तारी। नगर फेरि पुनि पूँछ प्रजारी॥
पावक जरत देखि हनुमंता। भयउ परम लघु रूप तुरंता॥
निबुकि चढ़ेउ कपि कनक अटारीं। भईं सभीत निसाचर नारीं॥ अर्थ: जब यह बिना पूंछ का वानर वहां जाएगा, तब यह अपने स्वामी को साथ ले आएगा। जिनकी इसने बहुत बड़ाई की है, मैं उनकी प्रभुता भी देख लूंगा। ये वचन सुनकर हनुमान जी मन ही मन मुस्कुराए और समझ गए कि अब माता सरस्वती सहायक हुई हैं। रावण के वचन सुनकर मूर्ख राक्षस उसी तैयारी में लग गए। लंका नगर में कपड़ा, घी और तेल नहीं बचा। हनुमान जी ने खेल-खेल में अपनी पूंछ इतनी बढ़ा ली। नगरवासी तमाशा देखने आए, वे हनुमान जी को पैर मारते और बहुत हँसी उड़ाते थे। ढोल बज रहे थे और सब तालियाँ पीट रहे थे। पूरे नगर में घुमाकर फिर पूंछ में आग लगा दी गई। आग जलती देखकर हनुमान जी तुरंत ही अत्यंत छोटे रूप में आ गए। और बंधन से निकलकर वे सोने की अटारियों पर जा चढ़े। यह देखकर राक्षसों की स्त्रियाँ भयभीत हो गईं।
हरि प्रेरित तेहि अवसर चले मरुत उनचास।अट्टहास करि गरजा कपि बढ़ि लाग अकास॥ २५ ॥ अर्थ: भगवान की प्रेरणा से उसी समय उनचासों पवन (तेज हवाएं) चलने लगे। हनुमान जी अट्टहास (जोर से हँसकर) गर्जे और बढ़कर आकाश से जा लगे॥ २५ ॥
🌸 भाग 6: दोहा 26 से 30
देह बिसाल परम हरुआई। मंदिर तें मंदिर चढ़ धाई॥
जरइ नगर भा लोग बिहाला। झपट लपट बहु कोटि कराला॥
तात मातु हा सुनिअ पुकारा। एहि अवसर को हमहि उबारा॥
हम जो कहा यह कपि नहिं होई। बानर रूप धरें सुर कोई॥
साधु अवग्या कर फलु ऐसा। जरइ नगर अनाथ कर जैसा॥
जारा नगरु निमिष एक माहीं। एक बिभीषन कर गृह नाहीं॥
ता कर दूत अनल जेहिं सिरिजा। जरा न सो तेहि कारन गिरिजा॥
उलटि पलटि लंका सब जारी। कूदि परा पयोनिधि भारी॥ अर्थ: हनुमान जी का शरीर अत्यंत विशाल है, परंतु बहुत हल्का है। वे दौड़कर एक महल से दूसरे महल पर चढ़ जाते हैं। नगर जल रहा है, लोग बेहाल हो गए हैं। आग की करोड़ों भयंकर लपटें झपट रही हैं। 'हा पिता! हा माता!' की पुकारें सुनी जा रही हैं। इस अवसर पर हमें कौन बचाएगा? हमने तो पहले ही कहा था कि यह वानर नहीं है, वानर का रूप धरे कोई देवता है। साधु (विभीषण) के अपमान का फल ऐसा ही होता है कि नगर अनाथों की तरह जल रहा है। हनुमान जी ने एक पल में ही सारा नगर जला दिया, केवल एक विभीषण का घर नहीं जला। शिवजी कहते हैं- हे गिरिजा (पार्वती)! जिसने अग्नि को बनाया, हनुमान जी उसी के दूत हैं, इसी कारण वे आग से नहीं जले। लंका को उलट-पलट कर सब जला दिया और फिर अपनी पूंछ बुझाने के लिए वे भारी समुद्र में कूद पड़े।
जरइ नगर भा लोग बिहाला। झपट लपट बहु कोटि कराला॥
तात मातु हा सुनिअ पुकारा। एहि अवसर को हमहि उबारा॥
हम जो कहा यह कपि नहिं होई। बानर रूप धरें सुर कोई॥
साधु अवग्या कर फलु ऐसा। जरइ नगर अनाथ कर जैसा॥
जारा नगरु निमिष एक माहीं। एक बिभीषन कर गृह नाहीं॥
ता कर दूत अनल जेहिं सिरिजा। जरा न सो तेहि कारन गिरिजा॥
उलटि पलटि लंका सब जारी। कूदि परा पयोनिधि भारी॥ अर्थ: हनुमान जी का शरीर अत्यंत विशाल है, परंतु बहुत हल्का है। वे दौड़कर एक महल से दूसरे महल पर चढ़ जाते हैं। नगर जल रहा है, लोग बेहाल हो गए हैं। आग की करोड़ों भयंकर लपटें झपट रही हैं। 'हा पिता! हा माता!' की पुकारें सुनी जा रही हैं। इस अवसर पर हमें कौन बचाएगा? हमने तो पहले ही कहा था कि यह वानर नहीं है, वानर का रूप धरे कोई देवता है। साधु (विभीषण) के अपमान का फल ऐसा ही होता है कि नगर अनाथों की तरह जल रहा है। हनुमान जी ने एक पल में ही सारा नगर जला दिया, केवल एक विभीषण का घर नहीं जला। शिवजी कहते हैं- हे गिरिजा (पार्वती)! जिसने अग्नि को बनाया, हनुमान जी उसी के दूत हैं, इसी कारण वे आग से नहीं जले। लंका को उलट-पलट कर सब जला दिया और फिर अपनी पूंछ बुझाने के लिए वे भारी समुद्र में कूद पड़े।
पूँछ बुझाइ खोइ श्रम धरि लघु रूप बहोरि।
जनकसुता कें आगें ठाढ़ भयउ कर जोरि॥ २६ ॥ अर्थ: समुद्र में अपनी पूंछ बुझाकर, थकावट दूर करके, और फिर से अपना छोटा रूप धारण करके हनुमान जी माता जानकी जी के सामने हाथ जोड़कर खड़े हो गए॥ २६ ॥
जनकसुता कें आगें ठाढ़ भयउ कर जोरि॥ २६ ॥ अर्थ: समुद्र में अपनी पूंछ बुझाकर, थकावट दूर करके, और फिर से अपना छोटा रूप धारण करके हनुमान जी माता जानकी जी के सामने हाथ जोड़कर खड़े हो गए॥ २६ ॥
मातु मोहि दीजे कछु चीन्हा। जैसे रघुनायक मोहि दीन्हा॥
चूड़ामनि उतारि तब दयऊ। हरष समेत पवनसुत लयऊ॥
कहेहु तात अस मोर प्रनामा। सब प्रकार प्रभु पूरनकामा॥
दीन दयाल बिरिदु संभारी। हरहु नाथ मम संकट भारी॥
तात सक्रसुत कथा सुनाएहु। बान प्रताप प्रभुहि समुझाएहु॥
मास दिवस महुँ नाथु न आवा। तौ पुनि मोहि जिअत नहिं पावा॥
कहु कपि केहि बिधि राखौं प्राना। तुम्हहू तात कहत अब जाना॥
तोहि देखि सीतलि भइ छाती। पुनि मो कहुँ सोइ दिनु सो राती॥ अर्थ: हनुमान जी ने कहा- हे माता! मुझे कुछ निशानी दीजिये, जैसे श्री रघुनाथ जी ने मुझे दी थी। तब सीता जी ने अपनी चूड़ामणि (सिर का आभूषण) उतार कर दे दी। पवनपुत्र ने उसे हर्ष के साथ ले लिया। (सीता जी ने कहा-) हे तात! मेरा प्रणाम कहना और कहना कि हे प्रभु! यद्यपि आप सब प्रकार से पूर्णकाम हैं, फिर भी हे दीनदयाल! अपने विरद (बाने) का स्मरण करके मेरे इस भारी संकट को दूर कीजिए। हे तात! प्रभु को इन्द्र के पुत्र (जयंत) की कथा सुनाना और उनके बाण के प्रताप की याद दिलाना। यदि एक महीने के अंदर नाथ नहीं आए, तो फिर वे मुझे जीवित नहीं पाएंगे। हे हनुमान! कहो मैं प्राणों को कैसे रखूँ? हे तात! तुम भी अब वापस जाने के लिए कह रहे हो। तुम्हें देखकर मेरी छाती शीतल हुई थी। अब फिर मेरे लिए वही दुख भरा दिन और वही रात होगी।
चूड़ामनि उतारि तब दयऊ। हरष समेत पवनसुत लयऊ॥
कहेहु तात अस मोर प्रनामा। सब प्रकार प्रभु पूरनकामा॥
दीन दयाल बिरिदु संभारी। हरहु नाथ मम संकट भारी॥
तात सक्रसुत कथा सुनाएहु। बान प्रताप प्रभुहि समुझाएहु॥
मास दिवस महुँ नाथु न आवा। तौ पुनि मोहि जिअत नहिं पावा॥
कहु कपि केहि बिधि राखौं प्राना। तुम्हहू तात कहत अब जाना॥
तोहि देखि सीतलि भइ छाती। पुनि मो कहुँ सोइ दिनु सो राती॥ अर्थ: हनुमान जी ने कहा- हे माता! मुझे कुछ निशानी दीजिये, जैसे श्री रघुनाथ जी ने मुझे दी थी। तब सीता जी ने अपनी चूड़ामणि (सिर का आभूषण) उतार कर दे दी। पवनपुत्र ने उसे हर्ष के साथ ले लिया। (सीता जी ने कहा-) हे तात! मेरा प्रणाम कहना और कहना कि हे प्रभु! यद्यपि आप सब प्रकार से पूर्णकाम हैं, फिर भी हे दीनदयाल! अपने विरद (बाने) का स्मरण करके मेरे इस भारी संकट को दूर कीजिए। हे तात! प्रभु को इन्द्र के पुत्र (जयंत) की कथा सुनाना और उनके बाण के प्रताप की याद दिलाना। यदि एक महीने के अंदर नाथ नहीं आए, तो फिर वे मुझे जीवित नहीं पाएंगे। हे हनुमान! कहो मैं प्राणों को कैसे रखूँ? हे तात! तुम भी अब वापस जाने के लिए कह रहे हो। तुम्हें देखकर मेरी छाती शीतल हुई थी। अब फिर मेरे लिए वही दुख भरा दिन और वही रात होगी।
जनकसुतहि समुझाइ करि बहु बिधि धीरजु दीन्ह।
चरन कमल सिरु नाइ कपि गवनु राम पहिं कीन्ह॥ २७ ॥ अर्थ: वानर वीर हनुमान जी ने जानकी जी को समझाकर बहुत प्रकार से धैर्य दिया। और उनके चरण कमलों में सिर नवाकर श्री राम जी के पास जाने के लिए गमन किया॥ २७ ॥
चरन कमल सिरु नाइ कपि गवनु राम पहिं कीन्ह॥ २७ ॥ अर्थ: वानर वीर हनुमान जी ने जानकी जी को समझाकर बहुत प्रकार से धैर्य दिया। और उनके चरण कमलों में सिर नवाकर श्री राम जी के पास जाने के लिए गमन किया॥ २७ ॥
चलत महाधुनि गर्जेउ भारी। गर्भ स्रवहिं सुनि निसिचर नारी॥
नाघि सिंधु एहि पारहि आवा। सबद किलिकिला कपिन्ह सुनावा॥
हरषे सब बिलोकि हनुमाना। नूतन जन्म कपिन्ह तब जाना॥
मुख प्रसन्न तन तेज बिराजा। कीनेसि रामचन्द्र कर काजा॥
मिले सकल अति भए सुखारी। तलफत मीन पाव जिमि बारी॥
चले हरषि रघुनायक पासा। पूँछत कहत नवल इतिहासा॥
तब मधुबन भीतर सब आए। अंगद संमत मधु फल खाए॥
रखवारे जब बरजन लागे। मुठिन्ह प्रहार हने सब भागे॥ अर्थ: लंका से चलते समय हनुमान जी ने भारी गर्जना की, जिसे सुनकर राक्षसियों के गर्भ गिर गए। समुद्र लांघकर वे इस पार आए और वानरों को किलिकिला (हर्ष ध्वनि) सुनाई। हनुमान जी को देखकर सब हर्षित हो गए। वानरों ने इसे अपना नया जन्म समझा। हनुमान जी का मुख प्रसन्न है और शरीर पर तेज विराजमान है, जिससे सब समझ गए कि इन्होंने श्री रामचन्द्र जी का काम पूरा कर लिया है। सब उनसे मिलकर बहुत सुखी हुए, जैसे तड़पती हुई मछली को पानी मिल गया हो। सब हर्षित होकर श्री रघुनाथ जी के पास चले। वे रास्ते में लंका का नया इतिहास (कथा) पूछते और कहते जा रहे थे। तब वे सब सुग्रीव के मधुवन के भीतर आए। अंगद की सहमति से उन्होंने मीठे फल खाए। रखवालों ने जब मना किया, तो उन्हें घूंसे मार-मार कर भगा दिया।
नाघि सिंधु एहि पारहि आवा। सबद किलिकिला कपिन्ह सुनावा॥
हरषे सब बिलोकि हनुमाना। नूतन जन्म कपिन्ह तब जाना॥
मुख प्रसन्न तन तेज बिराजा। कीनेसि रामचन्द्र कर काजा॥
मिले सकल अति भए सुखारी। तलफत मीन पाव जिमि बारी॥
चले हरषि रघुनायक पासा। पूँछत कहत नवल इतिहासा॥
तब मधुबन भीतर सब आए। अंगद संमत मधु फल खाए॥
रखवारे जब बरजन लागे। मुठिन्ह प्रहार हने सब भागे॥ अर्थ: लंका से चलते समय हनुमान जी ने भारी गर्जना की, जिसे सुनकर राक्षसियों के गर्भ गिर गए। समुद्र लांघकर वे इस पार आए और वानरों को किलिकिला (हर्ष ध्वनि) सुनाई। हनुमान जी को देखकर सब हर्षित हो गए। वानरों ने इसे अपना नया जन्म समझा। हनुमान जी का मुख प्रसन्न है और शरीर पर तेज विराजमान है, जिससे सब समझ गए कि इन्होंने श्री रामचन्द्र जी का काम पूरा कर लिया है। सब उनसे मिलकर बहुत सुखी हुए, जैसे तड़पती हुई मछली को पानी मिल गया हो। सब हर्षित होकर श्री रघुनाथ जी के पास चले। वे रास्ते में लंका का नया इतिहास (कथा) पूछते और कहते जा रहे थे। तब वे सब सुग्रीव के मधुवन के भीतर आए। अंगद की सहमति से उन्होंने मीठे फल खाए। रखवालों ने जब मना किया, तो उन्हें घूंसे मार-मार कर भगा दिया।
जाइ पुकारे ते सब बन उजार जुबराज।
सुनि सुग्रीव हरष कपि करि आए प्रभु काज॥ २८ ॥ अर्थ: उन सब रखवालों ने जाकर पुकार की कि युवराज (अंगद) वन उजाड़ रहे हैं। यह सुनकर सुग्रीव हर्षित हुए कि वानर प्रभु का कार्य करके (सफल होकर) लौट आए हैं॥ २८ ॥
सुनि सुग्रीव हरष कपि करि आए प्रभु काज॥ २८ ॥ अर्थ: उन सब रखवालों ने जाकर पुकार की कि युवराज (अंगद) वन उजाड़ रहे हैं। यह सुनकर सुग्रीव हर्षित हुए कि वानर प्रभु का कार्य करके (सफल होकर) लौट आए हैं॥ २८ ॥
जौं न होति सीता सुधि पाई। मधुबन के फल सकहिं कि खाई॥
एहि बिधि मन बिचार कर राजा। आइ गए कपि सहित समाजा॥
आइ सबन्हि नाएउ पद सीसा। मिलेउ सबन्हि अति प्रेम कपीसा॥
पूँछी कुसल कुसल पद देखी। राम कृपाँ भा काजु बिसेषी॥
नाथ काजु कीन्हेउ हनुमाना। राखे सकल कपिन्ह के प्राना॥
सुनि सुग्रीव बहुरि तेहि मिलेऊ। कपिन्ह सहित रघुपति पहिं चलेऊ॥
राम कपिन्ह जहँ आवत देखा। किएँ काजु मन हरष बिसेषा॥
फटिक सिला बैठे द्वौ भाई। परे सकल कपि चरनन्हि जाई॥ अर्थ: (सुग्रीव ने सोचा कि) यदि सीता जी की खबर न पाई होती, तो क्या वे मधुवन के फल खा सकते थे? राजा सुग्रीव मन में इस प्रकार विचार कर ही रहे थे कि समाज सहित वानर आ गए। आकर सबने सुग्रीव के चरणों में सिर नवाया। वानरराज सुग्रीव सभी से अत्यंत प्रेम से मिले और कुशल पूछी। तब वानरों ने कहा- आपके चरणों के दर्शन से कुशल है। श्री राम जी की कृपा से काम विशेष रूप से सफल हुआ है। हे नाथ! काम तो हनुमान जी ने किया है और सब वानरों के प्राण बचाए हैं। यह सुनकर सुग्रीव हनुमान जी से फिर गले मिले और सब वानरों को साथ लेकर श्री रघुनाथ जी के पास चले। श्री राम जी ने जब वानरों को आते देखा, तो उनके मन में कार्य सफल होने का विशेष हर्ष हुआ। दोनों भाई स्फटिक शिला पर बैठे थे। सब वानर जाकर उनके चरणों में गिर पड़े।
एहि बिधि मन बिचार कर राजा। आइ गए कपि सहित समाजा॥
आइ सबन्हि नाएउ पद सीसा। मिलेउ सबन्हि अति प्रेम कपीसा॥
पूँछी कुसल कुसल पद देखी। राम कृपाँ भा काजु बिसेषी॥
नाथ काजु कीन्हेउ हनुमाना। राखे सकल कपिन्ह के प्राना॥
सुनि सुग्रीव बहुरि तेहि मिलेऊ। कपिन्ह सहित रघुपति पहिं चलेऊ॥
राम कपिन्ह जहँ आवत देखा। किएँ काजु मन हरष बिसेषा॥
फटिक सिला बैठे द्वौ भाई। परे सकल कपि चरनन्हि जाई॥ अर्थ: (सुग्रीव ने सोचा कि) यदि सीता जी की खबर न पाई होती, तो क्या वे मधुवन के फल खा सकते थे? राजा सुग्रीव मन में इस प्रकार विचार कर ही रहे थे कि समाज सहित वानर आ गए। आकर सबने सुग्रीव के चरणों में सिर नवाया। वानरराज सुग्रीव सभी से अत्यंत प्रेम से मिले और कुशल पूछी। तब वानरों ने कहा- आपके चरणों के दर्शन से कुशल है। श्री राम जी की कृपा से काम विशेष रूप से सफल हुआ है। हे नाथ! काम तो हनुमान जी ने किया है और सब वानरों के प्राण बचाए हैं। यह सुनकर सुग्रीव हनुमान जी से फिर गले मिले और सब वानरों को साथ लेकर श्री रघुनाथ जी के पास चले। श्री राम जी ने जब वानरों को आते देखा, तो उनके मन में कार्य सफल होने का विशेष हर्ष हुआ। दोनों भाई स्फटिक शिला पर बैठे थे। सब वानर जाकर उनके चरणों में गिर पड़े।
प्रीति सहित सब भेटे रघुपति करुना पुंज।पूँछी कुसल नाथ अब कुसल देखि पद कंज॥ २९ ॥ अर्थ: करुणा की खान श्री रघुनाथ जी सभी से प्रेम के साथ गले मिले और कुशल पूछी। वानरों ने कहा- हे नाथ! अब आपके चरण कमलों के दर्शन कर लेने से ही हमारी कुशल है॥ २९ ॥
जामवंत कह सुनु रघुराया। जा पर नाथ करहु तुम्ह दाया॥
ताहि सदा सुभ कुसल निरंतर। सुर नर मुनि प्रसन्न ता ऊपर॥
सोइ बिजई बिनई गुन सागर। तासु सुजसु त्रैलोक उजागर॥
प्रभु कीं कृपा भयउ सबु काजू। जन्म हमार सुफल भा आजू॥
नाथ पवनसुत कीन्हि जो करनी। सहसहुँ मुख न जाइ सो बरनी॥
पवनतनय के चरित सुहाए। जामवंत रघुपतिहि सुनाए॥
सुनत कृपानिधि मन अति भाए। पुनि हनुमान हरषि हियँ लाए॥
कहहु तात केहि भाँति जानकी। रहति करति रच्छा स्वप्रान की॥ अर्थ: जाम्बवान ने कहा- हे रघुनाथ जी! सुनिए। हे नाथ! जिस पर आप दया करते हैं, उसे सदा निरंतर शुभ और कुशल है। देवता, मनुष्य और मुनि उस पर प्रसन्न रहते हैं। वही विजयी है, वही विनयी है, वही गुणों का सागर है और उसका सुंदर यश तीनों लोकों में प्रकाशित होता है। प्रभु की कृपा से सब काम हो गया। आज हमारा जन्म सफल हो गया। हे नाथ! पवनपुत्र हनुमान जी ने जो करनी (कार्य) की है, उसका वर्णन हजारों मुखों से भी नहीं किया जा सकता। जाम्बवान ने पवनपुत्र के वे सुंदर चरित्र श्री रघुनाथ जी को सुनाए। सुनते ही कृपानिधान श्री राम जी के मन को वे बहुत अच्छे लगे और उन्होंने हनुमान जी को फिर हर्षित होकर हृदय से लगा लिया। फिर पूछा- हे तात! कहो, जानकी किस प्रकार रहती है और अपने प्राणों की रक्षा कैसे करती है?
ताहि सदा सुभ कुसल निरंतर। सुर नर मुनि प्रसन्न ता ऊपर॥
सोइ बिजई बिनई गुन सागर। तासु सुजसु त्रैलोक उजागर॥
प्रभु कीं कृपा भयउ सबु काजू। जन्म हमार सुफल भा आजू॥
नाथ पवनसुत कीन्हि जो करनी। सहसहुँ मुख न जाइ सो बरनी॥
पवनतनय के चरित सुहाए। जामवंत रघुपतिहि सुनाए॥
सुनत कृपानिधि मन अति भाए। पुनि हनुमान हरषि हियँ लाए॥
कहहु तात केहि भाँति जानकी। रहति करति रच्छा स्वप्रान की॥ अर्थ: जाम्बवान ने कहा- हे रघुनाथ जी! सुनिए। हे नाथ! जिस पर आप दया करते हैं, उसे सदा निरंतर शुभ और कुशल है। देवता, मनुष्य और मुनि उस पर प्रसन्न रहते हैं। वही विजयी है, वही विनयी है, वही गुणों का सागर है और उसका सुंदर यश तीनों लोकों में प्रकाशित होता है। प्रभु की कृपा से सब काम हो गया। आज हमारा जन्म सफल हो गया। हे नाथ! पवनपुत्र हनुमान जी ने जो करनी (कार्य) की है, उसका वर्णन हजारों मुखों से भी नहीं किया जा सकता। जाम्बवान ने पवनपुत्र के वे सुंदर चरित्र श्री रघुनाथ जी को सुनाए। सुनते ही कृपानिधान श्री राम जी के मन को वे बहुत अच्छे लगे और उन्होंने हनुमान जी को फिर हर्षित होकर हृदय से लगा लिया। फिर पूछा- हे तात! कहो, जानकी किस प्रकार रहती है और अपने प्राणों की रक्षा कैसे करती है?
नाम पाहरु दिवस निसि ध्यान तुम्हार कपाट।
लोचन निज पद जंत्रित जाहिं प्रान केहिं बाट॥ ३० ॥ अर्थ: हनुमान जी ने कहा- हे प्रभु! आपका नाम रात-दिन उनके लिए पहरेदार है, आपका ध्यान ही किवाड़ है। नेत्रों को वे अपने चरणों में लगाए रहती हैं, (जब बाहर जाने का कोई मार्ग ही नहीं है, तो) प्राण किस रास्ते से निकलें? ॥ ३० ॥
लोचन निज पद जंत्रित जाहिं प्रान केहिं बाट॥ ३० ॥ अर्थ: हनुमान जी ने कहा- हे प्रभु! आपका नाम रात-दिन उनके लिए पहरेदार है, आपका ध्यान ही किवाड़ है। नेत्रों को वे अपने चरणों में लगाए रहती हैं, (जब बाहर जाने का कोई मार्ग ही नहीं है, तो) प्राण किस रास्ते से निकलें? ॥ ३० ॥
🌸 भाग 7: दोहा 31 से 35
चलत मोहि चूड़ामनि दीन्ही। रघुपति हृदयँ लाइ सोइ लीन्ही॥
नाथ जुगल लोचन भरि बारी। बचन कहे कछु जनककुमारी॥
अनुज समेत गहु प्रभु चरना। दीन बंधु प्रनतारति हरना॥
मन क्रम बचन चरन अनुरागी। केहि अपराध नाथ हौं त्यागी॥
अवगुन एक मोर मैं माना। बिछुरत प्रान न कीन्ह पयाना॥
नाथ सो नयनन्हि को अपराधा। निसरत प्रान करहिं हठि बाधा॥
बिरह अगिनि तनु तूल समीरा। स्वास जरइ छन माहिं सरीरा॥
नयन स्रवहिं जलु निज हित लागी। जरैं न पाव देह बिरहागी॥
सीता कै अति बिपति बिसाला। बिनहिं कहें भलि दीनदयाला॥ अर्थ: हनुमान जी ने कहा- "चलते समय उन्होंने मुझे चूड़ामणि दी थी।" श्री रघुनाथ जी ने उसे लेकर हृदय से लगा लिया। "हे नाथ! दोनों नेत्रों में जल भरकर जानकी जी ने कुछ वचन कहे हैं- 'छोटे भाई सहित प्रभु के चरण पकड़ना और कहना कि हे दीनबंधु! हे शरणागत के दुख हरने वाले! मैं मन, कर्म और वचन से आपके चरणों की अनुरागिणी हूँ, फिर हे नाथ! मुझे किस अपराध से त्याग दिया है? हाँ, मैं अपना एक अवगुण अवश्य मानती हूँ कि आपसे बिछड़ते ही मेरे प्राण नहीं निकले। परंतु हे नाथ! इसमें नेत्रों का अपराध है, जो प्राणों के निकलने में हठपूर्वक बाधा देते हैं। विरह की अग्नि है, शरीर रुई है और श््वास पवन है, इस प्रकार शरीर क्षण भर में जल सकता है। परंतु नेत्र अपने हित (प्रभु के दर्शन) के लिए जल (आँसू) बहाते हैं, जिससे विरह की आग शरीर को जला नहीं पाती।' हे दीनदयाल! सीता जी की विपत्ति बहुत बड़ी है, वह बिना कहे ही अच्छी है।"
नाथ जुगल लोचन भरि बारी। बचन कहे कछु जनककुमारी॥
अनुज समेत गहु प्रभु चरना। दीन बंधु प्रनतारति हरना॥
मन क्रम बचन चरन अनुरागी। केहि अपराध नाथ हौं त्यागी॥
अवगुन एक मोर मैं माना। बिछुरत प्रान न कीन्ह पयाना॥
नाथ सो नयनन्हि को अपराधा। निसरत प्रान करहिं हठि बाधा॥
बिरह अगिनि तनु तूल समीरा। स्वास जरइ छन माहिं सरीरा॥
नयन स्रवहिं जलु निज हित लागी। जरैं न पाव देह बिरहागी॥
सीता कै अति बिपति बिसाला। बिनहिं कहें भलि दीनदयाला॥ अर्थ: हनुमान जी ने कहा- "चलते समय उन्होंने मुझे चूड़ामणि दी थी।" श्री रघुनाथ जी ने उसे लेकर हृदय से लगा लिया। "हे नाथ! दोनों नेत्रों में जल भरकर जानकी जी ने कुछ वचन कहे हैं- 'छोटे भाई सहित प्रभु के चरण पकड़ना और कहना कि हे दीनबंधु! हे शरणागत के दुख हरने वाले! मैं मन, कर्म और वचन से आपके चरणों की अनुरागिणी हूँ, फिर हे नाथ! मुझे किस अपराध से त्याग दिया है? हाँ, मैं अपना एक अवगुण अवश्य मानती हूँ कि आपसे बिछड़ते ही मेरे प्राण नहीं निकले। परंतु हे नाथ! इसमें नेत्रों का अपराध है, जो प्राणों के निकलने में हठपूर्वक बाधा देते हैं। विरह की अग्नि है, शरीर रुई है और श््वास पवन है, इस प्रकार शरीर क्षण भर में जल सकता है। परंतु नेत्र अपने हित (प्रभु के दर्शन) के लिए जल (आँसू) बहाते हैं, जिससे विरह की आग शरीर को जला नहीं पाती।' हे दीनदयाल! सीता जी की विपत्ति बहुत बड़ी है, वह बिना कहे ही अच्छी है।"
निमिष निमिष करुनानिधि जाहिं कलप सम बीति।
बेगि चलिअ प्रभु आनिअ भुज बल खल दल जीति॥ ३१ ॥ अर्थ: हे करुणानिधान! उनका एक-एक पल कल्प के समान बीतता है। अतः हे प्रभु! तुरंत चलिए और अपनी भुजाओं के बल से दुष्टों के दल को जीतकर जानकी जी को ले आइए॥ ३१ ॥
बेगि चलिअ प्रभु आनिअ भुज बल खल दल जीति॥ ३१ ॥ अर्थ: हे करुणानिधान! उनका एक-एक पल कल्प के समान बीतता है। अतः हे प्रभु! तुरंत चलिए और अपनी भुजाओं के बल से दुष्टों के दल को जीतकर जानकी जी को ले आइए॥ ३१ ॥
सुनि सीता दुख प्रभु सुख अयना। भरि आए जल राजिव नयना॥
बचन कायँ मन मम गति जाही। सपनेहुँ बूझिअ बिपति कि ताही॥
कह हनुमंत बिपति प्रभु सोई। जब तव सुमिरन भजन न होई॥
केतिक बात प्रभु जातुधान की। रिपुहि जीति आनिबी जानकी॥
सुनु कपि तोहि समान उपकारी। नहिं कोउ सुर नर मुनि तनुधारी॥
प्रति उपकार करौं का तोरा। सनमुख होइ न सकत मन मोरा॥
सुनु सुत तोहि उरिन मैं नाहीं। देखेउँ करि बिचार मन माहीं॥
पुनि पुनि कपिहि चितव सुरत्राता। लोचन नीर पुलक अति गाता॥ अर्थ: सीता जी का दुख सुनकर सुख के धाम प्रभु श्री राम जी के कमल नेत्रों में जल भर आया। (प्रभु ने कहा-) "मन, वचन और शरीर से जिसे मेरी ही गति (आश्रय) है, उसे क्या स्वप्न में भी विपत्ति समझनी चाहिए?" हनुमान जी ने कहा- "हे प्रभु! विपत्ति तो वही है जब आपका स्मरण और भजन न हो। राक्षसों की क्या बिसात है! आप शत्रुओं को जीतकर जानकी जी को ले आएंगे।" (प्रभु ने कहा-) "हे हनुमान! सुन, तेरे समान मेरा उपकारी देवता, मनुष्य और मुनियों में कोई शरीरधारी नहीं है। मैं तेरा क्या प्रत्युपकार (बदले में भलाई) करूँ? मेरा मन तेरे सामने नहीं हो सकता। हे पुत्र! सुन, मैंने मन में विचार करके देख लिया है, मैं तुमसे उऋण (कर्जमुक्त) नहीं हो सकता।" देवताओं के रक्षक प्रभु बार-बार हनुमान जी को देखते हैं, नेत्रों में जल है और शरीर अत्यंत पुलकित है।
बचन कायँ मन मम गति जाही। सपनेहुँ बूझिअ बिपति कि ताही॥
कह हनुमंत बिपति प्रभु सोई। जब तव सुमिरन भजन न होई॥
केतिक बात प्रभु जातुधान की। रिपुहि जीति आनिबी जानकी॥
सुनु कपि तोहि समान उपकारी। नहिं कोउ सुर नर मुनि तनुधारी॥
प्रति उपकार करौं का तोरा। सनमुख होइ न सकत मन मोरा॥
सुनु सुत तोहि उरिन मैं नाहीं। देखेउँ करि बिचार मन माहीं॥
पुनि पुनि कपिहि चितव सुरत्राता। लोचन नीर पुलक अति गाता॥ अर्थ: सीता जी का दुख सुनकर सुख के धाम प्रभु श्री राम जी के कमल नेत्रों में जल भर आया। (प्रभु ने कहा-) "मन, वचन और शरीर से जिसे मेरी ही गति (आश्रय) है, उसे क्या स्वप्न में भी विपत्ति समझनी चाहिए?" हनुमान जी ने कहा- "हे प्रभु! विपत्ति तो वही है जब आपका स्मरण और भजन न हो। राक्षसों की क्या बिसात है! आप शत्रुओं को जीतकर जानकी जी को ले आएंगे।" (प्रभु ने कहा-) "हे हनुमान! सुन, तेरे समान मेरा उपकारी देवता, मनुष्य और मुनियों में कोई शरीरधारी नहीं है। मैं तेरा क्या प्रत्युपकार (बदले में भलाई) करूँ? मेरा मन तेरे सामने नहीं हो सकता। हे पुत्र! सुन, मैंने मन में विचार करके देख लिया है, मैं तुमसे उऋण (कर्जमुक्त) नहीं हो सकता।" देवताओं के रक्षक प्रभु बार-बार हनुमान जी को देखते हैं, नेत्रों में जल है और शरीर अत्यंत पुलकित है।
सुनि प्रभु बचन बिलोकि मुख गात हरषि हनुमंत।चरन परेउ प्रेमाकुल त्राहि त्राहि भगवंत॥ ३२ ॥ अर्थ: प्रभु के वचन सुनकर और उनके प्रसन्न मुख और पुलकित शरीर को देखकर हनुमान जी हर्षित हो गए और प्रेम में व्याकुल होकर 'त्राहि-त्राहि भगवन्' (मेरी रक्षा कीजिए) कहते हुए श्री राम जी के चरणों में गिर पड़े॥ ३२ ॥
बार बार प्रभु चहइ उठावा। प्रेम मगन तेहि उठब न भावा॥
प्रभु कर पंकज कपि कें सीसा। सुमिरि सो दसा मगन गौरीसा॥
सावधान मन करि पुनि संकर। लागे कहन कथा अति सुंदर॥
कपि उठाइ प्रभु हृदयँ लगावा। कर गहि परम निकट बैठावा॥
कहु कपि रावन पालित लंका। केहि बिधि दहेउ दुर्ग अति बंका॥
प्रभु प्रसन्न जाना हनुमाना। बोला बचन बिगत अभिमाना॥
साखामृग कै बड़ि मनुसाई। साखा तें साखा पर जाई॥
नाघि सिंधु हाटकपुर जारा। निसिचर गन बधि बिपिन उजारा॥
सो सब तव प्रताप रघुराई। नाथ न कछू मोरि प्रभुताई॥ अर्थ: प्रभु श्री राम बार-बार उन्हें उठाना चाहते हैं, परंतु प्रेम में मगन हनुमान जी को उठना सुहाता नहीं है। प्रभु का कर-कमल हनुमान जी के सिर पर है। उस दशा का स्मरण करके शिवजी (गौरीपति) प्रेम में मगन हो गए। फिर मन को सावधान करके शिवजी अत्यंत सुंदर कथा कहने लगे। प्रभु ने हनुमान जी को उठाकर हृदय से लगा लिया और हाथ पकड़कर अत्यंत निकट बैठाया। और कहा- "हे हनुमान! कहो, रावण द्वारा सुरक्षित लंका और उस अत्यंत बांके (कठिन) किले को तुमने किस प्रकार जलाया?" हनुमान जी ने प्रभु को प्रसन्न जाना और वे अभिमान रहित वचन बोले- "बंदर का बस यही बड़ा पुरुषार्थ है कि वह एक डाल से दूसरी डाल पर चला जाता है। मैंने जो समुद्र लांघकर सोने के नगर को जलाया, राक्षसों को मारा और अशोक वाटिका उजाड़ी, वह सब हे रघुनाथ जी! आप ही का प्रताप है। हे नाथ! इसमें मेरी कोई प्रभुता (बड़ाई) नहीं है।"
प्रभु कर पंकज कपि कें सीसा। सुमिरि सो दसा मगन गौरीसा॥
सावधान मन करि पुनि संकर। लागे कहन कथा अति सुंदर॥
कपि उठाइ प्रभु हृदयँ लगावा। कर गहि परम निकट बैठावा॥
कहु कपि रावन पालित लंका। केहि बिधि दहेउ दुर्ग अति बंका॥
प्रभु प्रसन्न जाना हनुमाना। बोला बचन बिगत अभिमाना॥
साखामृग कै बड़ि मनुसाई। साखा तें साखा पर जाई॥
नाघि सिंधु हाटकपुर जारा। निसिचर गन बधि बिपिन उजारा॥
सो सब तव प्रताप रघुराई। नाथ न कछू मोरि प्रभुताई॥ अर्थ: प्रभु श्री राम बार-बार उन्हें उठाना चाहते हैं, परंतु प्रेम में मगन हनुमान जी को उठना सुहाता नहीं है। प्रभु का कर-कमल हनुमान जी के सिर पर है। उस दशा का स्मरण करके शिवजी (गौरीपति) प्रेम में मगन हो गए। फिर मन को सावधान करके शिवजी अत्यंत सुंदर कथा कहने लगे। प्रभु ने हनुमान जी को उठाकर हृदय से लगा लिया और हाथ पकड़कर अत्यंत निकट बैठाया। और कहा- "हे हनुमान! कहो, रावण द्वारा सुरक्षित लंका और उस अत्यंत बांके (कठिन) किले को तुमने किस प्रकार जलाया?" हनुमान जी ने प्रभु को प्रसन्न जाना और वे अभिमान रहित वचन बोले- "बंदर का बस यही बड़ा पुरुषार्थ है कि वह एक डाल से दूसरी डाल पर चला जाता है। मैंने जो समुद्र लांघकर सोने के नगर को जलाया, राक्षसों को मारा और अशोक वाटिका उजाड़ी, वह सब हे रघुनाथ जी! आप ही का प्रताप है। हे नाथ! इसमें मेरी कोई प्रभुता (बड़ाई) नहीं है।"
ता कहुँ प्रभु कछु अगम नहिं जा पर तुम्ह अनुकूल।
तव प्रभावँ बड़वानलहिं जारि सकइ खलु तूल॥ ३३ ॥ अर्थ: हे प्रभु! जिस पर आप अनुकूल हों, उसके लिए कुछ भी अगम (दुर्लभ) नहीं है। आपके प्रभाव से रुई भी निश्चय ही बड़वानल (समुद्र की आग) को जला सकती है॥ ३३ ॥
तव प्रभावँ बड़वानलहिं जारि सकइ खलु तूल॥ ३३ ॥ अर्थ: हे प्रभु! जिस पर आप अनुकूल हों, उसके लिए कुछ भी अगम (दुर्लभ) नहीं है। आपके प्रभाव से रुई भी निश्चय ही बड़वानल (समुद्र की आग) को जला सकती है॥ ३३ ॥
नाथ भगति अति सुखदायनी। देहु कृपा करि अनपायनी॥
सुनि प्रभु परम सरल कपि बानी। एवमस्तु तब कहेउ भवानी॥
उमा राम सुभाउ जेहिं जाना। ताहि भजनु तजि भाव न आना॥
यह संबाद जासु उर आवा। रघुपति चरन भगति सोइ पावा॥
सुनि प्रभु बचन कहहिं कपि बृंदा। जय जय जय कृपाल सुखकंदा॥
तब रघुपति कपिपतिहि बोलावा। कहा चलैं कर करहु बनावा॥
अब बिलंबु केहि कारन कीजे। तुरत कपिन्ह कहुँ आयसु दीजे॥
कौतुक देखि सुमन बहु बरषी। नभ तें भवन चले सुर हरषी॥ अर्थ: (हनुमान जी ने कहा-) "हे नाथ! आपकी भक्ति अत्यंत सुख देने वाली है, कृपा करके मुझे अपनी वह अविचल भक्ति दीजिए।" शिवजी कहते हैं- हे भवानी! हनुमान जी की परम सरल वाणी सुनकर तब प्रभु ने 'एवमस्तु' (ऐसा ही हो) कहा। हे उमा! जिसने श्री राम जी का स्वभाव जान लिया, उसे भजन छोड़कर कुछ और नहीं सुहाता। यह संवाद जिसके हृदय में आ जाता है, वही श्री रघुनाथ जी के चरणों की भक्ति पा लेता है। प्रभु के वचन सुनकर सब वानर कहने लगे- "कृपालु और सुखकंद प्रभु की जय हो! जय हो! जय हो!" तब श्री रघुनाथ जी ने वानरों के राजा सुग्रीव को बुलाया और कहा- "चलने की तैयारी करो। अब किस कारण विलंब (देरी) किया जाए? तुरंत वानरों को आज्ञा दो।" यह कौतुक (लीला) देखकर बहुत से फूल बरसाकर देवता हर्षित होकर आकाश से अपने लोकों को चले गए।
सुनि प्रभु परम सरल कपि बानी। एवमस्तु तब कहेउ भवानी॥
उमा राम सुभाउ जेहिं जाना। ताहि भजनु तजि भाव न आना॥
यह संबाद जासु उर आवा। रघुपति चरन भगति सोइ पावा॥
सुनि प्रभु बचन कहहिं कपि बृंदा। जय जय जय कृपाल सुखकंदा॥
तब रघुपति कपिपतिहि बोलावा। कहा चलैं कर करहु बनावा॥
अब बिलंबु केहि कारन कीजे। तुरत कपिन्ह कहुँ आयसु दीजे॥
कौतुक देखि सुमन बहु बरषी। नभ तें भवन चले सुर हरषी॥ अर्थ: (हनुमान जी ने कहा-) "हे नाथ! आपकी भक्ति अत्यंत सुख देने वाली है, कृपा करके मुझे अपनी वह अविचल भक्ति दीजिए।" शिवजी कहते हैं- हे भवानी! हनुमान जी की परम सरल वाणी सुनकर तब प्रभु ने 'एवमस्तु' (ऐसा ही हो) कहा। हे उमा! जिसने श्री राम जी का स्वभाव जान लिया, उसे भजन छोड़कर कुछ और नहीं सुहाता। यह संवाद जिसके हृदय में आ जाता है, वही श्री रघुनाथ जी के चरणों की भक्ति पा लेता है। प्रभु के वचन सुनकर सब वानर कहने लगे- "कृपालु और सुखकंद प्रभु की जय हो! जय हो! जय हो!" तब श्री रघुनाथ जी ने वानरों के राजा सुग्रीव को बुलाया और कहा- "चलने की तैयारी करो। अब किस कारण विलंब (देरी) किया जाए? तुरंत वानरों को आज्ञा दो।" यह कौतुक (लीला) देखकर बहुत से फूल बरसाकर देवता हर्षित होकर आकाश से अपने लोकों को चले गए।
कपिपति बेगि बोलाए आए जूथप जूथ।
नाना बरन अतुल बल बानर भालु बरूथ॥ ३४ ॥ अर्थ: वानरराज सुग्रीव ने शीघ्र ही सेनापतियों को बुलाया और वे यूथ-के-यूथ (झुंड-के-झुंड) आ गए। अनेक रंगों वाले और अतुलनीय बल वाले वानरों और भालुओं के समूह के समूह आ गए॥ ३४ ॥
नाना बरन अतुल बल बानर भालु बरूथ॥ ३४ ॥ अर्थ: वानरराज सुग्रीव ने शीघ्र ही सेनापतियों को बुलाया और वे यूथ-के-यूथ (झुंड-के-झुंड) आ गए। अनेक रंगों वाले और अतुलनीय बल वाले वानरों और भालुओं के समूह के समूह आ गए॥ ३४ ॥
प्रभु पद पंकज नावहिं सीसा। गर्जहिं भालु महाबल कीसा॥
देखी राम सकल कपि सेना। चितइ कृपा करि राजिव नैना॥
राम कृपा बल पाइ कपिंदा। भए पच्छजुत मनहुँ गिरिंदा॥
हरषि राम तब कीन्ह पयाना। सगुन भए सुंदर सुभ नाना॥
जासु सकल मंगलमय कीती। तासु पयान सगुन यह नीती॥
प्रभु पयान जाना बैदेहीं। फरकि बाम अँग जनु कहि देहीं॥
जोइ जोइ सगुन जानकिहि होई। असगुन भयउ रावनहि सोई॥
चला कटक को बरनैं पारा। गर्जहिं बानर भालु अपारा॥
नख आयुध गिरि पादप धारी। चले गगन महि इच्छाचारी॥
केहरिनाद भालु कपि करहीं। डगमगाहिं दिग्गज चिक्करहीं॥ ॥ छंद ॥
चिक्करहिं दिग्गज डोल महि गिरि लोल सागर खरभरे।
मन हरष सभ गंधर्ब सुर मुनि नाग किंनर दुख टरे॥
कटकटहिं मर्कट बिकट भट बहु कोटि कोटिन्ह धावहीं।
जय राम प्रबल प्रताप कोसलनाथ गुन गन गावहीं॥ अर्थ: वानर और भालू प्रभु के चरण कमलों में सिर नवाते हैं और महाबली वानर गर्जना करते हैं। श्री राम जी ने वानरों की सारी सेना देखी और अपने कमल नेत्रों से उन पर कृपा दृष्टि डाली। श्री राम की कृपा का बल पाकर वानर श्रेष्ठ ऐसे हो गए, मानो पंख वाले बड़े पर्वत हों। तब श्री राम जी ने हर्षित होकर प्रस्थान किया (कूच किया)। उस समय अनेक सुंदर और शुभ शकुन हुए। जिनकी कीर्ति (यश) ही सर्वथा मंगलमयी है, उनके प्रस्थान के समय शकुन होना यह तो एक नीति (मर्यादा) है। प्रभु का प्रस्थान माता जानकी जी ने भी जान लिया, उनके बाएँ अंग फड़ककर मानो यह बता रहे हैं। जानकी जी को जो-जो शकुन होते थे, वही-वही रावण के लिए अपशकुन हुए। सेना चली, उसका वर्णन कौन कर सकता है? अपार वानर और भालू गर्जना कर रहे हैं। नख ही जिनके अस्त्र हैं, वे इच्छाचारी वानर पहाड़ों और वृक्षों को धारण किए आकाश और पृथ्वी पर चले जा रहे हैं। भालू और वानर सिंह के समान गर्जना कर रहे हैं। दिशाओं के हाथी डगमगा रहे हैं और चिंघाड़ रहे हैं।
छंद का अर्थ: दिशाओं के हाथी चिंघाड़ रहे हैं, पृथ्वी डोल रही है, पर्वत कांप रहे हैं और समुद्र क्षुब्ध हो रहे हैं। गंधर्व, देवता, मुनि, नाग, किन्नर सबके मन में हर्ष है कि अब हमारे दुख टल गए। करोड़ों-करोड़ों भयंकर वानर योद्धा कटकटा रहे हैं और दौड़ रहे हैं। वे प्रबल प्रतापी कोसलनाथ श्री राम जी की जय-जयकार करते हुए उनके गुणों का गान कर रहे हैं।
देखी राम सकल कपि सेना। चितइ कृपा करि राजिव नैना॥
राम कृपा बल पाइ कपिंदा। भए पच्छजुत मनहुँ गिरिंदा॥
हरषि राम तब कीन्ह पयाना। सगुन भए सुंदर सुभ नाना॥
जासु सकल मंगलमय कीती। तासु पयान सगुन यह नीती॥
प्रभु पयान जाना बैदेहीं। फरकि बाम अँग जनु कहि देहीं॥
जोइ जोइ सगुन जानकिहि होई। असगुन भयउ रावनहि सोई॥
चला कटक को बरनैं पारा। गर्जहिं बानर भालु अपारा॥
नख आयुध गिरि पादप धारी। चले गगन महि इच्छाचारी॥
केहरिनाद भालु कपि करहीं। डगमगाहिं दिग्गज चिक्करहीं॥ ॥ छंद ॥
चिक्करहिं दिग्गज डोल महि गिरि लोल सागर खरभरे।
मन हरष सभ गंधर्ब सुर मुनि नाग किंनर दुख टरे॥
कटकटहिं मर्कट बिकट भट बहु कोटि कोटिन्ह धावहीं।
जय राम प्रबल प्रताप कोसलनाथ गुन गन गावहीं॥ अर्थ: वानर और भालू प्रभु के चरण कमलों में सिर नवाते हैं और महाबली वानर गर्जना करते हैं। श्री राम जी ने वानरों की सारी सेना देखी और अपने कमल नेत्रों से उन पर कृपा दृष्टि डाली। श्री राम की कृपा का बल पाकर वानर श्रेष्ठ ऐसे हो गए, मानो पंख वाले बड़े पर्वत हों। तब श्री राम जी ने हर्षित होकर प्रस्थान किया (कूच किया)। उस समय अनेक सुंदर और शुभ शकुन हुए। जिनकी कीर्ति (यश) ही सर्वथा मंगलमयी है, उनके प्रस्थान के समय शकुन होना यह तो एक नीति (मर्यादा) है। प्रभु का प्रस्थान माता जानकी जी ने भी जान लिया, उनके बाएँ अंग फड़ककर मानो यह बता रहे हैं। जानकी जी को जो-जो शकुन होते थे, वही-वही रावण के लिए अपशकुन हुए। सेना चली, उसका वर्णन कौन कर सकता है? अपार वानर और भालू गर्जना कर रहे हैं। नख ही जिनके अस्त्र हैं, वे इच्छाचारी वानर पहाड़ों और वृक्षों को धारण किए आकाश और पृथ्वी पर चले जा रहे हैं। भालू और वानर सिंह के समान गर्जना कर रहे हैं। दिशाओं के हाथी डगमगा रहे हैं और चिंघाड़ रहे हैं।
छंद का अर्थ: दिशाओं के हाथी चिंघाड़ रहे हैं, पृथ्वी डोल रही है, पर्वत कांप रहे हैं और समुद्र क्षुब्ध हो रहे हैं। गंधर्व, देवता, मुनि, नाग, किन्नर सबके मन में हर्ष है कि अब हमारे दुख टल गए। करोड़ों-करोड़ों भयंकर वानर योद्धा कटकटा रहे हैं और दौड़ रहे हैं। वे प्रबल प्रतापी कोसलनाथ श्री राम जी की जय-जयकार करते हुए उनके गुणों का गान कर रहे हैं।
एहि बिधि जाइ कृपानिधि उतरे सागर तीर।
जहँ तहँ लागे खान फल भालु बिपुल कपि बीर॥ ३५ ॥ अर्थ: इस प्रकार कृपानिधान श्री राम जी ने जाकर समुद्र के किनारे डेरा डाला। वहां बहुत से भालू और वीर वानर जहाँ-तहाँ फल खाने लगे॥ ३५ ॥
जहँ तहँ लागे खान फल भालु बिपुल कपि बीर॥ ३५ ॥ अर्थ: इस प्रकार कृपानिधान श्री राम जी ने जाकर समुद्र के किनारे डेरा डाला। वहां बहुत से भालू और वीर वानर जहाँ-तहाँ फल खाने लगे॥ ३५ ॥
🌸 भाग 8: दोहा 36 से 40
उहाँ निसाचर रहहिं ससंका। जब ते जारि गयउ कपि लंका॥
निज निज गृहँ सब करहिं बिचारा। नहिं निसिचर कुल केर उबारा॥
जासु दूत बल बरनि न जाई। तेहि आएँ पुर कवन भलाई॥
दूतन्हि सन सुनि पुरजन बानी। मंदोदरी अधिक अकुलानी॥
रहसि जोरि कर पति पग लागी। बोली बचन नीति रस पागी॥
कंत करष हरि सन परिहरहू। मोर कहा अति हित हियँ धरहू॥
समुझत जासु दूत कइ करनी। स्रवहिं गर्भ रजनीचर धरनी॥
तासु नारि निज सचिव बोलाई। पठवहु कंत जो चहहु भलाई॥ अर्थ: वहाँ (लंका में) जब से हनुमान जी लंका को जलाकर गए हैं, तब से राक्षस भयभीत रहने लगे हैं। सब अपने-अपने घरों में विचार करते हैं कि अब राक्षस कुल की रक्षा (बचाव) नहीं है। जिसके दूत के बल का वर्णन नहीं किया जा सकता, उसके स्वयं नगर में आने पर क्या भलाई होगी? दूतों (गुप्तचरों) से नगरवासियों की ये बातें सुनकर मंदोदरी बहुत ही व्याकुल हो गई। वह एकांत में हाथ जोड़कर अपने पति (रावण) के चरणों में गिर पड़ी और नीति-रस में पगी हुई वाणी बोली- "हे प्रियतम! श्री हरि (श्री राम जी) से विरोध छोड़ दीजिए। मेरे कहने को अत्यंत हितकारी जानकर हृदय में धारण कीजिए। जिसके दूत की करनी का विचार करते ही (याद आते ही) राक्षस स्त्रियों के गर्भ गिर जाते हैं, हे प्रियतम! यदि आप अपनी भलाई चाहते हैं, तो अपने मंत्री को बुलाकर उनकी पत्नी (सीता जी) को वापस भेज दीजिए।"
निज निज गृहँ सब करहिं बिचारा। नहिं निसिचर कुल केर उबारा॥
जासु दूत बल बरनि न जाई। तेहि आएँ पुर कवन भलाई॥
दूतन्हि सन सुनि पुरजन बानी। मंदोदरी अधिक अकुलानी॥
रहसि जोरि कर पति पग लागी। बोली बचन नीति रस पागी॥
कंत करष हरि सन परिहरहू। मोर कहा अति हित हियँ धरहू॥
समुझत जासु दूत कइ करनी। स्रवहिं गर्भ रजनीचर धरनी॥
तासु नारि निज सचिव बोलाई। पठवहु कंत जो चहहु भलाई॥ अर्थ: वहाँ (लंका में) जब से हनुमान जी लंका को जलाकर गए हैं, तब से राक्षस भयभीत रहने लगे हैं। सब अपने-अपने घरों में विचार करते हैं कि अब राक्षस कुल की रक्षा (बचाव) नहीं है। जिसके दूत के बल का वर्णन नहीं किया जा सकता, उसके स्वयं नगर में आने पर क्या भलाई होगी? दूतों (गुप्तचरों) से नगरवासियों की ये बातें सुनकर मंदोदरी बहुत ही व्याकुल हो गई। वह एकांत में हाथ जोड़कर अपने पति (रावण) के चरणों में गिर पड़ी और नीति-रस में पगी हुई वाणी बोली- "हे प्रियतम! श्री हरि (श्री राम जी) से विरोध छोड़ दीजिए। मेरे कहने को अत्यंत हितकारी जानकर हृदय में धारण कीजिए। जिसके दूत की करनी का विचार करते ही (याद आते ही) राक्षस स्त्रियों के गर्भ गिर जाते हैं, हे प्रियतम! यदि आप अपनी भलाई चाहते हैं, तो अपने मंत्री को बुलाकर उनकी पत्नी (सीता जी) को वापस भेज दीजिए।"
तव कुल कमल बिपिन दुखदाई। सीता सीत निसा सम आई॥
सुनहु नाथ सीता बिनु दीन्हें। हित न तुम्हार संभु अज कीन्हें॥ ३६ ॥ अर्थ: आपके कुल रूपी कमलों के वन को दुख देने (नष्ट करने) के लिए सीता जाड़े की रात के समान आई है। हे नाथ! सुनिए, सीता को लौटाए बिना शिवजी और ब्रह्माजी के करने से भी आपका भला नहीं हो सकता॥ ३६ ॥
सुनहु नाथ सीता बिनु दीन्हें। हित न तुम्हार संभु अज कीन्हें॥ ३६ ॥ अर्थ: आपके कुल रूपी कमलों के वन को दुख देने (नष्ट करने) के लिए सीता जाड़े की रात के समान आई है। हे नाथ! सुनिए, सीता को लौटाए बिना शिवजी और ब्रह्माजी के करने से भी आपका भला नहीं हो सकता॥ ३६ ॥
राम बान अहि गन सरिस निकर निसाचर भेक।
जब लगि ग्रसत न तब लगि जतनु करहु तजि टेक॥ ३७ ॥ अर्थ: श्री राम जी के बाण सर्पों के समूह के समान हैं और राक्षसों के समूह मेंढकों के समान हैं। जब तक वे इन्हें ग्रस (खा) नहीं लेते, तब तक हठ छोड़कर अपनी रक्षा का कोई उपाय कर लीजिए॥ ३७ ॥
जब लगि ग्रसत न तब लगि जतनु करहु तजि टेक॥ ३७ ॥ अर्थ: श्री राम जी के बाण सर्पों के समूह के समान हैं और राक्षसों के समूह मेंढकों के समान हैं। जब तक वे इन्हें ग्रस (खा) नहीं लेते, तब तक हठ छोड़कर अपनी रक्षा का कोई उपाय कर लीजिए॥ ३७ ॥
श्रवन सुनी सठ ता करि बानी। बिहसा जगत बिदित अभिमानी॥
सभय सुभाउ नारि कर साचा। मंगल महुँ भय मन अति काचा॥
जौं आवइ मर्कट कटकाई। जिअहिं बिचारे निसिचर खाई॥
कंपहिं लोकप जाकीं त्रासा। तासु नारि सभीत बड़ि हासा॥
अस कहि बिहसि ताहि उर लाई। चलेउ सभाँ ममता अधिकाई॥
मंदोदरी हृदयँ कर चिंता। भयउ कंत पर बिधि बिपरीता॥
बैठेउ सभाँ खबरि असि पाई। सिंधु पार सेना सब आई॥
बूझेसि सचिव उचित मत कहहू। ते सब हँसे मष्ट करि रहहू॥
जितेहु सुरासुर तब श्रम नाहीं। नर बानर केहि लेखे माहीं॥ अर्थ: उस मूर्ख और जगत्-प्रसिद्ध अभिमानी (रावण) ने पत्नी की बात कानों से सुनी और हँसकर बोला- "स्त्रियों का स्वभाव सचमुच ही डरपोक होता है। मंगल में भी उन्हें भय लगता है, उनका मन बहुत कच्चा (कमजोर) होता है। यदि वानरों की सेना आ भी गई, तो बेचारे राक्षस उन्हें खाकर अपना जीवन निर्वाह करेंगे। जिसके डर से लोकपाल भी कांपते हैं, उसकी पत्नी का इस तरह डरना बड़ी हँसी की बात है।" ऐसा कहकर वह हँसा और मंदोदरी को हृदय से लगाकर ममता बढ़ाकर सभा में चला गया। मंदोदरी हृदय में चिंता करने लगी कि पति पर विधाता विपरीत (क्रोधित) हो गए हैं। रावण ने सभा में बैठकर ऐसी खबर पाई कि श्री राम की सारी सेना समुद्र के पार आ गई है। उसने मंत्रियों से पूछा- "उचित सलाह कहो।" वे सब हँसे और बोले- "चुप किए रहिए! जब आपने देवताओं और दानवों को जीत लिया, तब तो कोई परिश्रम नहीं हुआ, फिर ये मनुष्य और वानर किस गिनती में हैं?"
सभय सुभाउ नारि कर साचा। मंगल महुँ भय मन अति काचा॥
जौं आवइ मर्कट कटकाई। जिअहिं बिचारे निसिचर खाई॥
कंपहिं लोकप जाकीं त्रासा। तासु नारि सभीत बड़ि हासा॥
अस कहि बिहसि ताहि उर लाई। चलेउ सभाँ ममता अधिकाई॥
मंदोदरी हृदयँ कर चिंता। भयउ कंत पर बिधि बिपरीता॥
बैठेउ सभाँ खबरि असि पाई। सिंधु पार सेना सब आई॥
बूझेसि सचिव उचित मत कहहू। ते सब हँसे मष्ट करि रहहू॥
जितेहु सुरासुर तब श्रम नाहीं। नर बानर केहि लेखे माहीं॥ अर्थ: उस मूर्ख और जगत्-प्रसिद्ध अभिमानी (रावण) ने पत्नी की बात कानों से सुनी और हँसकर बोला- "स्त्रियों का स्वभाव सचमुच ही डरपोक होता है। मंगल में भी उन्हें भय लगता है, उनका मन बहुत कच्चा (कमजोर) होता है। यदि वानरों की सेना आ भी गई, तो बेचारे राक्षस उन्हें खाकर अपना जीवन निर्वाह करेंगे। जिसके डर से लोकपाल भी कांपते हैं, उसकी पत्नी का इस तरह डरना बड़ी हँसी की बात है।" ऐसा कहकर वह हँसा और मंदोदरी को हृदय से लगाकर ममता बढ़ाकर सभा में चला गया। मंदोदरी हृदय में चिंता करने लगी कि पति पर विधाता विपरीत (क्रोधित) हो गए हैं। रावण ने सभा में बैठकर ऐसी खबर पाई कि श्री राम की सारी सेना समुद्र के पार आ गई है। उसने मंत्रियों से पूछा- "उचित सलाह कहो।" वे सब हँसे और बोले- "चुप किए रहिए! जब आपने देवताओं और दानवों को जीत लिया, तब तो कोई परिश्रम नहीं हुआ, फिर ये मनुष्य और वानर किस गिनती में हैं?"
सचिव बैद गुर तीनि जौं प्रिय बोलहिं भय आस।
राज धर्म तन तीनि कर होइ बेगिहीं नास॥ ३८ ॥ अर्थ: मंत्री, वैद्य और गुरु- यदि ये तीनों भय या लाभ की आशा से (मुँहदेखी) प्रिय बात बोलने लगें, तो क्रमशः राज्य, शरीर और धर्म- इन तीनों का शीघ्र ही नाश हो जाता है॥ ३८ ॥
राज धर्म तन तीनि कर होइ बेगिहीं नास॥ ३८ ॥ अर्थ: मंत्री, वैद्य और गुरु- यदि ये तीनों भय या लाभ की आशा से (मुँहदेखी) प्रिय बात बोलने लगें, तो क्रमशः राज्य, शरीर और धर्म- इन तीनों का शीघ्र ही नाश हो जाता है॥ ३८ ॥
सोइ रावन कहुँ बनी सहाई। अस्तुति करहिं सुनाइ सुनाई॥
अवसर जानि बिभीषनु आवा। भ्राता चरन सीसु तेहिं नावा॥
पुनि सिरु नाइ बैठ निज आसन। बोला बचन पाइ अनुसासन॥
जौ कृपाल पूँछिहु मोहि बाता। मति अनुरूप कहउँ हित ताता॥
जो आपन चाहै कल्याना। सुजसु सुमति सुभ गति सुख नाना॥
सो परनारि लिलार गोसाईं। तजउ चउथि के चंद की नाईं॥
चौदह भुवन एक पति होई। भूतद्रोह तिष्टइ नहिं सोई॥
गुन सागर नागर नर जोऊ। अलप लोभ भल कहइ न कोऊ॥ अर्थ: रावण के लिए भी वही सहायता (परिस्थिति) बन गई है। मंत्री उसे सुना-सुनाकर उसकी स्तुति कर रहे हैं। उसी अवसर को जानकर विभीषण जी आए और उन्होंने बड़े भाई के चरणों में सिर नवाया। फिर सिर नवाकर अपने आसन पर बैठ गए और आज्ञा पाकर वचन बोले- "हे कृपालु! जब आपने मुझसे बात पूछी है, तो हे तात! मैं अपनी बुद्धि के अनुसार आपके हित की बात कहता हूँ। हे गोसाईं! जो मनुष्य अपना कल्याण, सुंदर यश, सुबुद्धि, शुभ गति और नाना प्रकार के सुख चाहता हो, उसे पराई स्त्री के माथे को चौथ के चंद्रमा की तरह त्याग देना चाहिए (अर्थात् उसे कभी नहीं देखना चाहिए)। जो चौदह लोकों का अकेला स्वामी हो, यदि वह भी प्राणियों से द्रोह (शत्रुता) करता है, तो वह भी नहीं टिक सकता (नष्ट हो जाता है)। जो मनुष्य गुणों का सागर और चतुर हो, उसे भी थोड़ा सा लोभ करने पर कोई भला नहीं कहता।"
अवसर जानि बिभीषनु आवा। भ्राता चरन सीसु तेहिं नावा॥
पुनि सिरु नाइ बैठ निज आसन। बोला बचन पाइ अनुसासन॥
जौ कृपाल पूँछिहु मोहि बाता। मति अनुरूप कहउँ हित ताता॥
जो आपन चाहै कल्याना। सुजसु सुमति सुभ गति सुख नाना॥
सो परनारि लिलार गोसाईं। तजउ चउथि के चंद की नाईं॥
चौदह भुवन एक पति होई। भूतद्रोह तिष्टइ नहिं सोई॥
गुन सागर नागर नर जोऊ। अलप लोभ भल कहइ न कोऊ॥ अर्थ: रावण के लिए भी वही सहायता (परिस्थिति) बन गई है। मंत्री उसे सुना-सुनाकर उसकी स्तुति कर रहे हैं। उसी अवसर को जानकर विभीषण जी आए और उन्होंने बड़े भाई के चरणों में सिर नवाया। फिर सिर नवाकर अपने आसन पर बैठ गए और आज्ञा पाकर वचन बोले- "हे कृपालु! जब आपने मुझसे बात पूछी है, तो हे तात! मैं अपनी बुद्धि के अनुसार आपके हित की बात कहता हूँ। हे गोसाईं! जो मनुष्य अपना कल्याण, सुंदर यश, सुबुद्धि, शुभ गति और नाना प्रकार के सुख चाहता हो, उसे पराई स्त्री के माथे को चौथ के चंद्रमा की तरह त्याग देना चाहिए (अर्थात् उसे कभी नहीं देखना चाहिए)। जो चौदह लोकों का अकेला स्वामी हो, यदि वह भी प्राणियों से द्रोह (शत्रुता) करता है, तो वह भी नहीं टिक सकता (नष्ट हो जाता है)। जो मनुष्य गुणों का सागर और चतुर हो, उसे भी थोड़ा सा लोभ करने पर कोई भला नहीं कहता।"
काम क्रोध मद लोभ सब नाथ नरक के पंथ।
सब परिहरि रघुबीरहि भजहु भजहिं जेहि संत॥ ३९ ॥ अर्थ: हे नाथ! काम, क्रोध, अहंकार और लोभ- ये सब नरक के रास्ते हैं। इन सबको छोड़कर श्री रघुवीर का भजन कीजिए, जिनका संत लोग भजन करते हैं॥ ३९ ॥
सब परिहरि रघुबीरहि भजहु भजहिं जेहि संत॥ ३९ ॥ अर्थ: हे नाथ! काम, क्रोध, अहंकार और लोभ- ये सब नरक के रास्ते हैं। इन सबको छोड़कर श्री रघुवीर का भजन कीजिए, जिनका संत लोग भजन करते हैं॥ ३९ ॥
तात राम नहिं नर भूपाला। भुवनेस्वर कालहु कर काला॥
ब्रह्म अनामय अज भगवंता। ब्यापक अजित अनादि अनंता॥
गो द्विज धेनु देव हितकारी। कृपासिंधु मानुष तनुधारी॥
जन रंजन भंजन खल ब्राता। बेद धर्म रच्छक सुनु भ्राता॥
ताहि बयरु तजि नाइअ माथा। प्रनतारति भंजन रघुनाथा॥
देहु नाथ प्रभु कहुँ बैदेही। भजहु राम बिनु हेतु सनेही॥
सरन गएँ प्रभु ताहु न त्यागा। बिस्व द्रोह कृत अघ जेहि लागा॥
जासु नाम त्रय ताप नसावन। सोइ प्रभु प्रगट समुझु जियँ रावन॥ अर्थ: हे तात! श्री राम जी केवल मनुष्य राजा नहीं हैं, वे समस्त लोकों के ईश्वर और काल के भी काल हैं। वे रोगरहित, अजन्मा, भगवान, सर्वव्यापक, अजेय, अनादि और अनंत परब्रह्म हैं। वे ब्राह्मण, गाय और देवताओं का हित करने वाले कृपा के सागर हैं, जिन्होंने मनुष्य का शरीर धारण किया है। हे भाई! सुनिए, वे सेवकों को आनंद देने वाले, दुष्टों के समूह का नाश करने वाले और वेद तथा धर्म के रक्षक हैं। उनसे बैर त्यागकर उनके सामने मस्तक नवाइए, श्री रघुनाथ जी शरणागतों का दुख हरने वाले हैं। हे नाथ! प्रभु को वैदेही (सीता जी) सौंप दीजिये और बिना कारण ही प्रेम करने वाले श्री राम जी का भजन कीजिए। जिसने पूरे विश्व से द्रोह किया हो और जिसे महान पाप लगा हो, यदि वह भी शरण में चला जाए तो प्रभु उसे भी नहीं त्यागते। जिनका नाम तीनों तापों (दैहिक, दैविक, भौतिक) का नाश करने वाला है, हे रावण! हृदय में समझो, वही प्रभु स्वयं यहाँ प्रकट हुए हैं।
ब्रह्म अनामय अज भगवंता। ब्यापक अजित अनादि अनंता॥
गो द्विज धेनु देव हितकारी। कृपासिंधु मानुष तनुधारी॥
जन रंजन भंजन खल ब्राता। बेद धर्म रच्छक सुनु भ्राता॥
ताहि बयरु तजि नाइअ माथा। प्रनतारति भंजन रघुनाथा॥
देहु नाथ प्रभु कहुँ बैदेही। भजहु राम बिनु हेतु सनेही॥
सरन गएँ प्रभु ताहु न त्यागा। बिस्व द्रोह कृत अघ जेहि लागा॥
जासु नाम त्रय ताप नसावन। सोइ प्रभु प्रगट समुझु जियँ रावन॥ अर्थ: हे तात! श्री राम जी केवल मनुष्य राजा नहीं हैं, वे समस्त लोकों के ईश्वर और काल के भी काल हैं। वे रोगरहित, अजन्मा, भगवान, सर्वव्यापक, अजेय, अनादि और अनंत परब्रह्म हैं। वे ब्राह्मण, गाय और देवताओं का हित करने वाले कृपा के सागर हैं, जिन्होंने मनुष्य का शरीर धारण किया है। हे भाई! सुनिए, वे सेवकों को आनंद देने वाले, दुष्टों के समूह का नाश करने वाले और वेद तथा धर्म के रक्षक हैं। उनसे बैर त्यागकर उनके सामने मस्तक नवाइए, श्री रघुनाथ जी शरणागतों का दुख हरने वाले हैं। हे नाथ! प्रभु को वैदेही (सीता जी) सौंप दीजिये और बिना कारण ही प्रेम करने वाले श्री राम जी का भजन कीजिए। जिसने पूरे विश्व से द्रोह किया हो और जिसे महान पाप लगा हो, यदि वह भी शरण में चला जाए तो प्रभु उसे भी नहीं त्यागते। जिनका नाम तीनों तापों (दैहिक, दैविक, भौतिक) का नाश करने वाला है, हे रावण! हृदय में समझो, वही प्रभु स्वयं यहाँ प्रकट हुए हैं।
बार बार पद लागउँ बिनय करउँ दससीस।परिहरि मान मोह मद भजहु कोसलाधीस॥ ४० (क)॥
मुनि पुलस्ति निज सिष्य सन कहि पठई यह बात।
तुरत सो मैं प्रभु सन कही पाइ सुअवसरु तात॥ ४० (ख)॥ अर्थ: हे दशशीश (रावण)! मैं बार-बार आपके चरणों लगता हूँ और विनती करता हूँ कि अभिमान, मोह और मद को छोड़कर कोसलपति श्री राम जी का भजन कीजिए॥ ४० (क)॥ महर्षि पुलस्त्य जी (हमारे दादा) ने अपने शिष्य के हाथों यह बात कहला भेजी थी। हे तात! अच्छा अवसर पाकर मैंने तुरंत ही वह बात प्रभु (आप) से कह दी है॥ ४० (ख)॥
🌸 भाग 9: दोहा 41 से 45
माल्यवान सुचि सचिव सयाना। तासु बचन सुनि अति सुख माना॥
तात अनुज तव नीति बिभूषन। सो उर धरहु जो कहत बिभीषन॥
रिपु उतकरष कहत सठ दोऊ। दूरि न करहु इहाँ हति कोऊ॥
माल्यवान गृह गयउ बहोरी। कहइ बिभीषनु पुनि कर जोरी॥
सुमति कुमति सब कें उर रहहीं। नाथ पुरान निगम अस कहहीं॥
जहाँ सुमति तहँ संपति नाना। जहाँ कुमति तहँ बिपति निदाना॥
तव उर कुमति बसी बिपरीता। हित अनहित मानहु रिपु प्रीता॥
काल राति निसिचर कुल केरी। तेहि सीता पर प्रीति घनेरी॥ अर्थ: माल्यवान नाम का एक पवित्र और चतुर मंत्री था। उसने विभीषण के वचन सुनकर बहुत सुख माना और कहा- "हे तात! तुम्हारा छोटा भाई नीति का भूषण (जानकार) है। विभीषण जो कह रहा है, उसे हृदय में धारण करो।" रावण ने कहा- "ये दोनों मूर्ख शत्रुओं की बड़ाई कर रहे हैं। कोई इन्हें यहाँ से मार कर दूर क्यों नहीं करता?" तब माल्यवान अपने घर लौट गया और विभीषण जी फिर हाथ जोड़कर कहने लगे- "हे नाथ! पुराण और वेद ऐसा कहते हैं कि सुमति (अच्छी बुद्धि) और कुमति (बुरी बुद्धि) सबके हृदय में रहती हैं। जहाँ सुमति होती है, वहाँ नाना प्रकार की संपत्तियां (सुख) होती हैं और जहाँ कुमति होती है, वहाँ अंत में घोर विपत्ति आती है। आपके हृदय में उल्टी बुद्धि (कुमति) बस गई है, इसी से आप हित को अहित और शत्रुओं से प्रेम मान रहे हैं। जो राक्षस कुल के लिए कालरात्रि (विनाश) के समान है, उस सीता पर आपकी बड़ी प्रीति है।"
तात अनुज तव नीति बिभूषन। सो उर धरहु जो कहत बिभीषन॥
रिपु उतकरष कहत सठ दोऊ। दूरि न करहु इहाँ हति कोऊ॥
माल्यवान गृह गयउ बहोरी। कहइ बिभीषनु पुनि कर जोरी॥
सुमति कुमति सब कें उर रहहीं। नाथ पुरान निगम अस कहहीं॥
जहाँ सुमति तहँ संपति नाना। जहाँ कुमति तहँ बिपति निदाना॥
तव उर कुमति बसी बिपरीता। हित अनहित मानहु रिपु प्रीता॥
काल राति निसिचर कुल केरी। तेहि सीता पर प्रीति घनेरी॥ अर्थ: माल्यवान नाम का एक पवित्र और चतुर मंत्री था। उसने विभीषण के वचन सुनकर बहुत सुख माना और कहा- "हे तात! तुम्हारा छोटा भाई नीति का भूषण (जानकार) है। विभीषण जो कह रहा है, उसे हृदय में धारण करो।" रावण ने कहा- "ये दोनों मूर्ख शत्रुओं की बड़ाई कर रहे हैं। कोई इन्हें यहाँ से मार कर दूर क्यों नहीं करता?" तब माल्यवान अपने घर लौट गया और विभीषण जी फिर हाथ जोड़कर कहने लगे- "हे नाथ! पुराण और वेद ऐसा कहते हैं कि सुमति (अच्छी बुद्धि) और कुमति (बुरी बुद्धि) सबके हृदय में रहती हैं। जहाँ सुमति होती है, वहाँ नाना प्रकार की संपत्तियां (सुख) होती हैं और जहाँ कुमति होती है, वहाँ अंत में घोर विपत्ति आती है। आपके हृदय में उल्टी बुद्धि (कुमति) बस गई है, इसी से आप हित को अहित और शत्रुओं से प्रेम मान रहे हैं। जो राक्षस कुल के लिए कालरात्रि (विनाश) के समान है, उस सीता पर आपकी बड़ी प्रीति है।"
तात चरन गहि मागउँ राखहु मोर दुलार।
सीतहि देहु राम कहुँ अहित न होइ तुम्हार॥ ४१ ॥ अर्थ: हे तात (बड़े भाई)! मैं आपके चरण पकड़कर मांगता हूँ, मेरा दुलार रखिए (मेरी विनती मान लीजिए)। श्री राम जी को सीता जी लौटा दीजिए, जिससे आपका कोई अहित न हो॥ ४१ ॥
सीतहि देहु राम कहुँ अहित न होइ तुम्हार॥ ४१ ॥ अर्थ: हे तात (बड़े भाई)! मैं आपके चरण पकड़कर मांगता हूँ, मेरा दुलार रखिए (मेरी विनती मान लीजिए)। श्री राम जी को सीता जी लौटा दीजिए, जिससे आपका कोई अहित न हो॥ ४१ ॥
बुध पुरान श्रुति संमत बानी। कही बिभीषन नीति बखानी॥
सुनत दसानन उठा रिसाई। खल तोहि निकट मृत्यु अब आई॥
जिअसि सदा सठ मोर जियावा। रिपु कर पच्छ मूढ़ तोहि भावा॥
कहसि न खल अस को जग माहीं। भुज बल जाहि जिता मैं नाहीं॥
मम पुर बसि तपसिन्ह पर प्रीती। सठ मिलु जाइ तिन्हहि कहु नीती॥
अस कहि कीन्हेसि चरन प्रहारा। अनुज गहे पद बारहिं बारा॥
उमा संत कइ इहइ बड़ाई। मंद करत जो करइ भलाई॥
तुम्ह पितु सरिस भलेहिं मोहि मारा। रामु भजें हित नाथ तुम्हारा॥
सचिव संग लै नभ पथ गयऊ। सबहि सुनाइ कहत अस भयऊ॥ अर्थ: विभीषण जी ने पंडितों, पुराणों और वेदों द्वारा सम्मत (स्वीकृत) नीति बखान कर कही। परंतु इसे सुनते ही रावण क्रोधित होकर उठा और बोला- "रे दुष्ट! अब तेरी मृत्यु निकट आ गई है। रे मूर्ख! तू हमेशा मेरे ही जिलाने (अन्न) से जीता है, और हे मूढ़! अब तुझे शत्रुओं का पक्ष अच्छा लग रहा है। अरे दुष्ट! बता, इस जगत् में ऐसा कौन है जिसे मैंने अपने भुजबल से न जीता हो? मेरे नगर में रहकर तपस्वियों पर प्रीति करता है? मूर्ख! जा, उन्हीं से मिलकर उन्हें नीति बता।" ऐसा कहकर रावण ने विभीषण को लात मारी। परंतु छोटे भाई विभीषण ने बार-बार उसके चरण ही पकड़े। शिवजी कहते हैं- हे उमा! संतों की यही बड़ाई (महानता) है कि वे बुराई करने वाले के साथ भी भलाई ही करते हैं। विभीषण ने कहा- "आप मेरे पिता के समान हैं, आपने मुझे मारा तो बहुत अच्छा किया, परंतु हे नाथ! आपका भला श्री राम जी का भजन करने में ही है।" फिर विभीषण अपने मंत्रियों को साथ लेकर आकाश मार्ग से चले गए और जाते समय सबको सुनाकर ऐसा कहा-
सुनत दसानन उठा रिसाई। खल तोहि निकट मृत्यु अब आई॥
जिअसि सदा सठ मोर जियावा। रिपु कर पच्छ मूढ़ तोहि भावा॥
कहसि न खल अस को जग माहीं। भुज बल जाहि जिता मैं नाहीं॥
मम पुर बसि तपसिन्ह पर प्रीती। सठ मिलु जाइ तिन्हहि कहु नीती॥
अस कहि कीन्हेसि चरन प्रहारा। अनुज गहे पद बारहिं बारा॥
उमा संत कइ इहइ बड़ाई। मंद करत जो करइ भलाई॥
तुम्ह पितु सरिस भलेहिं मोहि मारा। रामु भजें हित नाथ तुम्हारा॥
सचिव संग लै नभ पथ गयऊ। सबहि सुनाइ कहत अस भयऊ॥ अर्थ: विभीषण जी ने पंडितों, पुराणों और वेदों द्वारा सम्मत (स्वीकृत) नीति बखान कर कही। परंतु इसे सुनते ही रावण क्रोधित होकर उठा और बोला- "रे दुष्ट! अब तेरी मृत्यु निकट आ गई है। रे मूर्ख! तू हमेशा मेरे ही जिलाने (अन्न) से जीता है, और हे मूढ़! अब तुझे शत्रुओं का पक्ष अच्छा लग रहा है। अरे दुष्ट! बता, इस जगत् में ऐसा कौन है जिसे मैंने अपने भुजबल से न जीता हो? मेरे नगर में रहकर तपस्वियों पर प्रीति करता है? मूर्ख! जा, उन्हीं से मिलकर उन्हें नीति बता।" ऐसा कहकर रावण ने विभीषण को लात मारी। परंतु छोटे भाई विभीषण ने बार-बार उसके चरण ही पकड़े। शिवजी कहते हैं- हे उमा! संतों की यही बड़ाई (महानता) है कि वे बुराई करने वाले के साथ भी भलाई ही करते हैं। विभीषण ने कहा- "आप मेरे पिता के समान हैं, आपने मुझे मारा तो बहुत अच्छा किया, परंतु हे नाथ! आपका भला श्री राम जी का भजन करने में ही है।" फिर विभीषण अपने मंत्रियों को साथ लेकर आकाश मार्ग से चले गए और जाते समय सबको सुनाकर ऐसा कहा-
रामु सत्यसंकल्प प्रभु सभा कालबस तोरि।मैं रघुबीर सरन अब जाउँ देहु जनि खोरि॥ ४२ ॥ अर्थ: श्री राम जी सत्य संकल्प वाले प्रभु हैं और तुम्हारी यह सभा काल (विनाश) के वश में हो गई है। अतः मैं अब श्री रघुवीर की शरण में जा रहा हूँ, मुझे कोई दोष न देना॥ ४२ ॥
अस कहि चला बिभीषनु जबहीं। आयूहीन भए सब तबहीं॥
साधु अवग्या तुरत भवानी। कर कल्यान अखिल कै हानी॥
रावन जबहिं बिभीषन त्यागा। भयउ बिभव बिनु तबहिं अभागा॥
चलेउ हरषि रघुनायक पाहीं। करत मनोरथ बहु मन माहीं॥
देखिहउँ जाइ चरन जलजाता। अरुन मृदुल सेवक सुखदाता॥
जे पद परसि तरी रिषिनारी। दंडक कानन पावनकारी॥
जे पद जनकसुताँ उर लाए। कपट कुरंग संग धर धाए॥
हर उर सर सरोज पद जेई। अहोभाग्य मैं देखिहउँ तेई॥ अर्थ: ऐसा कहकर विभीषण ज्यों ही चले, त्यों ही सब राक्षस आयुहीन हो गए (उनकी मृत्यु निश्चित हो गई)। शिवजी कहते हैं- हे भवानी! साधु (संत) का अपमान तुरंत ही संपूर्ण कल्याणों (पुण्यों) का नाश कर देता है। रावण ने जैसे ही विभीषण को त्यागा, वह अभागा उसी समय ऐश्वर्यहीन हो गया। विभीषण जी हर्षित होकर मन में अनेकों मनोरथ (इच्छाएं) करते हुए श्री रघुनाथ जी के पास चले। वे सोचने लगे- "मैं जाकर उन लाल और कोमल चरण कमलों के दर्शन करूँगा, जो सेवकों को सुख देने वाले हैं। जिन चरणों का स्पर्श पाकर ऋषि पत्नी (अहिल्या) तर गईं; जो दंडक वन को पवित्र करने वाले हैं; जिन चरणों को माता जानकी ने हृदय में धारण किया है; जो कपटी मृग (मारीच) को पकड़ने के लिए पृथ्वी पर दौड़े थे; और जो चरण शिवजी के हृदय रूपी सरोवर के कमल हैं, अहोभाग्य! आज मैं उन्हीं चरणों के दर्शन करूँगा।"
साधु अवग्या तुरत भवानी। कर कल्यान अखिल कै हानी॥
रावन जबहिं बिभीषन त्यागा। भयउ बिभव बिनु तबहिं अभागा॥
चलेउ हरषि रघुनायक पाहीं। करत मनोरथ बहु मन माहीं॥
देखिहउँ जाइ चरन जलजाता। अरुन मृदुल सेवक सुखदाता॥
जे पद परसि तरी रिषिनारी। दंडक कानन पावनकारी॥
जे पद जनकसुताँ उर लाए। कपट कुरंग संग धर धाए॥
हर उर सर सरोज पद जेई। अहोभाग्य मैं देखिहउँ तेई॥ अर्थ: ऐसा कहकर विभीषण ज्यों ही चले, त्यों ही सब राक्षस आयुहीन हो गए (उनकी मृत्यु निश्चित हो गई)। शिवजी कहते हैं- हे भवानी! साधु (संत) का अपमान तुरंत ही संपूर्ण कल्याणों (पुण्यों) का नाश कर देता है। रावण ने जैसे ही विभीषण को त्यागा, वह अभागा उसी समय ऐश्वर्यहीन हो गया। विभीषण जी हर्षित होकर मन में अनेकों मनोरथ (इच्छाएं) करते हुए श्री रघुनाथ जी के पास चले। वे सोचने लगे- "मैं जाकर उन लाल और कोमल चरण कमलों के दर्शन करूँगा, जो सेवकों को सुख देने वाले हैं। जिन चरणों का स्पर्श पाकर ऋषि पत्नी (अहिल्या) तर गईं; जो दंडक वन को पवित्र करने वाले हैं; जिन चरणों को माता जानकी ने हृदय में धारण किया है; जो कपटी मृग (मारीच) को पकड़ने के लिए पृथ्वी पर दौड़े थे; और जो चरण शिवजी के हृदय रूपी सरोवर के कमल हैं, अहोभाग्य! आज मैं उन्हीं चरणों के दर्शन करूँगा।"
जिन्ह पायन्ह के पादुकन्हि भरतु रहे मन लाइ।
ते पद आजु बिलोकिहउँ इन्ह नयनन्हि अब जाइ॥ ४३ ॥ अर्थ: जिन चरणों की खड़ाऊँ में भरत जी अपना मन लगाए रहते हैं, आज मैं जाकर इन्हीं नेत्रों से उन चरणों के दर्शन करूँगा॥ ४३ ॥
ते पद आजु बिलोकिहउँ इन्ह नयनन्हि अब जाइ॥ ४३ ॥ अर्थ: जिन चरणों की खड़ाऊँ में भरत जी अपना मन लगाए रहते हैं, आज मैं जाकर इन्हीं नेत्रों से उन चरणों के दर्शन करूँगा॥ ४३ ॥
एहि बिधि करत सप्रेम बिचारा। आयउ सपदि सिंधु एहिं पारा॥
कपिन्ह बिभीषनु आवत देखा। जाना कोउ रिपु दूत बिसेषा॥
ताहि राखि कपीस पहिं आए। समाचार सब ताहि सुनाए॥
कह सुग्रीव सुनहु रघुराई। आवा मिलन दसानन भाई॥
कह प्रभू सखा बूझिऐ काहा। कहइ कपीस सुनहु नरनाहा॥
जानि न जाइ निसाचर माया। कामरूप केहि कारन आया॥
भेद हमार लेन सठ आवा। राखिअ बाँधि मोहि अस भावा॥
सखा नीति तुम्ह नीकि बिचारी। मम पन सरनागत भयहारी॥
सुनि प्रभु बचन हरष हनुमाना। सरनागत बच्छल भगवाना॥ अर्थ: इस प्रकार प्रेमपूर्ण विचार करते हुए विभीषण जी तुरंत ही समुद्र के इस पार (जिधर श्री राम जी की सेना थी) आ गए। वानरों ने विभीषण को आते देखा तो समझा कि यह शत्रु का कोई विशेष दूत है। उन्हें वहीं रोककर वानर सुग्रीव के पास आए और उन्हें सब समाचार सुनाया। सुग्रीव ने कहा- "हे रघुनाथ जी! सुनिए, रावण का भाई मिलने आया है।" प्रभु श्री राम ने कहा- "हे सखा! तुम क्या समझते हो?" सुग्रीव ने कहा- "हे नरनाथ सुनिए! राक्षसों की माया जानी नहीं जाती। यह इच्छानुसार रूप बदलने वाला न जाने किस कारण आया है। यह मूर्ख हमारा भेद लेने आया है। इसलिए मुझे तो यही अच्छा लगता है कि इसे बाँधकर रख लिया जाए।" श्री राम जी ने कहा- "हे सखा! तुमने नीति तो अच्छी विचारी है, परंतु मेरा यह प्रण है कि मैं शरणागत (शरण में आए हुए) का भय हरने वाला हूँ।" प्रभु के ये वचन सुनकर हनुमान जी बहुत हर्षित हुए कि भगवान शरणागतवत्सल हैं।
कपिन्ह बिभीषनु आवत देखा। जाना कोउ रिपु दूत बिसेषा॥
ताहि राखि कपीस पहिं आए। समाचार सब ताहि सुनाए॥
कह सुग्रीव सुनहु रघुराई। आवा मिलन दसानन भाई॥
कह प्रभू सखा बूझिऐ काहा। कहइ कपीस सुनहु नरनाहा॥
जानि न जाइ निसाचर माया। कामरूप केहि कारन आया॥
भेद हमार लेन सठ आवा। राखिअ बाँधि मोहि अस भावा॥
सखा नीति तुम्ह नीकि बिचारी। मम पन सरनागत भयहारी॥
सुनि प्रभु बचन हरष हनुमाना। सरनागत बच्छल भगवाना॥ अर्थ: इस प्रकार प्रेमपूर्ण विचार करते हुए विभीषण जी तुरंत ही समुद्र के इस पार (जिधर श्री राम जी की सेना थी) आ गए। वानरों ने विभीषण को आते देखा तो समझा कि यह शत्रु का कोई विशेष दूत है। उन्हें वहीं रोककर वानर सुग्रीव के पास आए और उन्हें सब समाचार सुनाया। सुग्रीव ने कहा- "हे रघुनाथ जी! सुनिए, रावण का भाई मिलने आया है।" प्रभु श्री राम ने कहा- "हे सखा! तुम क्या समझते हो?" सुग्रीव ने कहा- "हे नरनाथ सुनिए! राक्षसों की माया जानी नहीं जाती। यह इच्छानुसार रूप बदलने वाला न जाने किस कारण आया है। यह मूर्ख हमारा भेद लेने आया है। इसलिए मुझे तो यही अच्छा लगता है कि इसे बाँधकर रख लिया जाए।" श्री राम जी ने कहा- "हे सखा! तुमने नीति तो अच्छी विचारी है, परंतु मेरा यह प्रण है कि मैं शरणागत (शरण में आए हुए) का भय हरने वाला हूँ।" प्रभु के ये वचन सुनकर हनुमान जी बहुत हर्षित हुए कि भगवान शरणागतवत्सल हैं।
सरनागत कहुँ जे तजहिं निज अनहित अनुमानि।
ते नर पावँर पापमय तिन्हहि बिलोकत हानि॥ ४४ ॥ अर्थ: जो मनुष्य अपना अहित (नुकसान) मानकर, शरण में आए हुए को त्याग देते हैं, वे नीच हैं, पाप से युक्त हैं और उन्हें देखने में भी पाप (हानि) लगता है॥ ४४ ॥
ते नर पावँर पापमय तिन्हहि बिलोकत हानि॥ ४४ ॥ अर्थ: जो मनुष्य अपना अहित (नुकसान) मानकर, शरण में आए हुए को त्याग देते हैं, वे नीच हैं, पाप से युक्त हैं और उन्हें देखने में भी पाप (हानि) लगता है॥ ४४ ॥
कोटि बिप्र बध लागहिं जाहू। आएँ सरन तजउँ नहिं ताहू॥
सनमुख होइ जीव मोहि जबहीं। जन्म कोटि अघ नासहिं तबहीं॥
पापवंत कर सहज सुभाऊ। भजनु मोर तेहि भाव न काऊ॥
जौं पे दुष्टहृदय सोइ होई। मोरें सनमुख आव कि सोई॥
निर्मल मन जन सो मोहि पावा। मोहि कपट छल छिद्र न भावा॥
भेद लेन पठवा दससीसा। तबहुँ न कछु भय हानि कपीसा॥
जग महुँ सखा निसाचर जेते। लछिमनु हनइ निमिष महुँ तेते॥
जौं सभीत आवा सरनाईं। रखिहउँ ताहि प्रान की नाईं॥ अर्थ: श्री राम जी ने कहा- "जिस व्यक्ति को करोड़ों ब्राह्मणों की हत्या का पाप लगा हो, यदि वह भी मेरी शरण में आ जाए तो मैं उसे भी नहीं त्यागता। ज्यों ही कोई जीव मेरे सम्मुख (शरण में) होता है, उसके करोड़ों जन्मों के पाप तुरंत नष्ट हो जाते हैं। पापी का यह सहज स्वभाव है कि उसे मेरा भजन कभी अच्छा नहीं लगता। यदि वह विभीषण दुष्ट हृदय का होता, तो क्या वह मेरे सामने आ सकता था? जो निर्मल मन का मनुष्य है, वही मुझे पाता है। मुझे कपट, छल और छिद्र (दोष) बिलकुल नहीं सुहाते। यदि रावण ने उसे भेद लेने के लिए भी भेजा है, तो भी हे सुग्रीव! हमें कोई भय और हानि नहीं है। हे सखा! जगत् में जितने भी राक्षस हैं, लक्ष्मण पलभर में उन सबको मार सकते हैं। और यदि वह भयभीत होकर मेरी शरण में आया है, तो मैं उसे अपने प्राणों की तरह रखूंगा।"
सनमुख होइ जीव मोहि जबहीं। जन्म कोटि अघ नासहिं तबहीं॥
पापवंत कर सहज सुभाऊ। भजनु मोर तेहि भाव न काऊ॥
जौं पे दुष्टहृदय सोइ होई। मोरें सनमुख आव कि सोई॥
निर्मल मन जन सो मोहि पावा। मोहि कपट छल छिद्र न भावा॥
भेद लेन पठवा दससीसा। तबहुँ न कछु भय हानि कपीसा॥
जग महुँ सखा निसाचर जेते। लछिमनु हनइ निमिष महुँ तेते॥
जौं सभीत आवा सरनाईं। रखिहउँ ताहि प्रान की नाईं॥ अर्थ: श्री राम जी ने कहा- "जिस व्यक्ति को करोड़ों ब्राह्मणों की हत्या का पाप लगा हो, यदि वह भी मेरी शरण में आ जाए तो मैं उसे भी नहीं त्यागता। ज्यों ही कोई जीव मेरे सम्मुख (शरण में) होता है, उसके करोड़ों जन्मों के पाप तुरंत नष्ट हो जाते हैं। पापी का यह सहज स्वभाव है कि उसे मेरा भजन कभी अच्छा नहीं लगता। यदि वह विभीषण दुष्ट हृदय का होता, तो क्या वह मेरे सामने आ सकता था? जो निर्मल मन का मनुष्य है, वही मुझे पाता है। मुझे कपट, छल और छिद्र (दोष) बिलकुल नहीं सुहाते। यदि रावण ने उसे भेद लेने के लिए भी भेजा है, तो भी हे सुग्रीव! हमें कोई भय और हानि नहीं है। हे सखा! जगत् में जितने भी राक्षस हैं, लक्ष्मण पलभर में उन सबको मार सकते हैं। और यदि वह भयभीत होकर मेरी शरण में आया है, तो मैं उसे अपने प्राणों की तरह रखूंगा।"
उभय भाँति तेहि आनहु हँसि कह कृपानिकेत।जय कृपाल कहि कपि चले अंगद हनू समेत॥ ४५ ॥ अर्थ: कृपा के धाम प्रभु श्री राम ने हँसकर कहा- "वह दोनों ही स्थितियों (भेद लेने आया हो या शरण में) में उसे यहाँ ले आओ।" यह सुनकर अंगद और हनुमान जी सहित सुग्रीव 'कृपालु प्रभु की जय हो' कहते हुए चले॥ ४५ ॥
🌸 भाग 10: दोहा 46 से 50
सादर तेहि आगें करि बानर। चले जहाँ रघुपति करुनाकर॥
दूरिहि ते देखे द्वौ भ्राता। नयनानंद दान के दाता॥
बहुरि राम छबिधाम बिलोकी। रहेउ ठटुकि एकटक पल रोकी॥
भुज प्रलंब कंजारुन लोचन। स्यामल गात प्रनत भय मोचन॥
सिंघ कंध आयत उर सोहा। आनन अमित मदन मन मोहा॥
नयन नीर पुलकित अति गाता। मन धरि धीर कही मृदु बाता॥
नाथ दसानन कर मैं भ्राता। निसिचर बंस जनम सुरत्राता॥
सहज पापप्रिय तामस देहा। जथा उलूकहि तम पर नेहा॥ अर्थ: वानर विभीषण जी को आदर के साथ आगे करके वहाँ चले, जहाँ करुणा की खान श्री रघुनाथ जी थे। विभीषण जी ने दूर से ही दोनों भाइयों को देखा, जो नेत्रों को आनंद देने वाले हैं। फिर शोभा के धाम श्री राम जी को देखकर वे पलकें रोककर एकटक देखते ही रह गए। प्रभु की लंबी भुजाएं हैं, लाल कमल के समान नेत्र हैं और शरणागत का भय हरने वाला सांवला शरीर है। सिंह के समान कंधे हैं, चौड़ी छाती है, और मुख ऐसा है जो करोड़ों कामदेवों के मन को भी मोह ले। विभीषण जी के नेत्रों में जल भर आया और शरीर अत्यंत पुलकित हो गया। उन्होंने मन में धीरज धरकर कोमल वचन कहे- "हे नाथ! हे देवताओं के रक्षक! मैं रावण का भाई हूँ और मेरा जन्म राक्षस कुल में हुआ है। मेरा तामसी शरीर है और मुझे पाप स्वाभाविक ही प्रिय हैं, जैसे उल्लू को अंधकार से प्रेम होता है।"
दूरिहि ते देखे द्वौ भ्राता। नयनानंद दान के दाता॥
बहुरि राम छबिधाम बिलोकी। रहेउ ठटुकि एकटक पल रोकी॥
भुज प्रलंब कंजारुन लोचन। स्यामल गात प्रनत भय मोचन॥
सिंघ कंध आयत उर सोहा। आनन अमित मदन मन मोहा॥
नयन नीर पुलकित अति गाता। मन धरि धीर कही मृदु बाता॥
नाथ दसानन कर मैं भ्राता। निसिचर बंस जनम सुरत्राता॥
सहज पापप्रिय तामस देहा। जथा उलूकहि तम पर नेहा॥ अर्थ: वानर विभीषण जी को आदर के साथ आगे करके वहाँ चले, जहाँ करुणा की खान श्री रघुनाथ जी थे। विभीषण जी ने दूर से ही दोनों भाइयों को देखा, जो नेत्रों को आनंद देने वाले हैं। फिर शोभा के धाम श्री राम जी को देखकर वे पलकें रोककर एकटक देखते ही रह गए। प्रभु की लंबी भुजाएं हैं, लाल कमल के समान नेत्र हैं और शरणागत का भय हरने वाला सांवला शरीर है। सिंह के समान कंधे हैं, चौड़ी छाती है, और मुख ऐसा है जो करोड़ों कामदेवों के मन को भी मोह ले। विभीषण जी के नेत्रों में जल भर आया और शरीर अत्यंत पुलकित हो गया। उन्होंने मन में धीरज धरकर कोमल वचन कहे- "हे नाथ! हे देवताओं के रक्षक! मैं रावण का भाई हूँ और मेरा जन्म राक्षस कुल में हुआ है। मेरा तामसी शरीर है और मुझे पाप स्वाभाविक ही प्रिय हैं, जैसे उल्लू को अंधकार से प्रेम होता है।"
श्रवन सुजसु सुनि आयउँ प्रभु भंजन भव भीर।
त्राहि त्राहि आरति हरन सरन सुखद रघुबीर॥ ४६ ॥ अर्थ: "मैंने अपने कानों से आपका सुयश सुना है, इसलिए हे भव-भय (संसार के डर) का नाश करने वाले प्रभु! मैं आपके पास आया हूँ। हे आर्तहरन, शरणागत को सुख देने वाले रघुवीर! मेरी रक्षा कीजिए, रक्षा कीजिए"॥ ४६ ॥
त्राहि त्राहि आरति हरन सरन सुखद रघुबीर॥ ४६ ॥ अर्थ: "मैंने अपने कानों से आपका सुयश सुना है, इसलिए हे भव-भय (संसार के डर) का नाश करने वाले प्रभु! मैं आपके पास आया हूँ। हे आर्तहरन, शरणागत को सुख देने वाले रघुवीर! मेरी रक्षा कीजिए, रक्षा कीजिए"॥ ४६ ॥
अस कहि करत दंडवत देखा। तुरत उठे प्रभु हरष बिसेषा॥
दीन बचन सुनि प्रभु मन भावा। भुज बिसाल गहि हृदयँ लगावा॥
अनुज सहित मिलि ढिग बैठारी। बोले बचन भगत भयहारी॥
कहु लंकेस सहित परिवारा। कुसल कुठाहर बास तुम्हारा॥
खल मंडलीं बसहु दिनु राती। सखा धरम निबहेहि केहि भाँती॥
मैं जानउँ तुम्हारि सब रीती। अति नय निपुन न भाव अनीती॥
बरु भल बास नरक कर ताता। दुष्ट संग जनि देइ बिधाता॥
अब पद देखि कुसल रघुराया। जौं तुम्ह कीन्हि जानि जन दाया॥ अर्थ: ऐसा कहकर उन्हें दंडवत करते देख प्रभु अत्यंत हर्षित होकर तुरंत उठे। उनके दीन वचन प्रभु के मन को बहुत भाए, उन्होंने अपनी विशाल भुजाओं से पकड़कर उन्हें हृदय से लगा लिया। छोटे भाई (लक्ष्मण) सहित गले मिलकर उन्हें अपने पास बैठाया और भक्तों का भय हरने वाले वचन बोले- "हे लंकेश! परिवार सहित अपनी कुशल कहो। तुम्हारा निवास तो बुरी जगह पर है। तुम दिन-रात दुष्टों की मंडली में बसते हो, ऐसे में हे सखा! धर्म का निर्वाह कैसे होता है? मैं तुम्हारी सारी रीति जानता हूँ। तुम अत्यंत नीतिनिपुण हो और तुम्हें अनीति नहीं सुहाती। हे तात! नरक में रहना भला है, परंतु विधाता दुष्टों का संग न दे।" विभीषण जी ने कहा- "अब आपके चरण देख लिए हैं, तो हे रघुनाथ जी! कुशल ही है, क्योंकि आपने मुझे अपना सेवक जानकर दया की है।"
दीन बचन सुनि प्रभु मन भावा। भुज बिसाल गहि हृदयँ लगावा॥
अनुज सहित मिलि ढिग बैठारी। बोले बचन भगत भयहारी॥
कहु लंकेस सहित परिवारा। कुसल कुठाहर बास तुम्हारा॥
खल मंडलीं बसहु दिनु राती। सखा धरम निबहेहि केहि भाँती॥
मैं जानउँ तुम्हारि सब रीती। अति नय निपुन न भाव अनीती॥
बरु भल बास नरक कर ताता। दुष्ट संग जनि देइ बिधाता॥
अब पद देखि कुसल रघुराया। जौं तुम्ह कीन्हि जानि जन दाया॥ अर्थ: ऐसा कहकर उन्हें दंडवत करते देख प्रभु अत्यंत हर्षित होकर तुरंत उठे। उनके दीन वचन प्रभु के मन को बहुत भाए, उन्होंने अपनी विशाल भुजाओं से पकड़कर उन्हें हृदय से लगा लिया। छोटे भाई (लक्ष्मण) सहित गले मिलकर उन्हें अपने पास बैठाया और भक्तों का भय हरने वाले वचन बोले- "हे लंकेश! परिवार सहित अपनी कुशल कहो। तुम्हारा निवास तो बुरी जगह पर है। तुम दिन-रात दुष्टों की मंडली में बसते हो, ऐसे में हे सखा! धर्म का निर्वाह कैसे होता है? मैं तुम्हारी सारी रीति जानता हूँ। तुम अत्यंत नीतिनिपुण हो और तुम्हें अनीति नहीं सुहाती। हे तात! नरक में रहना भला है, परंतु विधाता दुष्टों का संग न दे।" विभीषण जी ने कहा- "अब आपके चरण देख लिए हैं, तो हे रघुनाथ जी! कुशल ही है, क्योंकि आपने मुझे अपना सेवक जानकर दया की है।"
तब लगि कुसल न जीव कहुँ सपनेहुँ मन बिश्राम।
जब लगि भजत न राम कहुँ सोक धाम तजि काम॥ ४७ ॥ अर्थ: जीव को तब तक कहीं भी कुशल नहीं है और स्वप्न में भी मन को शांति नहीं मिलती, जब तक वह शोक के घर 'काम' (वासनाओं) को छोड़कर श्री राम का भजन नहीं करता॥ ४७ ॥
जब लगि भजत न राम कहुँ सोक धाम तजि काम॥ ४७ ॥ अर्थ: जीव को तब तक कहीं भी कुशल नहीं है और स्वप्न में भी मन को शांति नहीं मिलती, जब तक वह शोक के घर 'काम' (वासनाओं) को छोड़कर श्री राम का भजन नहीं करता॥ ४७ ॥
तब लगि हृदयँ बसत खल नाना। लोभ मोह मच्छर मद माना॥
जब लगि उर न बसत रघुनाथा। धरें चाप सायक कटि भाथा॥
ममता तरुन तमी अँधिआरी। राग द्वेष उलूक सुखकारी॥
तब लगि बसति जीव मन माहीं। जब लगि प्रभु प्रताप रबि नाहीं॥
अब मैं कुसल मिटे भय भारे। देखि राम पद कमल तुम्हारे॥
तुम्ह कृपाल जा पर अनुकूला। ताहि न ब्याप त्रिबिध भव सूला॥
मैं निसिचर अति अधम सुभाऊ। सुभ आचरनु कीन्ह नहिं काऊ॥
जासु रूप मुनि ध्यान न आवा। तेहिं प्रभु हरषि हृदयँ मोहि लावा॥ अर्थ: "तब तक हृदय में अनेकों दुष्ट- लोभ, मोह, मत्सर (ईर्ष्या), मद और मान बसते हैं, जब तक श्री रघुनाथ जी कमर में तरकस और हाथों में धनुष-बाण धारण किए हुए हृदय में नहीं बसते। ममता रूपी अंधेरी रात में राग और द्वेष रूपी उल्लू सुख पाते हैं। वे जीव के मन में तभी तक बसते हैं, जब तक प्रभु के प्रताप रूपी सूर्य का उदय नहीं होता। अब आपके चरण कमलों के दर्शन कर लेने से मैं कुशल से हूँ और मेरे भारी भय मिट गए हैं। हे कृपालु! जिस पर आप अनुकूल होते हैं, उसे तीनों प्रकार के भव-शूल (दैहिक, दैविक, भौतिक दुख) नहीं व्यापते। मैं अत्यंत नीच स्वभाव वाला राक्षस हूँ। मैंने कभी कोई शुभ आचरण नहीं किया। जिनका रूप मुनियों के ध्यान में भी नहीं आता, उन्हीं प्रभु ने हर्षित होकर मुझे हृदय से लगा लिया।"
जब लगि उर न बसत रघुनाथा। धरें चाप सायक कटि भाथा॥
ममता तरुन तमी अँधिआरी। राग द्वेष उलूक सुखकारी॥
तब लगि बसति जीव मन माहीं। जब लगि प्रभु प्रताप रबि नाहीं॥
अब मैं कुसल मिटे भय भारे। देखि राम पद कमल तुम्हारे॥
तुम्ह कृपाल जा पर अनुकूला। ताहि न ब्याप त्रिबिध भव सूला॥
मैं निसिचर अति अधम सुभाऊ। सुभ आचरनु कीन्ह नहिं काऊ॥
जासु रूप मुनि ध्यान न आवा। तेहिं प्रभु हरषि हृदयँ मोहि लावा॥ अर्थ: "तब तक हृदय में अनेकों दुष्ट- लोभ, मोह, मत्सर (ईर्ष्या), मद और मान बसते हैं, जब तक श्री रघुनाथ जी कमर में तरकस और हाथों में धनुष-बाण धारण किए हुए हृदय में नहीं बसते। ममता रूपी अंधेरी रात में राग और द्वेष रूपी उल्लू सुख पाते हैं। वे जीव के मन में तभी तक बसते हैं, जब तक प्रभु के प्रताप रूपी सूर्य का उदय नहीं होता। अब आपके चरण कमलों के दर्शन कर लेने से मैं कुशल से हूँ और मेरे भारी भय मिट गए हैं। हे कृपालु! जिस पर आप अनुकूल होते हैं, उसे तीनों प्रकार के भव-शूल (दैहिक, दैविक, भौतिक दुख) नहीं व्यापते। मैं अत्यंत नीच स्वभाव वाला राक्षस हूँ। मैंने कभी कोई शुभ आचरण नहीं किया। जिनका रूप मुनियों के ध्यान में भी नहीं आता, उन्हीं प्रभु ने हर्षित होकर मुझे हृदय से लगा लिया।"
अहोभाग्य मम अमित अति राम कृपा सुख पुंज।देखेउँ नयन बिरंचि सिब सेब्य जुगल पद कंज॥ ४८ ॥ अर्थ: "मेरा अहोभाग्य है, श्री राम जी की कृपा से मुझे अपार सुख प्राप्त हुआ है। ब्रह्मा और शिव जी द्वारा सेवित दोनों चरण कमलों को मैंने आज अपने नेत्रों से देखा है"॥ ४८ ॥
सुनहु सखा निज कहउँ सुभाऊ। जान भुसुंडि संभु गिरिजाऊ॥
जौं नर होइ चराचर द्रोही। आवै सभय सरन तकि मोही॥
तजि मद मोह कपट छल नाना। करउँ सद्य तेहि साधु समाना॥
जननी जनक बंधु सुत दारा। तनु धनु भवन सुह्रद परिवारा॥
सब कै ममता ताग बटोरी। मम पद मनहि बाँध बरि डोरी॥
समदरसी इच्छा कछु नाहीं। हरष सोक भय नहिं मन माहीं॥
अस सज्जन मम उर बस कैसें। लोभी हृदयँ बसइ धनु जैसें॥
तुम्ह सारिखे संत प्रिय मोरें। धरउँ देह नहिं आन निहोरें॥ अर्थ: प्रभु ने कहा- "हे सखा, सुनो! मैं अपना स्वभाव कहता हूँ, जिसे काकभुशुंडि, शिवजी और पार्वती जी भी जानते हैं। यदि कोई मनुष्य जड़-चेतन (पूरे संसार) का द्रोही हो, परंतु यदि वह भी भयभीत होकर मेरी शरण में आ जाए, और मद, मोह और नाना प्रकार के छल-कपट त्याग दे, तो मैं उसे शीघ्र ही साधु के समान कर देता हूँ। माता, पिता, भाई, पुत्र, पत्नी, शरीर, धन, घर, मित्र और परिवार- इन सब की ममता के धागों को बटोरकर (एकत्र करके) जो उस डोरी से अपने मन को मेरे चरणों में बाँध देता है; जो समदर्शी है, जिसे कोई इच्छा नहीं है, जिसके मन में हर्ष, शोक और भय नहीं है- ऐसा सज्जन मेरे हृदय में वैसे ही बसता है, जैसे लोभी के हृदय में धन बसता है। तुम्हारे जैसे संत मुझे अत्यंत प्रिय हैं, मैं तो और किसी कारण से अवतार (देह धारण) नहीं लेता।"
जौं नर होइ चराचर द्रोही। आवै सभय सरन तकि मोही॥
तजि मद मोह कपट छल नाना। करउँ सद्य तेहि साधु समाना॥
जननी जनक बंधु सुत दारा। तनु धनु भवन सुह्रद परिवारा॥
सब कै ममता ताग बटोरी। मम पद मनहि बाँध बरि डोरी॥
समदरसी इच्छा कछु नाहीं। हरष सोक भय नहिं मन माहीं॥
अस सज्जन मम उर बस कैसें। लोभी हृदयँ बसइ धनु जैसें॥
तुम्ह सारिखे संत प्रिय मोरें। धरउँ देह नहिं आन निहोरें॥ अर्थ: प्रभु ने कहा- "हे सखा, सुनो! मैं अपना स्वभाव कहता हूँ, जिसे काकभुशुंडि, शिवजी और पार्वती जी भी जानते हैं। यदि कोई मनुष्य जड़-चेतन (पूरे संसार) का द्रोही हो, परंतु यदि वह भी भयभीत होकर मेरी शरण में आ जाए, और मद, मोह और नाना प्रकार के छल-कपट त्याग दे, तो मैं उसे शीघ्र ही साधु के समान कर देता हूँ। माता, पिता, भाई, पुत्र, पत्नी, शरीर, धन, घर, मित्र और परिवार- इन सब की ममता के धागों को बटोरकर (एकत्र करके) जो उस डोरी से अपने मन को मेरे चरणों में बाँध देता है; जो समदर्शी है, जिसे कोई इच्छा नहीं है, जिसके मन में हर्ष, शोक और भय नहीं है- ऐसा सज्जन मेरे हृदय में वैसे ही बसता है, जैसे लोभी के हृदय में धन बसता है। तुम्हारे जैसे संत मुझे अत्यंत प्रिय हैं, मैं तो और किसी कारण से अवतार (देह धारण) नहीं लेता।"
सगुन उपासक परहित निरत नीति दृढ़ नेम।
ते नर प्रान समान मम जिन्ह कें द्विज पद प्रेम॥ ४९ ॥ अर्थ: "जो सगुण भगवान के उपासक हैं, दूसरों की भलाई में लगे रहते हैं, नीति और नियमों में दृढ़ हैं, और जिनका ब्राह्मणों के चरणों में प्रेम है, वे मनुष्य मुझे प्राणों के समान प्रिय हैं"॥ ४९ ॥
ते नर प्रान समान मम जिन्ह कें द्विज पद प्रेम॥ ४९ ॥ अर्थ: "जो सगुण भगवान के उपासक हैं, दूसरों की भलाई में लगे रहते हैं, नीति और नियमों में दृढ़ हैं, और जिनका ब्राह्मणों के चरणों में प्रेम है, वे मनुष्य मुझे प्राणों के समान प्रिय हैं"॥ ४९ ॥
सुनु लंकेस सकल गुन तोरें। तातें तुम्ह अतिसय प्रिय मोरें॥
राम बचन सुनि बानर जूथा। सकल कहहिं जय कृपा बरूथा॥
सुनत बिभीषनु प्रभु कै बानी। नहिं अघात श्रवनामृत जानी॥
पद अंबुज गहि बारहिं बारा। हृदयँ समात न प्रेमु अपारा॥
सुनहु देव सचराचर स्वामी। प्रनतपाल उर अंतरजामी॥
उर कछु प्रथम बासना रही। प्रभु पद प्रीति सरित सो बही॥
अब कृपाल निज भगति पावनी। देहु सदा सिव मन भावनी॥
एवमस्तु कहि प्रभु रनधीरा। मागा तुरत सिंधु कर नीरा॥
जद्यपि सखा तव इच्छा नाहीं। मोर दरसु अमोघ जग माहीं॥
अस कहि राम तिलक तेहि सारा। सुमन बृष्टि नभ भई अपारा॥ अर्थ: "हे लंकेश! सुनो, तुम्हारे अंदर ये सभी गुण हैं, इसलिए तुम मुझे अत्यंत प्रिय हो।" श्री राम जी के वचन सुनकर वानरों का समूह 'कृपा के धाम की जय हो' कहने लगा। प्रभु की वाणी सुनकर विभीषण जी के कानों को वह अमृत के समान लगी और उनका मन तृप्त नहीं हो रहा था। उन्होंने बार-बार प्रभु के चरण कमल पकड़े, उनके हृदय में अपार प्रेम समा नहीं रहा था। उन्होंने कहा- "हे देव! हे चराचर के स्वामी! हे शरणागत के रक्षक! हे अंतर्यामी! मेरे हृदय में पहले कुछ वासना (राज-पाट की इच्छा) थी, परंतु अब वह प्रभु के चरणों की प्रीति रूपी नदी में बह गई है। अब हे कृपालु! मुझे अपनी वह पवित्र भक्ति दीजिए, जो शिवजी के मन को सदा भाती है।" रणधीर प्रभु ने 'एवमस्तु' (ऐसा ही हो) कहकर तुरंत ही समुद्र का जल माँगा। प्रभु ने कहा- "हे सखा! यद्यपि तुम्हारी कोई इच्छा नहीं है, परंतु जगत् में मेरा दर्शन अमोघ (निष्फल न होने वाला) है।" ऐसा कहकर श्री राम जी ने उन्हें (लंका के राजा का) राजतिलक कर दिया। आकाश से अपार पुष्पों की वर्षा हुई।
राम बचन सुनि बानर जूथा। सकल कहहिं जय कृपा बरूथा॥
सुनत बिभीषनु प्रभु कै बानी। नहिं अघात श्रवनामृत जानी॥
पद अंबुज गहि बारहिं बारा। हृदयँ समात न प्रेमु अपारा॥
सुनहु देव सचराचर स्वामी। प्रनतपाल उर अंतरजामी॥
उर कछु प्रथम बासना रही। प्रभु पद प्रीति सरित सो बही॥
अब कृपाल निज भगति पावनी। देहु सदा सिव मन भावनी॥
एवमस्तु कहि प्रभु रनधीरा। मागा तुरत सिंधु कर नीरा॥
जद्यपि सखा तव इच्छा नाहीं। मोर दरसु अमोघ जग माहीं॥
अस कहि राम तिलक तेहि सारा। सुमन बृष्टि नभ भई अपारा॥ अर्थ: "हे लंकेश! सुनो, तुम्हारे अंदर ये सभी गुण हैं, इसलिए तुम मुझे अत्यंत प्रिय हो।" श्री राम जी के वचन सुनकर वानरों का समूह 'कृपा के धाम की जय हो' कहने लगा। प्रभु की वाणी सुनकर विभीषण जी के कानों को वह अमृत के समान लगी और उनका मन तृप्त नहीं हो रहा था। उन्होंने बार-बार प्रभु के चरण कमल पकड़े, उनके हृदय में अपार प्रेम समा नहीं रहा था। उन्होंने कहा- "हे देव! हे चराचर के स्वामी! हे शरणागत के रक्षक! हे अंतर्यामी! मेरे हृदय में पहले कुछ वासना (राज-पाट की इच्छा) थी, परंतु अब वह प्रभु के चरणों की प्रीति रूपी नदी में बह गई है। अब हे कृपालु! मुझे अपनी वह पवित्र भक्ति दीजिए, जो शिवजी के मन को सदा भाती है।" रणधीर प्रभु ने 'एवमस्तु' (ऐसा ही हो) कहकर तुरंत ही समुद्र का जल माँगा। प्रभु ने कहा- "हे सखा! यद्यपि तुम्हारी कोई इच्छा नहीं है, परंतु जगत् में मेरा दर्शन अमोघ (निष्फल न होने वाला) है।" ऐसा कहकर श्री राम जी ने उन्हें (लंका के राजा का) राजतिलक कर दिया। आकाश से अपार पुष्पों की वर्षा हुई।
रावन क्रोध अनल निज स्वास समीर प्रचंड।
जरत बिभीषनु राखेउ दीन्हेउ राजु अखंड॥ ४९ (क) ॥
जो संपति सिव रावनहि दीन्हि दिएँ दस माथ।
सोइ संपदा बिभीषनहि सकुचि दीन्ह रघुनाथ॥ ४९ (ख) ॥ अर्थ: रावण का क्रोध रूपी अग्नि थी और उसकी श्वास प्रचंड पवन थी। उस अग्नि में जलते हुए विभीषण को श्री राम जी ने बचा लिया और उसे लंका का अखंड राज्य दे दिया॥ ४९ (क)॥ शिवजी ने जो संपत्ति अपने दस सिर काटकर चढ़ाने पर रावण को दी थी, वही संपत्ति श्री रघुनाथ जी ने अत्यंत संकोच के साथ विभीषण को दे दी॥ ४९ (ख)॥
जरत बिभीषनु राखेउ दीन्हेउ राजु अखंड॥ ४९ (क) ॥
जो संपति सिव रावनहि दीन्हि दिएँ दस माथ।
सोइ संपदा बिभीषनहि सकुचि दीन्ह रघुनाथ॥ ४९ (ख) ॥ अर्थ: रावण का क्रोध रूपी अग्नि थी और उसकी श्वास प्रचंड पवन थी। उस अग्नि में जलते हुए विभीषण को श्री राम जी ने बचा लिया और उसे लंका का अखंड राज्य दे दिया॥ ४९ (क)॥ शिवजी ने जो संपत्ति अपने दस सिर काटकर चढ़ाने पर रावण को दी थी, वही संपत्ति श्री रघुनाथ जी ने अत्यंत संकोच के साथ विभीषण को दे दी॥ ४९ (ख)॥
अस प्रभु छाड़ि भजहिं जे आना। ते नर पसु बिनु पूँछ बिषाना॥
निज जन जानि ताहि अपनावा। प्रभु सुभाव कपि कुल मन भावा॥
पुनि सर्बग्य सर्ब उर बासी। सर्बरूप सब रहित उदासी॥
बोले बचन नीति प्रतिपालक। कारन मनुज दनुज कुल घालक॥
सुनु कपीस लंकापति बीरा। केहि बिधि तरिअ जलधि गंभीरा॥
संकुल मकर उरग झष जाती। अति अगाध दुस्तर सब भाँती॥
कह लंकेस सुनहु रघुनायक। कोटि सिंधु सोषक तव सायक॥
जद्यपि तदपि नीति असि गाई। बिनय करिअ सागर सन जाई॥ अर्थ: ऐसे कृपालु प्रभु को छोड़कर जो अन्य की उपासना करते हैं, वे मनुष्य बिना सींग और पूंछ के पशु हैं। प्रभु ने उन्हें अपना जन जानकर अपना लिया। प्रभु का यह स्वभाव वानर कुल के मन को बहुत भाया। फिर सब कुछ जानने वाले, सबके हृदय में बसने वाले, सर्वरूप, सबसे रहित और उदासीन (निष्काम) प्रभु ने मनुष्य रूप में राक्षसों के कुल का नाश करने वाले कारण (लीला) से नीति के रक्षक वचन बोले- "हे वीर कपीश (सुग्रीव) और लंकापति (विभीषण)! सुनो, इस गंभीर समुद्र को कैसे पार किया जाए? इसमें मगरमच्छ, सांप और मछलियों की अनेक जातियां भरी पड़ी हैं। यह अत्यंत अथाह और सब प्रकार से दुस्तर है।" तब लंकेश विभीषण ने कहा- "हे रघुनाथ जी! सुनिए। यद्यपि आपका एक बाण ही करोड़ों समुद्रों को सुखाने वाला है, तथापि नीति यही कहती है कि आप जाकर समुद्र से विनती करें।"
निज जन जानि ताहि अपनावा। प्रभु सुभाव कपि कुल मन भावा॥
पुनि सर्बग्य सर्ब उर बासी। सर्बरूप सब रहित उदासी॥
बोले बचन नीति प्रतिपालक। कारन मनुज दनुज कुल घालक॥
सुनु कपीस लंकापति बीरा। केहि बिधि तरिअ जलधि गंभीरा॥
संकुल मकर उरग झष जाती। अति अगाध दुस्तर सब भाँती॥
कह लंकेस सुनहु रघुनायक। कोटि सिंधु सोषक तव सायक॥
जद्यपि तदपि नीति असि गाई। बिनय करिअ सागर सन जाई॥ अर्थ: ऐसे कृपालु प्रभु को छोड़कर जो अन्य की उपासना करते हैं, वे मनुष्य बिना सींग और पूंछ के पशु हैं। प्रभु ने उन्हें अपना जन जानकर अपना लिया। प्रभु का यह स्वभाव वानर कुल के मन को बहुत भाया। फिर सब कुछ जानने वाले, सबके हृदय में बसने वाले, सर्वरूप, सबसे रहित और उदासीन (निष्काम) प्रभु ने मनुष्य रूप में राक्षसों के कुल का नाश करने वाले कारण (लीला) से नीति के रक्षक वचन बोले- "हे वीर कपीश (सुग्रीव) और लंकापति (विभीषण)! सुनो, इस गंभीर समुद्र को कैसे पार किया जाए? इसमें मगरमच्छ, सांप और मछलियों की अनेक जातियां भरी पड़ी हैं। यह अत्यंत अथाह और सब प्रकार से दुस्तर है।" तब लंकेश विभीषण ने कहा- "हे रघुनाथ जी! सुनिए। यद्यपि आपका एक बाण ही करोड़ों समुद्रों को सुखाने वाला है, तथापि नीति यही कहती है कि आप जाकर समुद्र से विनती करें।"
प्रभु तुम्हार कुलगुर जलधि कहिहि उपाय बिचारि।
बिनु प्रयास सागर तरिहि सकल भालु कपि धारि॥ ५० ॥ अर्थ: हे प्रभु! समुद्र आपके कुल के गुरु हैं (क्योंकि आपके पूर्वज राजा सगर ने ही समुद्र को खोदा था)। वे विचार करके कोई उपाय बताएंगे, जिससे भालू और वानरों की सारी सेना बिना परिश्रम के ही समुद्र पार कर लेगी॥ ५० ॥
बिनु प्रयास सागर तरिहि सकल भालु कपि धारि॥ ५० ॥ अर्थ: हे प्रभु! समुद्र आपके कुल के गुरु हैं (क्योंकि आपके पूर्वज राजा सगर ने ही समुद्र को खोदा था)। वे विचार करके कोई उपाय बताएंगे, जिससे भालू और वानरों की सारी सेना बिना परिश्रम के ही समुद्र पार कर लेगी॥ ५० ॥
🌸 भाग 11: दोहा 51 से 55
सखा कही तुम्ह नीकि उपाई। करिअ दैव जौं होइ सहाई॥
मंत्र न यह लछिमन मन भावा। राम बचन सुनि अति दुखु पावा॥
नाथ दैव कर कवन भरोसा। सोषिअ सिंधु करिअ मन रोसा॥
कादर मन कहुँ एक अधारा। दैव दैव आलसी पुकारा॥
सुनत बिहसि बोले रघुबीरा। ऐसेहिं करब धरहु मन धीरा॥
अस कहि प्रभु अनुजहि समुझाई। सिंधु समीप गए रघुराई॥
प्रथम प्रनाम कीन्ह सिरु नाई। बैठे पुनि तट दर्भ डसाई॥
जबहिं बिभीषन प्रभु पहिं आए। पाछें रावन दूत पठाए॥ अर्थ: श्री राम जी ने कहा- "हे सखा (विभीषण)! तुमने उपाय तो अच्छा बताया है। यही किया जाए, यदि दैव (भाग्य) सहायक हों।" लक्ष्मण जी के मन को यह सलाह अच्छी नहीं लगी, श्री राम जी के वचन सुनकर उन्हें बड़ा दुख हुआ। उन्होंने कहा- "हे नाथ! दैव (भाग्य) का क्या भरोसा? मन में क्रोध कीजिए और इस समुद्र को सुखा डालिए। यह दैव तो कायरों के मन का एक सहारा है, आलसी लोग ही 'दैव-दैव' पुकारा करते हैं।" यह सुनकर श्री रघुवीर हँसकर बोले- "ऐसा ही करेंगे, मन में धीरज रखो।" ऐसा कहकर प्रभु ने छोटे भाई को समझाया और फिर श्री रघुनाथ जी समुद्र के समीप गए। उन्होंने पहले सिर नवाकर प्रणाम किया, फिर किनारे पर दर्भ (कुश) बिछाकर बैठ गए। उधर जिस समय विभीषण जी प्रभु के पास आए थे, उसी समय रावण ने उनके पीछे अपने दूत (शुक और सारण) भेज दिए थे।
मंत्र न यह लछिमन मन भावा। राम बचन सुनि अति दुखु पावा॥
नाथ दैव कर कवन भरोसा। सोषिअ सिंधु करिअ मन रोसा॥
कादर मन कहुँ एक अधारा। दैव दैव आलसी पुकारा॥
सुनत बिहसि बोले रघुबीरा। ऐसेहिं करब धरहु मन धीरा॥
अस कहि प्रभु अनुजहि समुझाई। सिंधु समीप गए रघुराई॥
प्रथम प्रनाम कीन्ह सिरु नाई। बैठे पुनि तट दर्भ डसाई॥
जबहिं बिभीषन प्रभु पहिं आए। पाछें रावन दूत पठाए॥ अर्थ: श्री राम जी ने कहा- "हे सखा (विभीषण)! तुमने उपाय तो अच्छा बताया है। यही किया जाए, यदि दैव (भाग्य) सहायक हों।" लक्ष्मण जी के मन को यह सलाह अच्छी नहीं लगी, श्री राम जी के वचन सुनकर उन्हें बड़ा दुख हुआ। उन्होंने कहा- "हे नाथ! दैव (भाग्य) का क्या भरोसा? मन में क्रोध कीजिए और इस समुद्र को सुखा डालिए। यह दैव तो कायरों के मन का एक सहारा है, आलसी लोग ही 'दैव-दैव' पुकारा करते हैं।" यह सुनकर श्री रघुवीर हँसकर बोले- "ऐसा ही करेंगे, मन में धीरज रखो।" ऐसा कहकर प्रभु ने छोटे भाई को समझाया और फिर श्री रघुनाथ जी समुद्र के समीप गए। उन्होंने पहले सिर नवाकर प्रणाम किया, फिर किनारे पर दर्भ (कुश) बिछाकर बैठ गए। उधर जिस समय विभीषण जी प्रभु के पास आए थे, उसी समय रावण ने उनके पीछे अपने दूत (शुक और सारण) भेज दिए थे।
सकल चरित तिन्ह देखे धरें कपट कपि देह।
प्रभु गुन हृदयँ सराहहिं सरनागत पर नेह॥ ५१ ॥ अर्थ: उन दूतों ने कपट से वानर का शरीर धारण करके प्रभु के वे सब चरित्र देखे। वे अपने हृदय में प्रभु के गुणों की और शरणागत पर उनके प्रेम की सराहना करने लगे॥ ५१ ॥
प्रभु गुन हृदयँ सराहहिं सरनागत पर नेह॥ ५१ ॥ अर्थ: उन दूतों ने कपट से वानर का शरीर धारण करके प्रभु के वे सब चरित्र देखे। वे अपने हृदय में प्रभु के गुणों की और शरणागत पर उनके प्रेम की सराहना करने लगे॥ ५१ ॥
प्रगट बखानहिं राम सुभाऊ। अति सप्रेम गा बिसरि दुराऊ॥
रिपु के दूत कपिन्ह तब जाने। सकल बाँधि कपीस पहिं आने॥
कह सुग्रीव सुनहु सब बानर। अंग भंग करि पठवहु निसिचर॥
सुनि सुग्रीव बचन कपि धाए। बाँधि कटक चहु पास फिराए॥
बहु प्रकार मारन कपि लागे। दीन पुकारत तदपि न त्यागे॥
जो हमार हर नासा काना। तेहि कोसलाधीस कै आना॥
सुनि लछिमन सब निकट बोलाए। दया लागि हँसि तुरत छोड़ाए॥
रावन कर दीजहु यह पाती। लछिमन बचन बाचु कुलघाती॥ अर्थ: वे दूत प्रेम में इतने मगन हो गए कि अपना दुराव (कपट) भूल गए और प्रकट रूप में श्री राम जी के स्वभाव का बखान करने लगे। तब वानरों ने जान लिया कि ये शत्रु के दूत हैं और उन सबको बाँधकर वानरराज सुग्रीव के पास ले आए। सुग्रीव ने कहा- "हे वानरो! सुनो, इन राक्षसों के अंग-भंग करके (काटकर) भेज दो।" सुग्रीव के वचन सुनकर वानर दौड़े। उन्हें बाँधकर सेना के चारों ओर घुमाया। वानर उन्हें बहुत तरह से मारने लगे। वे दीन होकर पुकारते थे, फिर भी वानरों ने उन्हें नहीं छोड़ा। तब दूतों ने पुकार कर कहा- "जो हमारे नाक-कान काटेगा, उसे कोसलपति श्री राम जी की सौगंध (कसम) है।" यह सुनकर लक्ष्मण जी ने सबको अपने पास बुलाया। उन्हें दया आ गई और हँसकर उन्हें तुरंत छुड़वा दिया। लक्ष्मण जी ने उन्हें एक पत्र देकर कहा- "रावण के हाथ में यह चिट्ठी देना और कहना कि रे कुलनाशक! लक्ष्मण के ये वचन बांचना (पढ़ना)।"
रिपु के दूत कपिन्ह तब जाने। सकल बाँधि कपीस पहिं आने॥
कह सुग्रीव सुनहु सब बानर। अंग भंग करि पठवहु निसिचर॥
सुनि सुग्रीव बचन कपि धाए। बाँधि कटक चहु पास फिराए॥
बहु प्रकार मारन कपि लागे। दीन पुकारत तदपि न त्यागे॥
जो हमार हर नासा काना। तेहि कोसलाधीस कै आना॥
सुनि लछिमन सब निकट बोलाए। दया लागि हँसि तुरत छोड़ाए॥
रावन कर दीजहु यह पाती। लछिमन बचन बाचु कुलघाती॥ अर्थ: वे दूत प्रेम में इतने मगन हो गए कि अपना दुराव (कपट) भूल गए और प्रकट रूप में श्री राम जी के स्वभाव का बखान करने लगे। तब वानरों ने जान लिया कि ये शत्रु के दूत हैं और उन सबको बाँधकर वानरराज सुग्रीव के पास ले आए। सुग्रीव ने कहा- "हे वानरो! सुनो, इन राक्षसों के अंग-भंग करके (काटकर) भेज दो।" सुग्रीव के वचन सुनकर वानर दौड़े। उन्हें बाँधकर सेना के चारों ओर घुमाया। वानर उन्हें बहुत तरह से मारने लगे। वे दीन होकर पुकारते थे, फिर भी वानरों ने उन्हें नहीं छोड़ा। तब दूतों ने पुकार कर कहा- "जो हमारे नाक-कान काटेगा, उसे कोसलपति श्री राम जी की सौगंध (कसम) है।" यह सुनकर लक्ष्मण जी ने सबको अपने पास बुलाया। उन्हें दया आ गई और हँसकर उन्हें तुरंत छुड़वा दिया। लक्ष्मण जी ने उन्हें एक पत्र देकर कहा- "रावण के हाथ में यह चिट्ठी देना और कहना कि रे कुलनाशक! लक्ष्मण के ये वचन बांचना (पढ़ना)।"
कहेहु मुखागर मूढ़ सन मम संदेसु उदार।
सीता देइ मिलहु न त आवा काल तुम्हार॥ ५२ ॥ अर्थ: "और उस मूर्ख से ज़बानी भी मेरा यह उदार संदेश कह देना कि या तो सीता जी को देकर श्री राम जी से मिल जा (शरण में आ जा), नहीं तो तेरा काल (मृत्यु) आ गया है"॥ ५२ ॥
सीता देइ मिलहु न त आवा काल तुम्हार॥ ५२ ॥ अर्थ: "और उस मूर्ख से ज़बानी भी मेरा यह उदार संदेश कह देना कि या तो सीता जी को देकर श्री राम जी से मिल जा (शरण में आ जा), नहीं तो तेरा काल (मृत्यु) आ गया है"॥ ५२ ॥
तुरत नाइ लछिमन पद माथा। चले दूत बरनत गुन गाथा॥
कहत राम जसु लंकाँ आए। रावन चरन सीस तिन्ह नाए॥
बिहसि दसानन पूँछी बाता। कहसि न सुक आपनि कुसलाता॥
पुनि कहु खबरि बिभीषन केरी। जाहि मृत्यु आई अति नेरी॥
करत राज लंका सठ त्यागी। होइहि जव कर कीट अभागी॥
पुनि कहु भालु कीस कटकाई। कठिन काल प्रेरित चलि आई॥
जिन्ह के जीवन कर रखवारा। भयउ मृदुल चित सिंधु बिचारा॥
कहु तपसिन्ह कै बात बहोरी। जिन्ह के हृदयँ त्रास अति मोरी॥ अर्थ: लक्ष्मण जी के चरणों में तुरंत मस्तक नवाकर वे दूत श्री राम जी के गुणों की कथा वर्णन करते हुए चले। श्री राम जी का यश कहते हुए वे लंका में आए और उन्होंने रावण के चरणों में सिर नवाया। रावण ने हँसकर बात पूछी- "रे शुक! अपनी कुशलता क्यों नहीं कहता? फिर उस विभीषण की खबर बता, जिसकी मृत्यु अत्यंत निकट आ गई है। उस मूर्ख ने लंका का राज करते-करते लंका त्याग दी, अब वह अभागा जौ का घुन (कीड़ा) बनेगा (गेहूँ के साथ घुन की तरह मारा जाएगा)। फिर भालू और वानरों की उस सेना का हाल बता, जो कठिन काल की प्रेरणा से यहाँ चली आई है। और जिनके जीवन का रक्षक बेचारा कोमल हृदय वाला समुद्र बन गया है (अर्थात् समुद्र ने ही उन्हें बचा रखा है, वर्ना मैं उन्हें मार डालता)। फिर उन तपस्वियों (राम-लक्ष्मण) की बात बता, जिनके हृदय में मेरा बड़ा भारी डर है।"
कहत राम जसु लंकाँ आए। रावन चरन सीस तिन्ह नाए॥
बिहसि दसानन पूँछी बाता। कहसि न सुक आपनि कुसलाता॥
पुनि कहु खबरि बिभीषन केरी। जाहि मृत्यु आई अति नेरी॥
करत राज लंका सठ त्यागी। होइहि जव कर कीट अभागी॥
पुनि कहु भालु कीस कटकाई। कठिन काल प्रेरित चलि आई॥
जिन्ह के जीवन कर रखवारा। भयउ मृदुल चित सिंधु बिचारा॥
कहु तपसिन्ह कै बात बहोरी। जिन्ह के हृदयँ त्रास अति मोरी॥ अर्थ: लक्ष्मण जी के चरणों में तुरंत मस्तक नवाकर वे दूत श्री राम जी के गुणों की कथा वर्णन करते हुए चले। श्री राम जी का यश कहते हुए वे लंका में आए और उन्होंने रावण के चरणों में सिर नवाया। रावण ने हँसकर बात पूछी- "रे शुक! अपनी कुशलता क्यों नहीं कहता? फिर उस विभीषण की खबर बता, जिसकी मृत्यु अत्यंत निकट आ गई है। उस मूर्ख ने लंका का राज करते-करते लंका त्याग दी, अब वह अभागा जौ का घुन (कीड़ा) बनेगा (गेहूँ के साथ घुन की तरह मारा जाएगा)। फिर भालू और वानरों की उस सेना का हाल बता, जो कठिन काल की प्रेरणा से यहाँ चली आई है। और जिनके जीवन का रक्षक बेचारा कोमल हृदय वाला समुद्र बन गया है (अर्थात् समुद्र ने ही उन्हें बचा रखा है, वर्ना मैं उन्हें मार डालता)। फिर उन तपस्वियों (राम-लक्ष्मण) की बात बता, जिनके हृदय में मेरा बड़ा भारी डर है।"
की भइ भेंट कि फिरि गए श्रवन सुजसु सुनि मोर।
कहसि न रिपु दल तेज बल बहुत चकित चित तोर॥ ५३ ॥ अर्थ: रावण ने कहा- "बता, उनसे तेरी भेंट हुई या मेरे सुयश (बल) को कानों से सुनकर ही वे लौट गए? तेरा चित्त बहुत चकित (हैरान) सा लग रहा है, तू शत्रुओं के दल का तेज और बल क्यों नहीं बताता?"॥ ५३ ॥
कहसि न रिपु दल तेज बल बहुत चकित चित तोर॥ ५३ ॥ अर्थ: रावण ने कहा- "बता, उनसे तेरी भेंट हुई या मेरे सुयश (बल) को कानों से सुनकर ही वे लौट गए? तेरा चित्त बहुत चकित (हैरान) सा लग रहा है, तू शत्रुओं के दल का तेज और बल क्यों नहीं बताता?"॥ ५३ ॥
नाथ कृपा करि पूँछेहु जैसें। मानहु कहा क्रोध तजि तैसें॥
मिला जाइ जब अनुज तुम्हारा। जातहिं राम तिलक तेहि सारा॥
रावन दूत हमहि सुनि काना। कपिन्ह बाँधि दीन्हे दुख नाना॥
श्रवन नासिका काटै लागे। राम सपथ दीन्हे हम त्यागे॥
पूँछिहु नाथ राम कटकाई। बदन कोटि सत बरनि न जाई॥
नाना बरन भालु कपि धारी। बिकटानन बिसाल भयकारी॥
जेहिं पुर दहेउ हतेउ सुत तोरा। सकल कपिन्ह महँ तेहि बलु थोरा॥
अमित नाम भट कठिन कराला। अमित नाग बल बिपुल बिसाला॥ अर्थ: शुक ने कहा- "हे नाथ! आपने जिस प्रकार कृपा करके पूछा है, उसी प्रकार क्रोध छोड़कर मेरा कहना मानिए (सुनिए)। आपका छोटा भाई विभीषण जब जाकर श्री राम जी से मिला, तो उसके जाते ही श्री राम जी ने उसे लंका का राजतिलक कर दिया। हम रावण के दूत हैं, यह कानों से सुनकर वानरों ने हमें बाँध लिया और बहुत दुख दिए। वे हमारे कान और नाक काटने ही लगे थे, परंतु श्री राम जी की कसम दिलाने पर उन्होंने हमें छोड़ा। हे नाथ! आपने श्री राम की सेना के बारे में पूछा है, तो वह करोड़ों मुखों से भी वर्णन नहीं की जा सकती। उसमें अनेक रंगों के भालू और वानरों की सेना है, जिनके मुख बहुत भयानक हैं और वे अत्यंत विशाल तथा डरावने हैं। जिसने आपके नगर को जलाया और आपके पुत्र (अक्षयकुमार) को मारा, सब वानरों में उसका बल तो सबसे थोड़ा (कम) है। वहाँ असंख्य नामों वाले अत्यंत कठोर और भयंकर योद्धा हैं, जिनमें असंख्य हाथियों का बल है और वे अत्यंत विशाल हैं।"
मिला जाइ जब अनुज तुम्हारा। जातहिं राम तिलक तेहि सारा॥
रावन दूत हमहि सुनि काना। कपिन्ह बाँधि दीन्हे दुख नाना॥
श्रवन नासिका काटै लागे। राम सपथ दीन्हे हम त्यागे॥
पूँछिहु नाथ राम कटकाई। बदन कोटि सत बरनि न जाई॥
नाना बरन भालु कपि धारी। बिकटानन बिसाल भयकारी॥
जेहिं पुर दहेउ हतेउ सुत तोरा। सकल कपिन्ह महँ तेहि बलु थोरा॥
अमित नाम भट कठिन कराला। अमित नाग बल बिपुल बिसाला॥ अर्थ: शुक ने कहा- "हे नाथ! आपने जिस प्रकार कृपा करके पूछा है, उसी प्रकार क्रोध छोड़कर मेरा कहना मानिए (सुनिए)। आपका छोटा भाई विभीषण जब जाकर श्री राम जी से मिला, तो उसके जाते ही श्री राम जी ने उसे लंका का राजतिलक कर दिया। हम रावण के दूत हैं, यह कानों से सुनकर वानरों ने हमें बाँध लिया और बहुत दुख दिए। वे हमारे कान और नाक काटने ही लगे थे, परंतु श्री राम जी की कसम दिलाने पर उन्होंने हमें छोड़ा। हे नाथ! आपने श्री राम की सेना के बारे में पूछा है, तो वह करोड़ों मुखों से भी वर्णन नहीं की जा सकती। उसमें अनेक रंगों के भालू और वानरों की सेना है, जिनके मुख बहुत भयानक हैं और वे अत्यंत विशाल तथा डरावने हैं। जिसने आपके नगर को जलाया और आपके पुत्र (अक्षयकुमार) को मारा, सब वानरों में उसका बल तो सबसे थोड़ा (कम) है। वहाँ असंख्य नामों वाले अत्यंत कठोर और भयंकर योद्धा हैं, जिनमें असंख्य हाथियों का बल है और वे अत्यंत विशाल हैं।"
द्विबिद मयंद नील नल अंगद गद बिकटासि।
दधिमुख केहरि निसठ सठ जामवंत बलरासि॥ ५४ ॥ अर्थ: "वहाँ द्विविद, मयंद, नील, नल, अंगद, गद, विकटास्य, दधिमुख, केसरी, निशठ, शठ और जाम्बवान आदि बल की राशियाँ (असीम बलवान योद्धा) हैं"॥ ५४ ॥
दधिमुख केहरि निसठ सठ जामवंत बलरासि॥ ५४ ॥ अर्थ: "वहाँ द्विविद, मयंद, नील, नल, अंगद, गद, विकटास्य, दधिमुख, केसरी, निशठ, शठ और जाम्बवान आदि बल की राशियाँ (असीम बलवान योद्धा) हैं"॥ ५४ ॥
ए कपि सब सुग्रीव समाना। इन्ह सम कोटिन्ह गनइ को नाना॥
राम कृपाँ अतुलित बल तिन्हहीं। तृन समान त्रैलोकहि गनहीं॥
अस मैं सुना श्रवन दसकंधर। पदुम अठारह जूथप बंदर॥
नाथ कटक महँ सो कपि नाहीं। जो न तुम्हहि जीतै रन माहीं॥
परम क्रोध मीजहिं सब हाथा। आयसु पै न देहिं रघुनाथा॥
सोषहिं सिंधु सहित झष ब्याला। पूरहिं न त भरि कुधर बिसाला॥
मर्दि गर्द मिलवहिं दससीसा। ऐसेइ बचन कहहिं सब कीसा॥
गर्जहिं तर्जहिं सहज असंका। मानहु ग्रसन चहत हहिं लंका॥ अर्थ: शुक ने आगे कहा- "ये सब वानर सुग्रीव के समान बलवान हैं और इनके जैसे करोड़ों अन्य वानर हैं, उनकी गिनती कौन कर सकता है? श्री राम जी की कृपा से उनमें अतुलनीय बल आ गया है, वे तीनों लोकों को तिनके के समान समझते हैं। हे दशग्रीव! मैंने कानों से ऐसा सुना है कि वानरों के सेनापतियों की संख्या अठारह पद्म (अरबों-खरबों) है। हे नाथ! उस सेना में ऐसा एक भी वानर नहीं है जो आपको रण (युद्ध) में न जीत सके। सब अत्यंत क्रोध से अपने हाथ मींज रहे हैं, परंतु श्री रघुनाथ जी उन्हें आज्ञा नहीं देते। वे कहते हैं कि हम मछलियों और सांपों सहित समुद्र को सोख लेंगे (पी जाएंगे), नहीं तो बड़े-बड़े पहाड़ों से भरकर उसे पाट (बंद कर) देंगे। हे दशशीश! हम रावण को मसलकर धूल में मिला देंगे, सब वानर ऐसे ही वचन कह रहे हैं। वे स्वभाव से ही निडर हैं, गर्जना करते हैं और ऐसे डराते हैं मानो लंका को निगल ही जाना चाहते हों।"
राम कृपाँ अतुलित बल तिन्हहीं। तृन समान त्रैलोकहि गनहीं॥
अस मैं सुना श्रवन दसकंधर। पदुम अठारह जूथप बंदर॥
नाथ कटक महँ सो कपि नाहीं। जो न तुम्हहि जीतै रन माहीं॥
परम क्रोध मीजहिं सब हाथा। आयसु पै न देहिं रघुनाथा॥
सोषहिं सिंधु सहित झष ब्याला। पूरहिं न त भरि कुधर बिसाला॥
मर्दि गर्द मिलवहिं दससीसा। ऐसेइ बचन कहहिं सब कीसा॥
गर्जहिं तर्जहिं सहज असंका। मानहु ग्रसन चहत हहिं लंका॥ अर्थ: शुक ने आगे कहा- "ये सब वानर सुग्रीव के समान बलवान हैं और इनके जैसे करोड़ों अन्य वानर हैं, उनकी गिनती कौन कर सकता है? श्री राम जी की कृपा से उनमें अतुलनीय बल आ गया है, वे तीनों लोकों को तिनके के समान समझते हैं। हे दशग्रीव! मैंने कानों से ऐसा सुना है कि वानरों के सेनापतियों की संख्या अठारह पद्म (अरबों-खरबों) है। हे नाथ! उस सेना में ऐसा एक भी वानर नहीं है जो आपको रण (युद्ध) में न जीत सके। सब अत्यंत क्रोध से अपने हाथ मींज रहे हैं, परंतु श्री रघुनाथ जी उन्हें आज्ञा नहीं देते। वे कहते हैं कि हम मछलियों और सांपों सहित समुद्र को सोख लेंगे (पी जाएंगे), नहीं तो बड़े-बड़े पहाड़ों से भरकर उसे पाट (बंद कर) देंगे। हे दशशीश! हम रावण को मसलकर धूल में मिला देंगे, सब वानर ऐसे ही वचन कह रहे हैं। वे स्वभाव से ही निडर हैं, गर्जना करते हैं और ऐसे डराते हैं मानो लंका को निगल ही जाना चाहते हों।"
सहज सूर कपि भालु सब पुनि सिर पर प्रभु राम।
रावन काल कोटि कहुँ जीति सकहिं संग्राम॥ ५५ ॥ अर्थ: शुक ने कहा- "हे रावण! सब वानर और भालू स्वभाव से ही शूरवीर हैं, और फिर उनके सिर पर प्रभु श्री राम जी हैं। वे तो संग्राम में करोड़ों कालों (यमराजों) को भी जीत सकते हैं"॥ ५५ ॥
रावन काल कोटि कहुँ जीति सकहिं संग्राम॥ ५५ ॥ अर्थ: शुक ने कहा- "हे रावण! सब वानर और भालू स्वभाव से ही शूरवीर हैं, और फिर उनके सिर पर प्रभु श्री राम जी हैं। वे तो संग्राम में करोड़ों कालों (यमराजों) को भी जीत सकते हैं"॥ ५५ ॥
🌸 भाग 12: दोहा 56 से 60 (समापन)
पुनि लछिमन दीन्हि यह पाती। नाथ बाचि जुड़ावहु छाती॥
बिहसि बाम कर लीन्हि रावन। सचिव बोलि सठ लाग बचावन॥ अर्थ: शुक (दूत) ने कहा- "फिर लक्ष्मण जी ने यह पत्रिका (चिट्ठी) दी है, हे नाथ! इसे बांचकर अपनी छाती ठंडी कर लीजिए (अर्थात् अपनी औकात समझ लीजिए)।" रावण ने हँसकर उसे बाएँ हाथ से लिया और मंत्री को बुलाकर वह मूर्ख उसे पढ़वाने लगा। पत्र में लिखा था-
बिहसि बाम कर लीन्हि रावन। सचिव बोलि सठ लाग बचावन॥ अर्थ: शुक (दूत) ने कहा- "फिर लक्ष्मण जी ने यह पत्रिका (चिट्ठी) दी है, हे नाथ! इसे बांचकर अपनी छाती ठंडी कर लीजिए (अर्थात् अपनी औकात समझ लीजिए)।" रावण ने हँसकर उसे बाएँ हाथ से लिया और मंत्री को बुलाकर वह मूर्ख उसे पढ़वाने लगा। पत्र में लिखा था-
बातन मनहि रिझाइ सठ जनि घालसि कुल खीस।
राम बिरोध न उबरसि सरन बिष्नु अज ईस॥ ५६ ॥ अर्थ: (लक्ष्मण जी ने पत्र में लिखा था-) "रे मूर्ख! केवल बातों से ही मन को रिझाकर अपने कुल को नष्ट मत कर। श्री राम जी से विरोध करके तू विष्णु, ब्रह्मा और शिवजी की शरण में जाने पर भी नहीं बच सकेगा"॥ ५६ ॥
राम बिरोध न उबरसि सरन बिष्नु अज ईस॥ ५६ ॥ अर्थ: (लक्ष्मण जी ने पत्र में लिखा था-) "रे मूर्ख! केवल बातों से ही मन को रिझाकर अपने कुल को नष्ट मत कर। श्री राम जी से विरोध करके तू विष्णु, ब्रह्मा और शिवजी की शरण में जाने पर भी नहीं बच सकेगा"॥ ५६ ॥
सुनत सभय मन मुख मुसुकाई। कहत दसानन सबहि सुनाई॥
भूमि परा कर गहत अकासा। लघु तापस कर बाग बिलासा॥
कह सुक नाथ सत्य सब बानी। समुझहु छाड़ि प्रकृति अभिमानी॥
सुनि सुक बचन क्रोध अति बाढ़ा। गहि पद प्रहार कीन्ह सठ गाढ़ा॥
नाइ चरन सिरु चला सो तहाँ। कृपासिंधु रघुनायक जहाँ॥
प्रनामु करि निज कथा सुनाई। राम कृपाँ आपनि गति पाई॥
रिषि अगस्ति कीं साप भवानी। राछस भयउ रहा मुनि ग्यानी॥
बंदि राम पद बारहिं बारा। मुनि निज आश्रम कहुँ पगु धारा॥ अर्थ: पत्र सुनते ही रावण मन में भयभीत हो गया, परंतु मुख से मुस्कुराकर सबको सुनाते हुए कहने लगा- "जैसे कोई धरती पर पड़ा हुआ हाथों से आकाश को पकड़ना चाहता हो, यह छोटे तपस्वी का वाग्विलास (बड़बोलापन) है।" शुक ने कहा- "हे नाथ! ये सब वचन सत्य हैं, अपने अभिमानी स्वभाव को छोड़कर इन्हें समझ लीजिए।" शुक के वचन सुनकर रावण का क्रोध बहुत बढ़ गया और उस दुष्ट ने शुक को जोर से लात मारी। शुक रावण के चरणों में सिर नवाकर वहां चला, जहाँ कृपासिंधु श्री रघुनाथ जी थे। प्रणाम करके उसने अपनी कथा सुनाई और श्री राम जी की कृपा से अपनी (मुनि की) गति पा ली। शिवजी कहते हैं- हे भवानी! वह शुक एक ज्ञानी मुनि था, जो अगस्त्य ऋषि के शाप से राक्षस हो गया था। बार-बार श्री राम जी के चरणों की वंदना करके वह मुनि अपने आश्रम को चला गया।
भूमि परा कर गहत अकासा। लघु तापस कर बाग बिलासा॥
कह सुक नाथ सत्य सब बानी। समुझहु छाड़ि प्रकृति अभिमानी॥
सुनि सुक बचन क्रोध अति बाढ़ा। गहि पद प्रहार कीन्ह सठ गाढ़ा॥
नाइ चरन सिरु चला सो तहाँ। कृपासिंधु रघुनायक जहाँ॥
प्रनामु करि निज कथा सुनाई। राम कृपाँ आपनि गति पाई॥
रिषि अगस्ति कीं साप भवानी। राछस भयउ रहा मुनि ग्यानी॥
बंदि राम पद बारहिं बारा। मुनि निज आश्रम कहुँ पगु धारा॥ अर्थ: पत्र सुनते ही रावण मन में भयभीत हो गया, परंतु मुख से मुस्कुराकर सबको सुनाते हुए कहने लगा- "जैसे कोई धरती पर पड़ा हुआ हाथों से आकाश को पकड़ना चाहता हो, यह छोटे तपस्वी का वाग्विलास (बड़बोलापन) है।" शुक ने कहा- "हे नाथ! ये सब वचन सत्य हैं, अपने अभिमानी स्वभाव को छोड़कर इन्हें समझ लीजिए।" शुक के वचन सुनकर रावण का क्रोध बहुत बढ़ गया और उस दुष्ट ने शुक को जोर से लात मारी। शुक रावण के चरणों में सिर नवाकर वहां चला, जहाँ कृपासिंधु श्री रघुनाथ जी थे। प्रणाम करके उसने अपनी कथा सुनाई और श्री राम जी की कृपा से अपनी (मुनि की) गति पा ली। शिवजी कहते हैं- हे भवानी! वह शुक एक ज्ञानी मुनि था, जो अगस्त्य ऋषि के शाप से राक्षस हो गया था। बार-बार श्री राम जी के चरणों की वंदना करके वह मुनि अपने आश्रम को चला गया।
बिनय न मानत जलधि जड़ गए तीनि दिन बीति।
बोले राम सकोप तब भय बिनु होइ न प्रीति॥ ५७ ॥ अर्थ: इधर जब तीन दिन बीत गए और जड़ समुद्र श्री राम जी की विनय (प्रार्थना) नहीं मान रहा था, तब श्री राम जी क्रोधित होकर बोले- "भय के बिना प्रीति (प्रेम) नहीं होती!" ॥ ५७ ॥
बोले राम सकोप तब भय बिनु होइ न प्रीति॥ ५७ ॥ अर्थ: इधर जब तीन दिन बीत गए और जड़ समुद्र श्री राम जी की विनय (प्रार्थना) नहीं मान रहा था, तब श्री राम जी क्रोधित होकर बोले- "भय के बिना प्रीति (प्रेम) नहीं होती!" ॥ ५७ ॥
लछिमन बान सरासन आनू। सोषउँ बारिधि बिसिख कृसानू॥
सठ सन बिनय कुटिल सन प्रीती। सहज कृपन सन सुंदर नीती॥
ममता रत सन ग्यान कहानी। अति लोभी सन बिरति बखानी॥
क्रोधिहि सम कामिहि हरिकथा। ऊसर बीज बएँ फल जथा॥
अस कहि रघुपति चाप चढ़ावा। यह मत लछिमन के मन भावा॥
संधानेउ प्रभु बिसिख कराला। उठी उदधि उर अंतर ज्वाला॥
मकर उरग झष गन अकुलाने। जरत जंतु जलनिधि जब जाने॥
कनक थार भरि मनि गन नाना। बिप्र रूप आयउ तजि माना॥ अर्थ: (श्री राम जी ने कहा-) "हे लक्ष्मण! धनुष-बाण लाओ, मैं अग्निबाण से इस समुद्र को सुखा डालूँ। मूर्ख से विनय, कुटिल (धोखेबाज) से प्रेम, कंजूस से सुंदर नीति, ममता में फँसे हुए से ज्ञान की कथा, अत्यंत लोभी से वैराग्य की बात, क्रोधी से शांति और कामी से भगवान की कथा कहना वैसा ही है, जैसे उसर (बंजर) जमीन में बीज बोना।" ऐसा कहकर श्री रघुनाथ जी ने धनुष चढ़ाया। यह विचार लक्ष्मण जी के मन को बहुत अच्छा लगा। प्रभु ने भयानक बाण संधान किया (धनुष पर चढ़ाया), जिससे समुद्र के हृदय में ज्वाला उठ खड़ी हुई। मगरमच्छ, सांप और मछलियां व्याकुल हो गए। जब समुद्र ने जीवों को जलते हुए जाना, तब वह अपना अभिमान छोड़कर सोने के थाल में अनेक मणियां (रत्न) भरकर ब्राह्मण के रूप में आया।
सठ सन बिनय कुटिल सन प्रीती। सहज कृपन सन सुंदर नीती॥
ममता रत सन ग्यान कहानी। अति लोभी सन बिरति बखानी॥
क्रोधिहि सम कामिहि हरिकथा। ऊसर बीज बएँ फल जथा॥
अस कहि रघुपति चाप चढ़ावा। यह मत लछिमन के मन भावा॥
संधानेउ प्रभु बिसिख कराला। उठी उदधि उर अंतर ज्वाला॥
मकर उरग झष गन अकुलाने। जरत जंतु जलनिधि जब जाने॥
कनक थार भरि मनि गन नाना। बिप्र रूप आयउ तजि माना॥ अर्थ: (श्री राम जी ने कहा-) "हे लक्ष्मण! धनुष-बाण लाओ, मैं अग्निबाण से इस समुद्र को सुखा डालूँ। मूर्ख से विनय, कुटिल (धोखेबाज) से प्रेम, कंजूस से सुंदर नीति, ममता में फँसे हुए से ज्ञान की कथा, अत्यंत लोभी से वैराग्य की बात, क्रोधी से शांति और कामी से भगवान की कथा कहना वैसा ही है, जैसे उसर (बंजर) जमीन में बीज बोना।" ऐसा कहकर श्री रघुनाथ जी ने धनुष चढ़ाया। यह विचार लक्ष्मण जी के मन को बहुत अच्छा लगा। प्रभु ने भयानक बाण संधान किया (धनुष पर चढ़ाया), जिससे समुद्र के हृदय में ज्वाला उठ खड़ी हुई। मगरमच्छ, सांप और मछलियां व्याकुल हो गए। जब समुद्र ने जीवों को जलते हुए जाना, तब वह अपना अभिमान छोड़कर सोने के थाल में अनेक मणियां (रत्न) भरकर ब्राह्मण के रूप में आया।
काटेहिं पइ कदरी फरइ कोटि जतन कोउ सींच।बिनय न मान खगेस सुनु डाटेहिं पइ नव नीच॥ ५८ ॥ अर्थ: (काकभुशुंडि जी कहते हैं-) हे गरुड़ जी! सुनिए, केले का पेड़ काटने पर ही फलता है, चाहे कोई उसे करोड़ों यत्नों से क्यों न सींचे। इसी प्रकार नीच मनुष्य विनती से नहीं मानता, डांटने पर ही झुकता है (रास्ते पर आता है)॥ ५८ ॥
सभय सिंधु गहि पद प्रभु केरे। छमहु नाथ सब अवगुन मेरे॥
गगन समीर अनल जल धरनी। इन्ह कइ नाथ सहज जड़ करनी॥
तव प्रेरित मायाँ उपजाए। सृष्टि हेतु सब ग्रंथनि गाए॥
प्रभु आयसु जेहि कहँ जस अहई। सो तेहि भाँति रहें सुख लहई॥
प्रभु भल कीन्ह मोहि सिख दीन्ही। मरजादा पुनि तुम्हरी कीन्ही॥
ढोल गवाँर सूद्र पसु नारी। सकल ताड़ना के अधिकारी॥
प्रभु प्रताप मैं जाब सुखाई। उतरिहि कटकु न मोरि बड़ाई॥
प्रभु अग्या अपेल श्रुति गाई। करौं सो बेगि जो तुम्हहि सोहाई॥ अर्थ: समुद्र ने भयभीत होकर प्रभु के चरण पकड़ लिए और कहा- "हे नाथ! मेरे सब अवगुण क्षमा कीजिए। आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी- इन सबकी करनी (स्वभाव) स्वाभाविक ही जड़ है। आपकी प्रेरणा से माया ने इन्हें सृष्टि के लिए उत्पन्न किया है, ऐसा सब ग्रंथों ने गाया है। प्रभु की आज्ञा जिसके लिए जैसी है, वह उसी प्रकार रहने में सुख पाता है। प्रभु ने अच्छा किया जो मुझे शिक्षा दी, परंतु यह मर्यादा (जल का स्वभाव) भी आप ही की बनाई हुई है। ढोल, गंवार, शूद्र, पशु और स्त्री- ये सब शिक्षा (देखभाल/अनुशासन) के अधिकारी हैं। प्रभु के प्रताप से मैं सूख जाऊंगा और सेना पार उतर जाएगी, परंतु इसमें मेरी कोई बड़ाई नहीं होगी। प्रभु की आज्ञा अटल है, ऐसा वेदों ने गाया है। इसलिए अब आपको जो अच्छा लगे, मैं तुरंत वही करूँ।"
गगन समीर अनल जल धरनी। इन्ह कइ नाथ सहज जड़ करनी॥
तव प्रेरित मायाँ उपजाए। सृष्टि हेतु सब ग्रंथनि गाए॥
प्रभु आयसु जेहि कहँ जस अहई। सो तेहि भाँति रहें सुख लहई॥
प्रभु भल कीन्ह मोहि सिख दीन्ही। मरजादा पुनि तुम्हरी कीन्ही॥
ढोल गवाँर सूद्र पसु नारी। सकल ताड़ना के अधिकारी॥
प्रभु प्रताप मैं जाब सुखाई। उतरिहि कटकु न मोरि बड़ाई॥
प्रभु अग्या अपेल श्रुति गाई। करौं सो बेगि जो तुम्हहि सोहाई॥ अर्थ: समुद्र ने भयभीत होकर प्रभु के चरण पकड़ लिए और कहा- "हे नाथ! मेरे सब अवगुण क्षमा कीजिए। आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी- इन सबकी करनी (स्वभाव) स्वाभाविक ही जड़ है। आपकी प्रेरणा से माया ने इन्हें सृष्टि के लिए उत्पन्न किया है, ऐसा सब ग्रंथों ने गाया है। प्रभु की आज्ञा जिसके लिए जैसी है, वह उसी प्रकार रहने में सुख पाता है। प्रभु ने अच्छा किया जो मुझे शिक्षा दी, परंतु यह मर्यादा (जल का स्वभाव) भी आप ही की बनाई हुई है। ढोल, गंवार, शूद्र, पशु और स्त्री- ये सब शिक्षा (देखभाल/अनुशासन) के अधिकारी हैं। प्रभु के प्रताप से मैं सूख जाऊंगा और सेना पार उतर जाएगी, परंतु इसमें मेरी कोई बड़ाई नहीं होगी। प्रभु की आज्ञा अटल है, ऐसा वेदों ने गाया है। इसलिए अब आपको जो अच्छा लगे, मैं तुरंत वही करूँ।"
सुनत बिनीत बचन अति कह कृपाल मुसुकाइ।
जेहि बिधि उतरै कपि कटकु तात सो कहहु उपाइ॥ ५९ ॥ अर्थ: समुद्र के अत्यंत विनीत वचन सुनकर कृपालु श्री राम जी ने मुस्कुराकर कहा- "हे तात! जिस प्रकार वानरों की सेना पार उतर जाए, वह उपाय बताओ"॥ ५९ ॥
जेहि बिधि उतरै कपि कटकु तात सो कहहु उपाइ॥ ५९ ॥ अर्थ: समुद्र के अत्यंत विनीत वचन सुनकर कृपालु श्री राम जी ने मुस्कुराकर कहा- "हे तात! जिस प्रकार वानरों की सेना पार उतर जाए, वह उपाय बताओ"॥ ५९ ॥
नाथ नील नल कपि द्वौ भाई। लरिकाईं रिषि आसिष पाई॥
तिन्ह के परस किएँ गिरि भारे। तरिहहिं जलधि प्रताप तुम्हारे॥
मैं पुनि उर धरि प्रभुताई। करिहउँ बल अनुमान सहाई॥
एहि बिधि नाथ पयोधि बँधावहु। जेहिं यह सुजसु लोक तिहुँ गावहु॥
एहि सर मम उत्तर तट बासी। हतहु नाथ खल नर अघ रासी॥
सुनि कृपाल सागर मन पीरा। तुरतहिं हरी राम रनधीरा॥
देखि राम बल पौरुष भारी। हरषि पयोनिधि भयउ सुखारी॥
सकल चरित कहि प्रभुहि सुनावा। चरन बंदि पाथोधि सिधावा॥ ॥ छंद ॥
निज भवन गवनेउ सिंधु श्रीरघुपतिहि यह मत भायऊ।
यह चरित कलि मल हर जथामति दास तुलसी गायऊ॥
सुख भवन संसय समन दवन बिषाद रघुपति गुन गना।
तजि सकल आस भरोस गावहि सुनहि संतत सठ मना॥ अर्थ: समुद्र ने कहा- "हे नाथ! नील और नल नाम के दो वानर भाई हैं। उन्होंने लड़कपन में ही ऋषियों से आशीर्वाद (वरदान) पाया था। उनके स्पर्श करने से भारी-भारी पर्वत भी आपके प्रताप से समुद्र पर तैर जाएंगे। मैं भी आपकी प्रभुता को हृदय में धारण करके अपने बल के अनुसार सहायता करूँगा। हे नाथ! इस प्रकार समुद्र को बंधवाइए, जिससे तीनों लोकों में आपका सुंदर यश गाया जाए। हे नाथ! इस बाण से मेरे उत्तर तट पर रहने वाले पाप की राशि दुष्ट मनुष्यों का वध कर दीजिए।" कृपालु और रणधीर श्री राम जी ने समुद्र के मन की पीड़ा सुनकर उसे तुरंत हर लिया (उनका बाण चलाकर वध कर दिया)। श्री राम जी का भारी बल और पौरुष देखकर समुद्र हर्षित होकर सुखी हो गया। उसने उन दुष्टों का सारा चरित्र प्रभु को सुनाया और चरणों की वंदना करके समुद्र चला गया।
छंद का अर्थ: समुद्र अपने घर चला गया, श्री रघुनाथ जी को यह मत (उपाय) बहुत अच्छा लगा। कलियुग के पापों को हरने वाले इस चरित्र को तुलसीदास ने अपनी बुद्धि के अनुसार गाया है। श्री रघुनाथ जी के गुणों का समूह सुख का भवन, संदेहों का नाश करने वाला और विषाद (दुख) का दमन करने वाला है। अरे मूर्ख मन! तू दुनिया की सारी आशाएं और भरोसे छोड़कर निरंतर प्रभु के गुणों को गा और सुन।
तिन्ह के परस किएँ गिरि भारे। तरिहहिं जलधि प्रताप तुम्हारे॥
मैं पुनि उर धरि प्रभुताई। करिहउँ बल अनुमान सहाई॥
एहि बिधि नाथ पयोधि बँधावहु। जेहिं यह सुजसु लोक तिहुँ गावहु॥
एहि सर मम उत्तर तट बासी। हतहु नाथ खल नर अघ रासी॥
सुनि कृपाल सागर मन पीरा। तुरतहिं हरी राम रनधीरा॥
देखि राम बल पौरुष भारी। हरषि पयोनिधि भयउ सुखारी॥
सकल चरित कहि प्रभुहि सुनावा। चरन बंदि पाथोधि सिधावा॥ ॥ छंद ॥
निज भवन गवनेउ सिंधु श्रीरघुपतिहि यह मत भायऊ।
यह चरित कलि मल हर जथामति दास तुलसी गायऊ॥
सुख भवन संसय समन दवन बिषाद रघुपति गुन गना।
तजि सकल आस भरोस गावहि सुनहि संतत सठ मना॥ अर्थ: समुद्र ने कहा- "हे नाथ! नील और नल नाम के दो वानर भाई हैं। उन्होंने लड़कपन में ही ऋषियों से आशीर्वाद (वरदान) पाया था। उनके स्पर्श करने से भारी-भारी पर्वत भी आपके प्रताप से समुद्र पर तैर जाएंगे। मैं भी आपकी प्रभुता को हृदय में धारण करके अपने बल के अनुसार सहायता करूँगा। हे नाथ! इस प्रकार समुद्र को बंधवाइए, जिससे तीनों लोकों में आपका सुंदर यश गाया जाए। हे नाथ! इस बाण से मेरे उत्तर तट पर रहने वाले पाप की राशि दुष्ट मनुष्यों का वध कर दीजिए।" कृपालु और रणधीर श्री राम जी ने समुद्र के मन की पीड़ा सुनकर उसे तुरंत हर लिया (उनका बाण चलाकर वध कर दिया)। श्री राम जी का भारी बल और पौरुष देखकर समुद्र हर्षित होकर सुखी हो गया। उसने उन दुष्टों का सारा चरित्र प्रभु को सुनाया और चरणों की वंदना करके समुद्र चला गया।
छंद का अर्थ: समुद्र अपने घर चला गया, श्री रघुनाथ जी को यह मत (उपाय) बहुत अच्छा लगा। कलियुग के पापों को हरने वाले इस चरित्र को तुलसीदास ने अपनी बुद्धि के अनुसार गाया है। श्री रघुनाथ जी के गुणों का समूह सुख का भवन, संदेहों का नाश करने वाला और विषाद (दुख) का दमन करने वाला है। अरे मूर्ख मन! तू दुनिया की सारी आशाएं और भरोसे छोड़कर निरंतर प्रभु के गुणों को गा और सुन।
सकल सुमंगल दायक रघुनायक गुन गान।
सादर सुनहिं ते तरहिं भव सिंधु बिना जलजान॥ ६० ॥
मंगल भवन अमंगल हारी। द्रवउ सो दसरथ अजिर बिहारी॥ अर्थ: श्री रघुनाथ जी का गुणगान संपूर्ण सुंदर मंगलों को देने वाला है। जो इसे आदर सहित सुनते हैं, वे बिना किसी जहाज के ही भवसागर (संसार रूपी समुद्र) को पार कर जाते हैं। जो मंगलों के धाम और अमंगलों के नाशक हैं, वे राजा दशरथ के आंगन में खेलने वाले श्री राम मुझ पर अपनी कृपा करें। ॥ ६० ॥
सादर सुनहिं ते तरहिं भव सिंधु बिना जलजान॥ ६० ॥
मंगल भवन अमंगल हारी। द्रवउ सो दसरथ अजिर बिहारी॥ अर्थ: श्री रघुनाथ जी का गुणगान संपूर्ण सुंदर मंगलों को देने वाला है। जो इसे आदर सहित सुनते हैं, वे बिना किसी जहाज के ही भवसागर (संसार रूपी समुद्र) को पार कर जाते हैं। जो मंगलों के धाम और अमंगलों के नाशक हैं, वे राजा दशरथ के आंगन में खेलने वाले श्री राम मुझ पर अपनी कृपा करें। ॥ ६० ॥
बिनय न मानत जलधि जड़ गए तीनि दिन बीति।
बोले राम सकोप तब भय बिनु होइ न प्रीति॥ अर्थ: जब तीन दिन बीत गए और जड़ समुद्र विनय नहीं मान रहा था, तब श्री राम जी क्रोधित होकर बोले- भय के बिना प्रीति (प्रेम) नहीं होती!
बोले राम सकोप तब भय बिनु होइ न प्रीति॥ अर्थ: जब तीन दिन बीत गए और जड़ समुद्र विनय नहीं मान रहा था, तब श्री राम जी क्रोधित होकर बोले- भय के बिना प्रीति (प्रेम) नहीं होती!
सकल सुमंगल दायक रघुनायक गुन गान।
सादर सुनहिं ते तरहिं भव सिंधु बिना जलजान॥ ६० ॥
मंगल भवन अमंगल हारी। द्रवउ सो दसरथ अजिर बिहारी॥ अर्थ: श्री रघुनाथ जी का गुणगान संपूर्ण सुंदर मंगलों को देने वाला है। जो इसे आदर सहित सुनते हैं, वे बिना किसी जहाज के ही भवसागर (संसार रूपी समुद्र) को पार कर जाते हैं। जो मंगलों के धाम और अमंगलों के नाशक हैं, वे राजा दशरथ के आंगन में खेलने वाले श्री राम मुझ पर कृपा करें। ॥ ६० ॥
सादर सुनहिं ते तरहिं भव सिंधु बिना जलजान॥ ६० ॥
मंगल भवन अमंगल हारी। द्रवउ सो दसरथ अजिर बिहारी॥ अर्थ: श्री रघुनाथ जी का गुणगान संपूर्ण सुंदर मंगलों को देने वाला है। जो इसे आदर सहित सुनते हैं, वे बिना किसी जहाज के ही भवसागर (संसार रूपी समुद्र) को पार कर जाते हैं। जो मंगलों के धाम और अमंगलों के नाशक हैं, वे राजा दशरथ के आंगन में खेलने वाले श्री राम मुझ पर कृपा करें। ॥ ६० ॥